प्रार्थना (Birthday on 5th May, 2014) - Preachings from Gurudev
जन्म को पूर्ण हुए 44 वर्ष, या मृत्यु की दूरी कम हुई 44 वर्ष ? कहने के ढंग का ही अंतर है। जीवन के गुजरते हुए समय के साथ, क्या मुझमें भी कोई अंतर आता है ? क्या शरीर का जन्म, तरुणाई, जवानी और प्रौढ़ावस्था, ये सारे बदलाव मुझमें भी होते हैं ? मेरे मन की स्थिति तो हर समय बदल जाती है, कुछ स्मृतियाँ स्थायी हो जाती हैं, मन उन्हें बार बार दोहराता है, यादों की जुगाली करते करते, अपने ढंग से उन्हें बदल भी देता है। और लगने लगता है कि जीवन को जिया है मैंने अपने ढंग से, संतोष के साथ। बुरी स्मृतियाँ परे हटाकर मन अतीत को खुशनुमा बना लेता है। लेकिन जीवन अतीत में कहाँ चलता है, मन तो भविष्य की आशा व आशंकाओं में, भटकने लग जाता है, कभी आत्म विश्लेषण का प्रयास करने लग जाता है, कभी अपने चारों ओर कमियाँ ढूंढने लग जाता है, ऐसे ही गुजरता रहता है समय। किसी क्षण परमात्मा की कृपा से व्यक्ति का ध्यान चला जाता है, स्वयं, अपने आप पर, किसी संत के दर्शन से चोट लग जाती है, कुछ खोया हुआ सा है, जिसका उसे पता नहीं, लेकिन लगता है कि इन्हें पता है सही, कृपा हो जाती है संत की, गुरु से मिलन हो जात...