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संकल्प

जीवन का हर क्षण अब इतना मधुर है, लगता है आज जीवन भी क्षणभंगुर है।   घृणा के अभाव में हर परिवर्तन सुखदायी है, पूर्ण कुसुमित जीवन हो, यह चेतना आयी है, चेतनता का हर क्षण, जाग्रत हो जाएँ प्रतिपल, न मुंदी रहे ये आँखें, जैसे रहती थी कल।  कल तक था जो सोया, जागा आज विदुर है, जीवन का हर क्षण अब इतना मधुर है।  सृजन कार्य में लगे, योग्यता खुद की बढ़े, अहं से मुक्ति मिले, संतुष्टि का भाव बढ़े, जीवन लक्ष्य के प्रति,मन आबद्ध हो रहा है, तदनुरूप क्षमताओं को विकसित कर रहा है।  चेतना के क्षण में, आत्मविश्वास प्रबल है, जीवन का हर क्षण अब इतना मधुर है।  स्नेह का विकास हो, अब यही प्रयास हो, भ्रातृत्व के भाव का बोध अनायास हो, जैसे जैसे विराट से मिलन हो रहा है, अपनी लघुता का आभास हो रहा है।  बूँद से समुद्र का मिलन ख़ुदबख़ुद है, जीवन का हर क्षण अब इतना मधुर है।

मैं प्रसन्न हूँ?

आसान होता है यह उत्तर देना कि सब अच्छा चल रहा है! अपने को भी बताना होता है मुश्किल, कि, बुरा क्या लग रहा है !! यह भी तो लगता है कि मुझे कोई दुःख नहीं है, मुझे किसी की परवाह नहीं, ख़ुद से मस्त हूँ, शिकायत नहीं है।  क्या कुछ रटे हुए उत्तर दे रहे हैं? बिना जाने ही, बस कह रहे हैं? औपचारिकता मात्र ही तो है, ये प्रश्न और हमारे उत्तर, यदि सुनाने लगे हाल अपना, भाग जाएँगे ये डरकर, कहाँ से लायें समय तुम्हारा हाल सुनने के लिए, समय तो मिला नहीं, कभी स्वयं का हाल भी सुनने के लिए।   जब हम किसी का हाल सुनते हैं, अपने भीतर तो अपना ही हाल सुनते हैं! याद आता है हमें कि हमने क्या किया था, ऐसे ही हालात में कैसे काम किया था ? अपनी ग़लतियाँ याद आती हैं, मन में एक टीस सी उठ जाती है, मुझे तो ख़्याल ही न था,  मुझे बेहतर होना चाहिए था।  आगे के लिए सबक़ मिल जाता है, अपना हाल थोड़ा ठीक हो जाता है।  ऐसे किसी और का भला ना भी करें, ख़ुद का तो भला हो ही जाता है।  अच्छा अपना हाल यदि हम ख़ुद को सुनायें, क्या हम सच्चाई से स्वयं को जान पायें? अपने काम में कमी भले कोई ना बताये, हम तो जानत...

चाहत

जो आपको चाहे, उसे आप भी चाहें, तो ये ख़ूबसूरत होगा ! यदि आप ना भी चाहें, उसकी उपेक्षा ना करें, वो भी चलेगा।  लेकिन किसी की चाहत का अपमान करके, भला आपको क्या मिलेगा ? सिवाय इसके कि - बस एक बार और, बढ़ जाएगा आपका अहंकार, आपको लगेगा एक बार फिर से, हैं आप ख़ास, अलग हैं सब से।  प्रेम से भर लें स्वयं को, सम्मान का प्रदर्शन भी नहीं, और अपमान का सवाल ही नहीं, बस नम्रतापूर्वक व्यवहार, निश्चित ही आपके लिए खोल देता है, कई बंद दरवाज़े, और बढ़ा देता है,  आपको उन्नति की राह पर !

चेहरा

चेहरा जो सामने दिखता है, शरीर का ऊपरी भाग, ऊपर है मस्तक, जहाँ कभी शीतलता और कभी आग।  मन है कहाँ, मस्तक में या हृदय में ? भावना कहाँ, दिमाग़ में या मन में ? चेहरा क्या सब कुछ दिखला देता है ? या मन चेहरे को झुठला देता है ? पति - पत्नी कर रहे हैं अपनी शाश्वत लड़ाई, कोई आ गया मिलने के लिए, ठहर गई लड़ाई।  दोनों के चेहरे पर छाई हुई मुस्कान, भूल गए लड़ाई, रखा अतिथि का मान।  मन का खेल कुछ और, चेहरे पर कुछ और, गया अतिथि, लौटी लड़ाई, कोई नहीं कमज़ोर।  काम में व्यस्त या मनोरंजन में लगे हुए, अपना मनपसंद काम करते हुए, कोई व्यवधान आ जाता है, चेहरे पर तनाव उभर आता है।  लेकिन चेहरे के भीतर भी कई चेहरे हैं, इन चेहरों में भी कुछ अंधे हैं, कुछ बहरे हैं! कुछ चेहरे जब सामने आते हैं, जब ख़ुद को मुसीबत में पाते हैं।  कोई चेहरा है शैतानी,  जो कर लेता है मनमानी, सामने कोई मजबूर या लाचार जब आता है, मदद के नाम पर नाजायज़ फ़ायदा उठाता है। समाज के लिए रहता है भले इंसान का चेहरा, निजी जीवन में कुछ भी कर लेता है वही चेहरा।