आत्मालाप
दुःख और सुख शाश्वत हैं जीवन में, ऐसा मैंने मान लिया था। लेकिन दुःख से छुटकारा पाना तो मैं भी चाहता था। जो चाहा वो मिल जाये, लेकिन लोभ बढ़ता जाये, लोक मर्यादा के विरुद्ध चाहत भी किसको बतलाये। जो लोक सोचे वैसा जीवन सुख पूर्ण होता जाये, भीतर का दुःख , कैसे किसको समझाये ? जहाँ भी दुःख का गान किया, अपनी अस्मिता का क्षरण किया, ऐसा जीवन सुन्दर लेकिन, उसमें दुःख इतना भरा, कहने को सारे सुख,लेकिन मन के भीतर काँटा गड़ा। ऐसा जीवन जीते जीते , पुस्तकीय ज्ञान भी पा लिया। औरों को मार्ग दिखाने का दम्भ भी मन में जगा लिया। इतना ज्ञान कि ऐसा लगता धर्म का अर्थ भी समझ लिया। आत्म ज्ञान भी मन की एक अवस्था, ऐसा मान लिया। ऐसा लगा कि बुद्धि के द्वारा समझ सब आ गया, मानव प्रकृति के वश में , यह 'सत्य' समझ में आ गया। लेकिन गुरुदेव के दर्शन से, आत्म ज्ञान का सत्य पता चला। आत्म ज्ञानी के दर्शन से, शास्त्र का सत्य पता चला। आत्म ज्ञान है, मन बुद्धि और प्रकृति के परे , इसे जानना है असंभव, इसीलिए मन प्रयत्न न करे , म...