प्रेम
क्या पता है तुम्हें, देखता है वो हमें । जो दृष्टि है, वही तो, है वो स्वयं, जो सृष्टि है, वही तो, है वो स्वयं, खुद भी जो है, वही तो, है वो स्वयं, तू भी जो है, वही तो, है वो स्वयं, यह भी जो है, वही तो, है वो स्वयं, वह भी जो है, वही तो, है वो स्वयं । ऐसा लगता है क्या तुम्हें ? या सुना है आप्त महापुरुषों से ?? या प्रमाण माना है शास्त्र वचनों को ??? स्वयं जो है अप्रमेय, वह है प्रमाता, किसी भी प्रमाण के अंतर्गत वह नहीं आता । प्रमाण है संसार के, प्रत्यक्ष, अनुभव, अनुमान सभी, करण है अंतःकरण, करें स्मृति विस्मृति कभी । वह तो परे है संसार से, सभी साधनों से, सभी इन्द्रियों से, देह, मन और बुद्धि से । दृष्टि भ्रम के चित्र में, एक को देखो, दूसरा हो जाता है ओझल, इसी तरह जीव की दृष्टि में, संसार दिखे, परमात्मा है ओझल । जो कुछ दिखता, सुनता और अनुभव होता, संसार का अनुभव, सांसारिक ही होता । इन इन्द्रियों के पीछे मन और बुद्धि, अहंकार से परिचालित, अंतःकरण की वृत्ति । यह सब यदि दीखते हैं, तो कोई देखने वाला भी तो है, देखने वाले को कोई नहीं, देखने...