Sunday, January 8, 2023
राम को प्रणाम
Thursday, December 8, 2022
राम को प्रणाम
Tuesday, November 8, 2022
राम को प्रणाम
Monday, August 8, 2022
राम को प्रणाम
त्यागी भरत, सेवक लक्ष्मण एवं वीर शत्रुघ्न से।
खलनायक रावण ने भी प्रेम किया अपने भाई से,
वीर कुम्भकर्ण से, लेकिन चिढ़ता था विभीषण से।
अपने अहंकार के आगे, कुछ नज़र नहीं आता है।
विभीषण का नीति उपदेश नहीं भाया रावण को,
देश निकाला दिया लंका के आगामी शासक को।
राम नाम अंकित घर देख, मिले थे विभीषण को।
विभीषण उसी दिन घर का भेदी बन गया था,
अशोक वाटिका में सीता का पता बताया था।
रावण जैसा शक्तिशाली और अहंकारी राक्षस,
क्यों नहीं मारा विभीषण को, क्यों रहा विवश ?
क्या भाई का प्रेम, या अपनी प्रजा की रक्षा का दायित्व,
अथवा विरोधी विचार को भी संरक्षण का औदार्य ?
धर्म का विचार छोड़, सांसारिक भोग में लिप्त थी।
ऐसे में कोई एकाध ही अति विकसित मेधावी होता है,
जो धर्म का विचार करता है, प्रभु का स्मरण करता है।
जब जीवन में सुख की बाढ़ आयी हुई हो,
बहुमत अधर्म के साथ, प्रजा सोई हुई हो,
नीति व धर्म का चुनाव विभीषण ही कर पाता है,
अनीति के विपरीत परिणाम को सोच पाता है।
अधर्मी और अन्यायी राजा, प्रजा का द्रोही होता है,
अपने अहंकार के कारण, राज्य को नष्ट करता है।
लंका के सिंहासन का लालच भी कारण नहीं है।
बाली को मार कर, लंका पार आ चुके हैं राम,
सीता को लौटा दो, वरना लंका का अब होगा नाश।
रावण को विभीषण की धर्म युक्त सलाह नहीं भायी,
उसने तो भरी सभा में विभीषण को लात लगायी।
जब भी अहंकार में अपने का, करता कोई अपमान,
परिणाम में सदैव दुःख, विधि का यह नियम जान।
भाई और राजा की सुनूँ या मातृभूमि की रक्षा करूँ।
राम के समक्ष रावण की होगी निश्चित हार,
राम से मिलकर होगा, लंका की प्रजा का उद्धार।
राम ने विभीषण को, लंका का राजा बना दिया,
धर्म और मर्यादा हेतु, रावण को युद्ध में मार दिया।
भौतिकता है प्रेय, आध्यात्मिक उन्नति श्रेय है।
विभीषण को सप्त चिरंजीवी में मिला है स्थान,
राम की भक्ति महान, हम करें राम को प्रणाम।
Friday, July 8, 2022
राम को प्रणाम
मन स्तब्ध हुआ, अप्रतिम, अतुलनीय पुरुष,
स्वप्न जैसे सत्य हुआ,
काम जाग्रत हुआ,
कर लिया निश्चय यही,
पाना इसे पति रूप में अभी।
जन्मी राक्षसी रूप में ऋषि श्राप से,
लेकिन ऋषि होते है करुण,
और बदलते हैं शाप को वरदान में।
राक्षसी रूप में पाओगी दर्शन प्रभु राम के,
सार्थक होगा धरा पर राक्षस जन्म भी,
करते है ऋषि मुनि, जन्मों तक तपस्या,
लेकिन सौभाग्य से होती है, यह कृपा कभी।
कुम्भकर्ण व दशानन की थी बहन,
पति विद्युज्जिह्न का वध हुआ रावण से,
ख़रदूषण के साथ रहने लगी दंडकवन में !
ख़र, दूषण व त्रिशिरा जैसे राक्षस भाई,
करते थे राज जनस्थान में, सभी आततायी।
काम वासना ही संग हेतु पर्याप्त कारण था।
लेकिन आर्यपुत्र राम हैं एकपत्नीव्रत धारी,
नहीं स्वीकारा काम निमंत्रण, चाहे जो हो नारी।
रामानुज लक्ष्मण के पास जब वह गयी,
अनायास ही नाक कटी, वह दीक्षित हो गयी।
जाग्रत हो गयी अपने पति से प्रीत।
अब अवसर है, राक्षस कुल का हो सर्वनाश,
इसी में है उनका कल्याण, आई भाई के पास।
दिया नीति का उसने सुंदरतम उपदेश,
रावण को कहा याद नहीं, तुम्हें कोष और देश।
विद्या विनय बिना, सत्कर्म हरि समर्पण बिना,
राज्य नीति बिना , एवं धन धर्म बिना।
सब व्यर्थ हो जाते हैं, बिना फल दिए,
मानो ये सब पाने में, व्यर्थ ही श्रम किए।
विषय संग से सन्यासी, बुरी सलाह से राजा,
अहंकार से ज्ञान और मदिरा पान से लज्जा।
अकड़ से प्रेम और मदहोशी से गुणवान,
हो जाते ये सभी नष्ट, इसे रावण तू सत्य जान।
शत्रु, सर्प, अग्नि, पाप और जो हो समर्थ या स्वामी,
इन्हें छोटा समझने की भूल, पड़ती है, भविष्य में भारी।
सर्वनाश की राह पर, दशानन का जागा क्रोध।
शूर्पणखा ने लक्ष्मण से, दीक्षा को सफल बनाया।
वर्षों की तपस्या के बाद, शिव से वरदान पाया।
उनसे प्रीत लगे और मन का रिश्ता जुड़ जाए।
स्वतः होता जीवन सफल, बनता है सब काम,
राम से जुड़े यह मन, करें राम को प्रणाम।
Wednesday, June 8, 2022
राम को प्रणाम
क्या कुछ पीछे छूट जाता है, और क्या मिल जाता है?
मिल गयी जीवन संगिनी सीता, शिव धनुष पिनाक तोड़ कर।
चला वनवास के लिए, पीछे अवध का राज-पाट छोड़ कर,
संग सीता लक्ष्मण आये,निषादराज व केवट से प्रेम जोड़ कर।
ली चरण पादुका, अमित प्रेम का बंधन जोड़ कर।
चला जंगल में आगे चित्रकूट को छोड़ कर,
ले गया रावण, सीता को, मर्यादा तोड़ कर।
लक्ष्मण की जीवन रक्षा का, भविष्य का सरंजाम मिला।
फेंके दूर हिमालय में, शबरी के जूठे बेर, जो लक्ष्मण ने,
संजीवनी बूटी बन गए, जब हनुमान गए औषधि लेने।
मिला सुग्रीव संग अंगद से, बाली का वध कर। ,
चला किष्किंधा से लंका के लिए, वानर सेना जोड़ कर,
आ गया विभीषण लंका से, रावण का साथ छोड़ कर,
अग्नि से प्रकट सीता को, स्वीकारा, सबने कर जोड़ कर।
जननी और जन्मभूमि के लिए, चला स्वर्ण लंका छोड़ कर,
अपूर्व स्वागत अयोध्या में, दिए जला व पटाखे फोड़ कर।
वही का वही, क्या छोड़ा, क्या पाया, सब कुछ है मेरे पास।
यदि जो राज्य किया होता, वन में न भेजा गया होता,
अन्य रघुकुल राजा की तरह, भुला दिया गया होता।
मेरा जीवन भी है ऐसा ही, खोने और पाने का खेल,
राज्य, धन, साथी छोड़ने और और प्रेम का मेल।
जिसने निरंतर ढूँढा, अपने दिल में राम को पाया।
तो यह पाने और खोने का, छोड़ने और जोड़ने का,
खेल है शाश्वत, सम्बन्ध राम से केवल प्रेम का।
जब करते हैं संत, लीला हेतु मुझे प्रणाम,
लिख देते हैं साथ में, राम से बड़ा राम का नाम।
Sunday, May 8, 2022
राम को प्रणाम
शरण हो जायें राम की, गुण गायें हम राम के।
राम का जीवन सिखाता है हर पल हमें,
वीरता और नम्रता, जीवन में चाहिए हमें।
जड़ बनी हुई शिला सम, अहिल्या थी एक।
गौतम पत्नी से हुआ, अनजाने में एक अपराध,
इंद्र ने मर्यादा भंग की, ऋषि ने दिया उन्हें शाप।
राह में आ गया था, गौतम ऋषि का आश्रम !
देखो राम! यह परित्यक्त, ऋषि पत्नी है यहाँ,
शील भंग किया पापी इंद्र ने, मिली इसे सजा,
ऋषि ने इसे आश्रम में, जड़ बनाकर छोड़ दिया,
समाज-बहिष्कार से, शिला-सम जीवन हुआ।
धर्म पर आधारित सृष्टि, तुम नियामक हो।
यदि सामाजिक कुरीति, हो धर्म के नाम पर,
करो सृजन नव रीति का, कुरीति पर वार कर।
विश्वामित्र आगे बोले, इंद्र ने जो छल किया,
गौतम ऋषि ने अनजाने ही, अनुचित दंड दिया।
तुम अपना लो समाज में फिर से,
इसे इसका उपयुक्त स्थान दो,
तुम राजपूत्र हो, मर्यादा पुरुषोत्तम,
पीड़ित मानवता के त्राण हो।
उनके अनुपम तेज से, आश्रम आलोकित हुआ।
अहिल्या जैसे जड़ हुई, सहमी सिकुड़ी बैठी थी,
जो सदियों से ना हिली, दुःख की वो गठरी थी।
सहसा किसी मानव को देख, एक हरकत हुई,
समाज पुनः अपना लेगा, ऐसी हसरत जगी।
भाई लक्ष्मण संग खड़े हुए, तेजोमय राम को।
स्वतः दण्डवत प्रणाम किया, चरण रज का स्पर्श किया,
राम ने माता कहकर, अति आदर से सम्बोधित किया।
अतीव आश्चर्य, वनवासी जन को होने लगा,
स्वतः समाचार, ऋषि आश्रमों में पहुँच गया।
आए सब और हुए नतमस्तक, शिरोधार्य किया राम का निर्णय,
देवी अहिल्या को मिला सम्मान, हुई सुरक्षित और निर्भय।
जहाँ भी जो अनुचित हुआ, उसका उचित पुनर्निर्धारण किया।
परब्रह्म ने अवतार ले, किए थे आदर्श काम,
इसीलिए हम करते सदा, राम को प्रणाम।
Friday, April 8, 2022
राम को प्रणाम
स्वप्न साकार हुआ है अब, मंदिर के निर्माण का।
मन में राम, तन में राम, साँसों में बसते हैं राम,
धर्म का है, मर्म यही , जड़ चेतन में केवल राम।
राम ने हमारे लिए , जिया आदर्श जीवन,
मनुज लीला करते रहे, भटके जंगल वन।
साथ खेले, बड़े हुए, विवाह भी हुआ साथ।
राज्याभिषेक की तैयारी हुई, राम को कुछ करना होगा ,
आए थे राक्षस वध हेतु, अब अवध छोड़ना होगा।
पति, प्रिय पुत्र राम, और लोक यश है।
राज काज में थी निपुण, युद्ध में भी साथ निभाती थी,
नाम कैकयी, भरत की माता, राम को अधिक चाहती थी।
राक्षस फैले हैं चारों ओर, तंत्र हो रहा भ्रष्ट।
खर दूषन की छावनी, बना हुआ दंडकारण्य,
रावण लंका से करता राज, सुरक्षित नहीं अरण्य।
क्या करोगे राजा बनकर, महलों में रहकर के राम,
प्रजा को सुखी करे, यही राजा का असली काम।
मैं सह लूँगी अपयश सारा, दशरथ के तुम प्राण हो,
जीवन मृत्यु विधि के हाथ, तुम मानवता के त्राण हो।
ऐसा अद्भुत निर्णय किया, सदियों का अपयश लिया,
पति को खोया, सम्मान खोया, राम को वन भेज दिया।
कठिन भले ही, दधीचि ने, दिया आदर्श प्राण त्याग का,
लेकिन कलंक को धारण करना, अपने जीवन यश का त्याग,
कोई उदाहरण नहीं है कहीं भी, कैकेयी का है अनुपम त्याग।
जानकी को मुँह दिखाई में, दिया था निज भवन !
भरत कभी नहीं समझ पाए, अपनी माता को,
राम ने दिया सम्मान, जननी सम विमाता को।
राम का प्रेम भी कैकयी का, अपयश नहीं मिटा सका,
लेकिन इसी त्याग के कारण, रावण वध सम्भव हो सका।
खलनायक भी लीला हेतु, पहने हैं आवरण।
और राम के साथ पूजा हेतु, सीता को लाया था वहाँ।
लेकिन राक्षस संस्कृति में थी, केवल भौतिक सम्पन्नता,
लूटते थे देव और मानव को, थी सोने की लंका।
आर्य संस्कृति के अनुरूप,नारी का सम्मान नहीं भाता था।
देवों की तरह नारी को, भोग की वस्तु ही जाना था।
वध मात्र मानव द्वारा, उसी रूप में आए राम।
रावण ने शिव को भी, तप से प्रसन्न किया था,
कुबेर की सम्पदा ली. देवों का दलन किया था।
लेकिन किया सीता हरण , पाप का घड़ा भर गया,
अपने पापों से मुक्ति का, यही मार्ग समझ आ गया।
अति पराक्रमी रावण की, हो गयी युद्ध में पराजय,
भाई लक्ष्मण का साथ मिला, राम की हुई जय।
ज्ञानी और अहंकारी रावण ने, अंत समय जब आया था,
लक्ष्मण के अनुरोध पर, राजनीति का पाठ पढ़ाया था।
राम मर्यादा पुरुषोत्तम, हरते धरती का भार।
राम है औदार्य, क्षमा का मूर्तिमान स्वरूप,
भक्तों के लिए है, दया और प्रेम का रूप।
Tuesday, March 8, 2022
राम को प्रणाम
वनवास या रावण वध, किया सीता से विमर्श।
कह दिया था लक्ष्मण को, पराई नारी नहीं ये,
मेरा मन रघुवंशी नहीं डोलता स्वप्न में भी,
हो रहा है स्वयंवर, उपयुक्त वर है राम ही।
सीता ने भी माँग लिया था गौरी से वरदान,
मिले मुझे मन अनुरूप वर, धनुष यज्ञ में आज।
पर राक्षस विध्वंश के लिए, जाना है वन में।
सीता ने साथ निभाया राम का, छाया की तरह,
जानकी है शक्ति, बनी रावण वध की वजह।
स्वयं बनाकर पहनाते पुष्प आभूषण विचित्र।
वनवास में राम सीता लक्ष्मण रहते हैं आनंदित,
सर्वत्र है प्रसन्नता, सम्पूर्ण वातावरण कुसुमित।
सीता समा चुकी अग्नि में, यहाँ मात्र छाया!
राम ने सीता से, पहले ही किया था वार्तालाप,
राक्षसों से होगा युद्ध, अग्नि में रहो अब आप।
रावण ले गया सीता को कर के अपहरण,
राक्षस बुद्धि है यही, न वरण, न ही रण।
इसलिए कृष्ण ने किया, रुक्मिणी हरण।
गांधारी ने आर्य मर्यादा के लिए किया वरण,
क्योंकि भीष्म ने गांधार से किया था रण।
मानव जीवन में प्रेम का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
करते है संगठन, वनचर और वानर जन का,
प्रेम की अग्नि है मन में, पता करें अब सीता का।
सीता के बिना मेरे मन को मेघ डराते हैं।
घन घमंड नभ गरजत घोरा।
प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥
यदि अश्रु जल से निरंतर, बदन न भीगा रहता।
हनुमान ने सुनाया राम को, सीता जी का हाल,
रावण वध का निश्चय, कर चले कृपानिधान।
सर्व जन हित हेतु, रावण का नाश करना था।
प्रेम की अमर कहानी की, अनुपम स्मृति,
मानव जाति के लिए, रची यह कैसी कृति!
बना दिया पुल भारत भूमि से लंका के लिए,
लाखों वर्ष बीते, रामसेतु के अवशेष बचे हुए।
हुई अग्नि परीक्षा, समाज में सदा रहे मान।
सीता को अग्नि से ही निकल कर आना था,
छाया को तो अग्नि में ही समा जाना था।
सम्मान के लिए, अपने प्रेमी के मान के लिए,
किया समय अनुकूल निर्णय, त्रेता युग के लिए।
वन के कठिन दिन बिसरने लगे।
लेकिन प्रेम की पूर्णता में सदा वियोग,
प्रेमी का प्रेमास्पद से यही सच्चा योग।
लेकिन विरह के क्षणों में, प्रेमी ही सब जगह।
हर आहट पर लगता है, कहीं प्रेमी ही तो नहीं,
हर आकृति को देखकर, कहीं यह वही तो नहीं।
प्रेम की पराकाष्ठा में, उपस्थिति मात्र प्रेमी की,
नित्य मिलन और नित्य विरह, अद्भुत है स्थिति।
कृष्ण और रुक्मिणी का साहचर्य,
द्रौपदी का वनवास में पांडवों का साथ,
कुंती का वन में अकेले पांडवों का पालन,
राधा, रुक्मिणी, द्रौपदी, कुंती या और अनेक,
सीता में सभी गुण समाहित, इसीलिए वह एक।
राम ने किया एक पत्नीव्रत का पालन,
सीता ही है शक्ति सदा, राम मात्र कारण।
प्रेम करो सबसे, क्योंकि सभी में है राम।
प्रेम की पहचान, होती है देने के भाव से,
कोई माँग शेष नहीं, प्रेम की स्मृति है भाव से।
ऐसे प्रेम के प्यासे हैं, श्री कृष्ण और श्री राम,
जो हो जाए सीता-राधा, आ जाएँगे राम श्याम।
Tuesday, February 8, 2022
राम को प्रणाम
राह पर चलकर दिखाया, हमारे लिए।
नामकरण के समय, दिया गया भरत नाम,
राम ने भ्राता भरत को, प्रेम किया इस तरह,
राज्य मिला, लेकिन भरत, ना सह सके राम विरह।
जाते हैं परिजन समेत, राम को वापस बुलाने।
और राम प्रेम वश कहते हैं, करूँ वही जो भरत कह दे,
अब भरत को असमंजस, कैसे प्रेम की मर्यादा तोड़ दे।
अपनी नहीं, प्रेमी के मन की बात चुनी जाती है।
प्रेमी का मान रहे, उसी की जग में शान रहे,
प्रेम में डूबे हुए, स्वयं का न मान- गुमान रहे।
मेरे विरह के कारण, कर्तव्य से मुख मोड़ लो।
यहाँ मोह नहीं, प्रेम है, आग्रह नहीं कर्तव्य है,
प्रेम की राह में स्वयं की, इच्छाओं का क्षय है।
राम ही हैं प्राणाधार, करें इसका त्राण वही।
भूल गए कि राम को लौटाकर ले जाना है,
व्यथित रहे इतना, अब राम को ही सोचना है।
प्रेम के वशीभूत हैं, स्वयं राम का भी मन चित्त।
समझ गए, नहीं संतोष, भरत को बिना आधार,
करी कृपा, दी पाँवरी, भरत को हुआ हर्ष अपार।
भरत ने शीश पर धारण की, राम पादुका वैसे।
लगे पाँवरी दोनो हैं, दो अक्षर का राम नाम,
जो मिल गया अवध को, बन गया सब काम।
राम सदैव रहे प्रमुदित, बढ़ गए वन की और।
प्रेम की मर्यादा का अनुपम वर्णन है यह प्रसंग,
भरत प्रेम की तुलना, होती गोपी प्रेम के संग।
पर प्रेमी के सुख के लिए, तड़पते हुए जो जिए।
ऐसे थे भरत, और गोपियों के चरित्र,
प्रेम का उदाहरण, हमें लगते विचित्र।
मात्र भृकुटि विलास से, मर जाते रावण या कंस।
परमात्मा का अवतार होता है इस धरा पर बार बार,
क्योंकि प्रेमी भक्त जन्म लेते हैं, भारत में अपार।
Saturday, January 8, 2022
राम को प्रणाम
कुछ भी सम्भव है, प्रेम व मर्यादा के लिए,
साधना से जन्म लेते हैं, साधन अनेक,
नेतृत्व मिलने पर सभी, पीड़ित होते हैं एक।
दशरथ बनकर प्रेम करें, राम से आजीवन,
राम ही हो एकमात्र आधार जीवन के लिए,
प्राण का उत्सर्ग यदि कर सकें राम के लिए।
कुशलता हो जब जीवन के प्रत्येक कर्म में,
कर्मों में योग ही कुशलता है,
कर्मों में योग का अर्थ समता है।
यश अपयश या नित्य रण,
सबके प्रति तितिक्षा और जीवन रक्षा,
ऐसी है कौशल्या और उनकी शिक्षा।
तो प्रकट होंगे श्री राम, दूर कर देंगे भव रोग।
Friday, December 31, 2021
संकल्प
लगता है आज जीवन भी क्षणभंगुर है।
पूर्ण कुसुमित जीवन हो, यह चेतना आयी है,
चेतनता का हर क्षण, जाग्रत हो जाएँ प्रतिपल,
न मुंदी रहे ये आंखे, जैसे रहती थी कल।
कल तक था जो सोया, जागा आज विदुर है,
जीवन का हर क्षण अब इतना मधुर है।
सृजन कार्य में लगे, योग्यता खुद की बढे,
अहं से मुक्ति मिले, संतुष्टि का भाव बढे,
जीवन लक्ष्य के प्रति,मन आबद्ध हो रहा है,
तदनुरूप क्षमताओं को विकसित कर रहा है।
चेतना के क्षण में, आत्मविश्वास प्रबल है,
जीवन का हर क्षण अब इतना मधुर है।
स्नेह का विकास हो, अब यही प्रयास हो,
भ्रातृत्व के भाव का बोध अनायास हो,
जैसे जैसे विराट से मिलन हो रहा है,
अपनी लघुता का आभास हो रहा है।
बूद से समुद्र का मिलन ख़ुदबख़ुद है,
जीवन का हर क्षण अब इतना मधुर है।
मैं प्रसन्न हूँ?
अपने को भी बताना होता है मुश्किल,
कि, बुरा क्या लग रहा है !!
यह भी तो लगता है कि मुझे कोई दुःख नहीं है,
मुझे किसी की परवाह नहीं, ख़ुद से मस्त हूँ, शिकायत नहीं है।
क्या कुछ रटे हुए उत्तर दे रहे हैं?
बिना जाने ही, बस कह रहे हैं?
औपचारिकता मात्र ही तो है, ये प्रश्न और हमारे उत्तर,
यदि सुनाने लगे हाल अपना, भाग जाएँगे ये डरकर,
कहाँ से लायें समय तुम्हारा हाल सुनने के लिए,
समय तो मिला नहीं, कभी स्वयं का हाल भी सुनने के लिए।
जब हम किसी का हाल सुनते हैं,
अपने भीतर तो अपना ही हाल सुनते हैं!
याद आता है हमें कि हमने क्या किया था,
ऐसे ही हालात में कैसे काम किया था ?
अपनी ग़लतियाँ याद आती है,
मन में एक टीस सी उठ जाती है,
मुझे तो ख़्याल ही न था,
मुझे बेहतर होना चाहिए था।
आगे के लिए सबक़ मिल जाता है,
अपना हाल थोड़ा ठीक हो जाता है।
ऐसे किसी और का भला ना भी करें,
ख़ुद का तो भला हो ही जाता है।
अच्छा अपना हाल यदि हम ख़ुद को सुनायें,
क्या हम सच्चाई से स्वयं को जान पायें?
अपने काम में कमी भले कोई ना बताये,
हम तो जानते हैं,
फिर अनजान क्यों बन जाते हैं?
अपने काम में अपनी ओर से सुधार,
निरंतर बना देता है, इसे और बेहतर।
लेकिन प्रसन्नता के लिए तो और भी ज़रूरी है,
अपने स्वभाव में निरंतर सुधार।
यह बना देता है, हमें और बेहतर।
नयी बात को सीखना और अभ्यास,
बन जाती है आदत और फिर स्वभाव।
ऐसे ही जन्म जन्मांतर से बहुत सा अभ्यास,
परिणाम है यह हमारा वर्तमान स्वभाव।
स्वभाव में कमी हमें हमारी विशेषता लगती है,
ये कमियाँ ही हमें औरों से, अलग जो करती है।
विशेषता समझते हैं, इसीलिए कमी दूर नहीं होती है,
इस सच्चाई को समझने में उम्र गुज़र जाती है।
दुःख को जानने का पैमाना क्या है?
अरे मैं प्रसन्न हूँ, मुझे पता है।
‘प्रसन्नता में कोई शिकायत नहीं होती है।
प्रसन्न व्यक्ति क्रोध नहीं करता है।’
सतह पर दिखावटी होती है हमारी ख़ुशी,
ज़रा सी बात पर आया क्रोध,
क्योंकि हम हैं, भीतर से दुःखी।
अब जानो स्वयं को कि सुखी या दुःखी?
यदि क्रोध और शिकायत नहीं, आप हैं सुखी,
वरना यह दिखावटी है ख़ुशी, आप हैं दुःखी।
बुरा लगने की बात नहीं, शांति से विचार करो,
अपने भीतर शांति है, उसी की तलाश करो।
दूसरे के प्रति अपना कर्तव्य हम पूरा करें,
उससे अपनी प्रसन्नता को बाँधकर ना रखे।
हम प्रसन्न रहने का दिखावा भले करें,
अपने सत्य को पहचाने और स्वयं सच में प्रसन्न रहें।
बस अब एक आख़िरी बात और है,
दुःख ना होना ही प्रसन्नता है, यही सत्य है।
दुःख का कारण है अपेक्षा,
आशा और तुलना दोनो से दूरी,
हो जाएगी प्रसन्नता पूरी।
चाहत
उसे आप भी चाहें, तो ये ख़ूबसूरत होगा !
यदि आप ना भी चाहें,
उसकी उपेक्षा ना करे, वो भी चलेगा।
लेकिन किसी की चाहत का अपमान करके,
भला आपको क्या मिलेगा ?
सिवाय इसके कि - बस एक बार और,
बढ़ जाएगा आपका अहंकार,
आपको लगेगा एक बार फिर से,
हैं आप ख़ास, अलग हैं सब से।
प्रेम से भर ले स्वयं को,
सम्मान का प्रदर्शन भी नहीं,
और अपमान का सवाल ही नहीं,
बस नम्रतापूर्वक व्यवहार,
निश्चित ही आपके लिए खोल देता है,
कई बंद दरवाज़े, और बढ़ा देता है,
आपको उन्नति की राह पर !
चेहरा
ऊपर है मस्तक, जहाँ कभी शीतलता और कभी आग।
मन है कहाँ, मस्तक में या हृदय में ?
भावना कहाँ, दिमाग़ में या मन में ?
चेहरा क्या सब कुछ दिखला देता है ?
या मन चेहरे को झुठला देता है ?
पति - पत्नी कर रहे हैं अपनी शाश्वत लड़ाई,
कोई आ गया मिलने के लिए, ठहर गई लड़ाई।
दोनो के चेहरे पर छाई हुई मुस्कान,
भूल गए लड़ाई, रखा अतिथि का मान।
मन का खेल कुछ और, चेहरे पर कुछ और,
गया अतिथि, लौटी लड़ाई, कोई नहीं कमज़ोर।
काम में व्यस्त या मनोरंजन में लगे हुए,
अपना मनपसंद काम करते हुए,
कोई व्यवधान आ जाता है,
चेहरे पर तनाव उभर आता है।
लेकिन चेहरे के भीतर भी कई चेहरे हैं,
इन चेहरों में भी कुछ अंधे हैं, कुछ बहरे हैं!
कुछ चेहरे जब सामने आते हैं,
जब ख़ुद को मुसीबत में पाते है।
कोई चेहरा है शैतानी,
जो कर लेता है मनमानी,
सामने कोई मजबूर या लाचार जब आता है,
मदद के नाम पर नाजायज़ फ़ायदा उठाता है।
समाज के लिए रहता है भले इंसान का चेहरा,
निजी जीवन में कुछ भी कर लेता है वही चेहरा।
Tuesday, June 30, 2020
Unlock 1.0 Day 30 June 30, 2020
आज है तीसवाँ दिन, अनलॉक का प्रथम चरण,
प्रथम लॉकडाउन में पढ़ा, रामचरितमानस को,
द्वितीय में गीता की अद्भुत टीका, साधक संजीवनी को।
तृतीय का, उपयोग हुआ, भागवत पारायण में,
चतुर्थ का, सोलह अक्षर महामंत्र, के जप यज्ञ में।
अनलॉक के प्रथम चरण के ग्यारहवें दिन तक,
रामकथा का बालकाण्ड सुना विस्तार पूर्वक।
अगले नौ दिन अयोध्याकांड का, वर्णन प्रेमपूर्वक,
इक्कीसवें दिन सूर्य ग्रहण में किया राम नाम जप।
शेष नौ दिन में सुनी, शेष कथा श्रीराम की ,
अरण्यकांड में सीता हरण, लीला मनुज अवतार की।
किष्किन्धाकांड में मिले राम, अपने चिरसेवक हनुमान से,
सुग्रीव से की मित्रता, उपकृत किया बाली वध से।
सुंदरकांड में, लंका दहन, लीला है हनुमान की,
खोजते हैं, कहाँ सीता, प्रियतमा करुणानिधान की।
लंकाकांड में सेतु बांध, किया लंका पर आक्रमण,
कुम्भकर्ण, मेघनाद, रावण का वध, राज्य पाता है विभीषण।
पुष्पक विमान से प्रभु श्रीराम, अयोध्या आते हैं,
भरत के जीवन आधार, अवधपति बन जाते हैं।
उत्तरकांड में वर्णन है राम राज्य व राम के उपदेश का,
काकभूषण्डि एवं गरुड़ के, भक्तिमय संवाद का।
अनलॉक के प्रथम चरण में, कोरोना की जाँच बढ़ा रहे हैं।
इसके कारण संख्या में पॉज़िटिव केस भी बढ़ रहे हैं।
जून मास में चरम, लॉक डाउन के कारण नहीं आ पाया है,
अनलॉक का द्वितीय चरण 31 जुलाई तक बतलाया है।
कर्तव्य का पालन सदा, करो प्रभु का स्मरण,
रहो उत्साहित, दो गज दूरी, जीतेंगे कोरोना रण।

