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Showing posts from 2019

आत्मालाप

दुःख और सुख शाश्वत हैं जीवन में, ऐसा मैंने मान लिया था।  लेकिन दुःख से छुटकारा पाना तो मैं भी चाहता था।  जो चाहा वो मिल जाये, लेकिन लोभ बढ़ता जाये, लोक मर्यादा के विरुद्ध चाहत भी किसको बतलाये।  जो लोक सोचे वैसा जीवन सुख पूर्ण होता जाये, भीतर का दुःख , कैसे किसको समझाये ? जहाँ भी दुःख का गान किया, अपनी अस्मिता का क्षरण किया, ऐसा जीवन सुन्दर लेकिन, उसमें दुःख इतना भरा, कहने को सारे सुख,लेकिन मन के भीतर काँटा गड़ा।  ऐसा जीवन जीते जीते , पुस्तकीय ज्ञान भी पा लिया। औरों को मार्ग दिखाने का दम्भ भी मन में जगा लिया।  इतना ज्ञान कि ऐसा लगता धर्म का अर्थ भी समझ लिया।  आत्म ज्ञान भी मन की एक अवस्था, ऐसा मान लिया।  ऐसा लगा कि बुद्धि के द्वारा समझ सब आ गया, मानव प्रकृति के वश में , यह 'सत्य' समझ में आ गया।  लेकिन गुरुदेव के दर्शन से, आत्म ज्ञान का सत्य पता चला।  आत्म ज्ञानी के दर्शन से, शास्त्र का सत्य पता चला।  आत्म ज्ञान है, मन बुद्धि और प्रकृति के परे , इसे जानना है असंभव, इसीलिए मन प्रयत्न न करे , म...

CODE SIMPLIFIED: LIFE - (A Talk)

interesting है ना ! LIFE तो simple ही तो है |  नहीं ? अच्छा कितने लोग कहते हैं कि life simple है ? हाथ खड़े करके बताओ ! हाँ, और अब कितने लोग कहते हैं कि life simple नहीं है |  हाथ खड़े करके बताओ |  अच्छा, ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने दोनों options में ही हाथ खड़ा नहीं किया  होता है confusion,  सच बोलना बेहतर है, दूसरे को देखकर हाथ खड़ा करने से |  हाथ खड़े करके बताओ |  तो अब लेकिन यह तो सभी चाहते हैं ना कि life simple हो ! कम से कम इतने साल जीने के बाद तो निश्चित ही ऐसा सभी चाहते हैं |  actually हम जीना चाहते हैं, लेकिन बार-बार भूल जाते हैं |  क्या भूल जाते हैं ? जीना भला कोई कैसे भूल सकता है ? साँस तो खुद ही चलती रहती है |  तो देखो यह तो प्रकृति की सबसे बड़ी देन है कि सांस खुदबखुद चलती है |  वरना तो हम खाना भूल जाते हैं, पीना भूल जाते हैं, कोई आश्चर्य नहीं कि हम साँस लेना भी भूल जाते और कब के ही यह दुनिया छोड़ चुके होते |  अच्छा life में वर्तमान तो हमेशा simple ही होता है ! है ना, क्ष...

मुक्ति - FREEDOM (A peep into time - written on 25 July 1987) 5 May 2019

अगर तुम चाहते हो, एक मुक्त जिंदगी - काल गणना का हर साधन मिटा दो, - दुनिया के सारे कैलेण्डर हटा दो, - घड़ियों को बीते कल की यादें बना दो, - और हर घंटाघर की मंजिल गिरा दो। फिर रहेगा सिर्फ कल, आज और कल एक दिन होगा बराबर एक घंटे, मिनट और सेकंड के। आदमी स्वतन्त्र होगा, समय का न दास होगा, वक्त के बंधन न होंगे, वक्त का इंतज़ार न होगा, न वक्त गुजारेगा आदमी, न ही वक्त गुजारेगा आदमी को, खुले आसमां में उड़ेगा आदमी, मगर न भूलेगा जमीं को। साल, महीने और सप्ताह न होंगे, किन्तु, जन्म और मृत्यु होते रहेंगे। काल गणना का माध्यम जीवन ही होगा मूल्याङ्कन मृत्यु के बाद ही होगा अपने अतीत के लिए मनुष्य को एक दिन से अधिक पछताना न होगा एक दिन से अधिक के लिए भविष्य का तनाव सहना न होगा। लेकिन यह दास. पीढ़ियों से गुलाम ऐसी मुक्ति पाना पसंद नहीं करेगा रेंगने का आदी समय का कीड़ा उड़ने का मौका बेकार खो देगा। सिर्फ वही नहीं, विश्व की मेधा जिसे सम्मानित किया जाता है, समय-समय पर समय के बिना इस जहाँ पर हुकूमत कैसे कर पाएगी इसीलिए यह बदलाव सह न पायेगी। आदमी को समय का डर दिखाकर ...