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Tuesday, May 5, 2020

Lockdown 3.0 Day1-2 May 5, 2020

आज है दूसरा दिन, लॉकडाउन का तृतीय चरण,
जीवन का अर्धशतक, चल रहा कोरोना से रण।
भागवत के सप्ताह पारायण का, हुआ प्रथम दिन,
कर लूँगा दो सप्ताह में, एक पारायण में दो दिन। 
जन्मदिवस के 40 दिन पहले देश में लॉकडाउन,
ऑफ़िस में छुट्टी भले, पर स्वयं का हो संवर्धन, 
प्रथम लॉकडाउन में पढ़ा, रामचरितमानस को,
द्वितीय में गीता की अद्भुत टीका साधक संजीवनी को। 
तृतीय का उपयोग हो रहा है भागवत पारायण में,
ईश्वर कृपा से लाभ होता है, गृह वातावरण में। 

भागवत माहात्म्य में गोकर्ण कथा से यह समझाया गया,
भागवत जीवित को सदा मुक्त करे, प्रेत भी मुक्त हो गया। 
प्रथम स्कंध में पांडव, कृष्ण और परीक्षित का वर्णन,
परीक्षित मुक्त हो सात दिन में, इसके लिए कथा का उपक्रम। 

द्वितीय स्कंध में सृष्टि रचना, काल गणना और विराट पुरुष का वर्णन,
सृष्टि की रचना करते ब्रह्मा, लेकिन उरप्रेरक हैं स्वयं नारायण। 
तृतीय स्कंध में ब्रह्मा की सृष्टि का, दस रूपों में होता विस्तार,
मनु और शतरूपा के शासन के लिए, रसातल से आवश्यक पृथ्वी का उद्धार,
विष्णु पार्षद जय विजय का दैत्य हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु  के रूप में अवतार, 
लाते पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर, करके हिरण्याक्ष बध,श्री विष्णु के वाराह अवतार ।
कर्दम और देवहूति के विवाह के साथ होता है प्रथम दिन का समापन,
देवहूति के गर्भ से कलावतार कपिल मुनि का होगा अवतरण।

लॉकडाउन 3.0 में खुल सकते हैं, कार्यालय पूरे देश में,
लेकिन शराब की दुकानों पर, लग रही भीड़ हर प्रदेश में।
14 दिन का तीसरा लॉकडाउन, क्या 40 दिन के लाभ को खो देगा ?
या इस देश का आम आदमी, मास्क पहनकर दो गज दूरी रख लेगा ??
सोचो सब, कैसे हो हल, सहयोग होना चाहिये,
देश में नियंत्रित अब, कोरोना रोग होना चाहिये। 

Thursday, May 5, 2011

Birhday on 5th May 2011

क्या कुछ लिखना है इकतालीस वर्षो के बाद,
लगता है कि जीवन का एक अध्याय पूर्णता की ओर है ?
कुछ लोग, कभी - कभी कहते है हास्य में,
कि ईश्वर ने आदमी को ४० वर्षो की आयु ही प्रदान की थी |

मुझे क्या लगता है इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है ?
लेकिन आदमी की तलाश सारी उम्र इसी हालात की है,
कि उसके अच्छा लगने की लोग चिंता करे,
आए और पूछे कि आपको क्या अच्छा लगता है और फिर वैसा करे |

कभी कभी लगता है कि क्या मेरे भीतर भी कुछ होता है ?
या सब कुछ सिर्फ बाहर ही होता रहता है ?
लगता है कि केवल भावना है भीतर और तथ्य है सारे बाहर,
लेकिन सब कहते है कि भावुकता में कुछ नहीं रखा है |

भावना को मिले समष्टि का आधार, तो फिर बन जाती है सवेंदनशीलता,
और इससे ही खुल जाता है द्वार, मानव मस्तिष्क के विकास का |
भाव की व्यापकता से प्राप्त हो सकता है बोध इस ब्रह्माण्ड का,
और हो सकता है ज्ञान निज स्वरुप और अपनी आत्मा का |

जानना क्यों चाहता है मानव कुछ और, क्या पर्याप्त नहीं है अपना घर-परिवार,
क्यों भटकता है मन किसी और के लिए, जबकि व्यस्तता पहले से ही है अपार,
सीमित है संसाधन, ढूंढ़ता किसे यह मन, प्यास बुझती क्यों नहीं है ?
इतना सुख चारो ओर से, लेकिन आवाज कहीं ओर से आती क्यों रही है ?

कुछ ऐसा करने की तमन्ना है जो कि अब तक किया नहीं है,
घर से, ऑफिस से, कुटुंब ओर मित्रो से, मिला क्या नहीं है ?
कुछ मिलने से ज्यादा सीखने की चाह है,
पाने से ज्यादा मिटने की चाह है |

अपनी चाहत को पाने की राह पर, चलने में अभी देर है,
सात वर्ष और अभी करना यहाँ उलटफेर है |
हर दिन सिलना और हर रात उधेड़ देना,
हर दिन वही पुराना, खेल, खेल लेना |

अभ्यास से पूर्णता और फिर निवृत्ति,
ऐसी ही बनी रहे यदि वृत्ति,
संभव हो सकेगा अपने लक्ष्य को पाना,
और समय आने पर दूर चले जाना |

स्थान, समय तो हमारी भाषा है,
हमें जीवन के परे भी जीने की आशा है,
लेकिन इस जगत के विद्यालय से आगे बढ़ने की आशा,
खत्म कर देगी इस जीवन की शेष सभी आशा |