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Sunday, May 5, 2019

मुक्ति - FREEDOM (A peep into time - written on 25 July 1987) 5 May 2019

अगर तुम चाहते हो,
एक मुक्त जिंदगी
- काल गणना का हर साधन मिटा दो,
- दुनिया के सारे कैलेण्डर हटा दो,
- घड़ियों को बीते कल की यादें बना दो,
- और हर घंटाघर की मंजिल गिरा दो।

फिर रहेगा
सिर्फ कल, आज और कल
एक दिन
होगा बराबर
एक घंटे, मिनट और सेकंड के।

आदमी स्वतन्त्र होगा,
समय का न दास होगा,
वक्त के बंधन न होंगे,
वक्त का इंतज़ार न होगा,
न वक्त गुजारेगा आदमी,
न ही वक्त गुजारेगा आदमी को,
खुले आसमां में उड़ेगा आदमी,
मगर न भूलेगा जमीं को।

साल, महीने और सप्ताह न होंगे,
किन्तु,
जन्म और मृत्यु होते रहेंगे।
काल गणना का माध्यम जीवन ही होगा
मूल्याङ्कन मृत्यु के बाद ही होगा
अपने अतीत के लिए
मनुष्य को एक दिन से अधिक
पछताना न होगा
एक दिन से अधिक के लिए
भविष्य का तनाव
सहना न होगा।

लेकिन यह दास.
पीढ़ियों से गुलाम
ऐसी मुक्ति पाना पसंद नहीं करेगा
रेंगने का आदी
समय का कीड़ा
उड़ने का मौका बेकार खो देगा।
सिर्फ वही नहीं,
विश्व की मेधा
जिसे सम्मानित किया जाता है,
समय-समय पर
समय के बिना
इस जहाँ पर
हुकूमत कैसे कर पाएगी
इसीलिए यह बदलाव सह न पायेगी।

आदमी को
समय का डर दिखाकर
पंगु बना दिया गया है
उसकी मानसिक व शारीरिक
क्रियाओं को सीमित कर दिया गया है
वर्षों की मेहनत के नाम पर
सभ्यता के आवरण में
बंधनों को जकड़ दिया गया है
भविष्य को खुशनुमा बनाने के लिए,
वर्तमान का मन मसोस दिया गया है
अतीत की रक्षा और
उससे सीखने के नाम पर
आज को मसल कर दबा दिया गया है।

मगर परिणाम क्या रहा है
अभी भी बगावत के स्वर उठ रहे हैं
अब भी कसमसा रहे हैं
विद्रोही इन जंजीरों के जाल में
पर भला इन्हें कौन समझाए?
सैंकड़ो वर्षों के बंधन कब
कुछ वर्षों में टूट पाए है
हाँ,
जो चिंगारियाँ उठ रही है
वो भड़ककर शोला जरूर बनेगी
आज नहीं तो कल
आने वाली पीढ़ियों को
एक खुला आकाश उड़ने के लिए
और
एक सुदृढ़ जमीं रहने के लिए
बनाने का अवसर देगी।

उस वक्त जरुरत होगी
जहाँ में एक ऐसे इंसान की
वर्तमान के शैतान और
भविष्य के भगवान की
जो
लपटों का रुख मोड़ दे
और एक-एक कर सारे बंधन तोड़ दे
बना दे स्वतन्त्र संसार
न देश काल की सीमा हो,
न हो व्यथा दुत्कार।
इस स्वप्न को
यथार्थ में कौन बदलेगा
सर्वहारा का मसीहा
या
भारत का राजपुत्र
अथवा
कोई विज्ञान-पुत्र
समय ही बताएगा।


Saturday, May 5, 2018

वर्तमान (A peep into start of search: written on 25 July 1990) - 5 May 2018

तुम क्या चाहते हो मुझसे बताओ जरा,
कुछ भी कहना नहीं चाहता हूँ मैं अभी,
मेरे जीवन की राहे अभी तय नहीं,
मुक्त जीवन बिताना चाहता हूँ अभी ।

जीवन लक्ष्य की और बढ़ना है मुझे,
जीवन में 'कुछ' है पाना मुझे,
'क़ुछ' की परिभाषा मैं दूंगा भी क्या,
खुद को ही मालूम नहीं है अभी ।

इतना ही जानता हूँ कि अपनी राह में,
कांटे न बिछाऊ अपनी चाह में,
चाहता हूँ साधनों की शुद्धता भी मैं,
पर साध्य के लिए बढ़ना चाहता हूँ अभी।

समय देखते-देखते गुजर जायेगा,
वह वक्त भी फिर आ जायेगा,
जब मैं खड़ा हूँगा दोराहे पर फिर,
उसके लिए ढलना पड़ेगा अभी।

मुझे business नहीं carrier चाहिये ,
मुझे पैसा नहीं, अध्ययन चाहिये ,
मेरे लक्ष्य के अनुरूप है बस यही,
उससे दूर होना न चाहता हूँ अभी।

जन्मांतर के बंधन से मुक्ति मिले,
न मुझ पर बकाया हो शिकवे-गिले ,
मुझे फिर-फिर न आना पड़े लौटकर,
ऐसा निर्वाण चाहता हूँ मैं अभी। 

Friday, May 5, 2017

जागरण - गुरु की तलाश (Written on 16 January 2003 - a peep in the past) 5 May 2017

चेतना विकसित हो,
व्यर्थता अनुभव हो,
प्रतीति सघन हो,
हर सुख की कामना दुःख का कारण है।
श्रेय और प्रेय का अंतर यही है,
प्रेय की चाह और उसका अंत दुःख है,
श्रेय की प्राप्ति आनंद का स्त्रोत है।

प्रेय की निरंतरता नहीं देगी आभास दुःख का,
लेकिन यह संभव नहीं,
जीवन का अनुभव बार-बार यह सिद्ध करता है,
प्रेय नश्वर है, एक झोंका जो आता है और चला जाता है,
दुःख की निरंतरता में प्रेय की उपलब्धि,
देती है एक झलक सुख की,
और छा जाती है फिर वही उदासी।

प्रेय की निरंतरता भी मन की मूर्च्छा का क्षण है -
बेहोशी छाई रहती है, मदमस्त हो जाता है मन,
चेतना नहीं जागृत, सब कुछ हो जाता है तन,
लेकिन हर बार नश्वर सिद्ध होता है यह क्षण,
लेकिन करने लगता है, प्रतीक्षा फिर से यह मन।
बार-बार का अनुभव भी सिखा नहीं पाता है,
मन फिर से उसी, पुराने ढर्रे पर लौट जाता है,
संसार रूपी कक्ष में, चेतना घूमती है मन के वर्तुल में,
अनेक बार मोक्ष रूपी द्वार आता है नजदीक में,
ध्यान, लेकिन संसार की और लगा रह जाता है,
अंतर्यात्रा के लिए चेतना का जागरण नहीं हो पाता है।

बाहरी सम्बन्ध जो नजर आते हैं अनेक,
रचने वाला है सबको, भीतर मन मात्र एक,
अनेकों बंधन, जो मुझे जकड़ते नज़र आते हैं,
सब रचे हैं मेरे मन ने, खुद को भरमाते हैं।
मन को, ऊब होनी चाहिए इस दोहराव से,
दुःख की निरंतरता में, क्षणिक सुख के ठहराव से,
न जाने क्यों, यह भाव ठहर नहीं पाता है,
मन फिर से, इस संसार में रम जाता है।

हो सकता है, अभी जागरण का प्रथम क्षण हो,
तन्द्रा छाई हो, आलस्य का आवरण हो,
अनुभव होने लगा है, अभी परिपक्व न हुआ हो,
समय की धारा में, प्रकट तत्व न हुआ हो।
या फिर हो प्रतीक्षा किसी मांझी की,
जो मँझधार से खींच ले, ऐसे सहारे की,
कहते हैं, एकांत यात्रा है, जरूरत नहीं है साथी की,
तन है रथ, मन है घोड़े, जरुरत तो है रथी की।
जो सुना है कि बैठा है मेरे ही मन में,
उम्मीद है, प्रकट होगा किसी क्षण में,
थाम लेगा वल्गा जो, बनकर सारथि,
कौन करेगा प्रार्थना, कौन होगा प्रार्थी।

मन तो अभी मस्त है, सुख-दुःख के सागर में,
यह ज्ञान तो भरा है, बुद्धि की गागर में,
तन, मन, बुद्धि के पार है आत्मा,
कहते हैं, वो तो है स्वयं परमात्मा,
कर्मजन्य कालिमा से ढका हुआ है वह प्रकाश,
हो सकता है प्रकट वह, इसके लिए जो करे प्रयास।
पूर्व कर्मफल भोग ले और न बांधे वर्तमान के कर्म,
तो भविष्य में संभावना, है यह ज्ञान का मर्म।

कृष्ण कहते हैं, तू कर दे समपर्ण,
करता रह कर्म, और कर दे कर्मफल अर्पण।
ईसा कहते हैं, तू आ मेरी शरण,
मुक्त करता हूँ पापों से, तू कर दे समपर्ण।
बुद्ध कहते हैं, तू आशा मत कर,
होश में रहकर, मुक्ति का उपाय कर।
मुहम्मद का कहना है, एक पर विश्वास कर,
सब कुछ मिल जाएगा, अपना फ़र्ज़ अदा कर।
महावीर कहते हैं, सब कुछ पुरुषार्थ यहाँ,
नहीं कोई ईश्वर, हर व्यक्ति है समर्थ यहाँ,
विवेक से कर तू, यहाँ हर काम,
तू स्वयं ही परमात्मा, नहीं शास्त्र से काम।

सूत्र एक है, अंतर्यात्रा जरूरी है,
नश्वर है जगत, शाश्वत की खोज जरुरी है। 

(Now on 5 May 2017, many of the confusions are clear and still working on my inner journey. Now I have my Gurudev and it's like walking in shadow.)

Thursday, June 23, 2016

'स्वयं करे उद्धार'

उद्धार करे क्या कोई किसी का यहाँ पर,
स्वयं ही आदर न दे, विवेक को जहाँ पर ,
यदि परमात्मा की कृपा से होता उद्धार जीव का,
उद्धरेत आत्मनात्मानम से भ्रमित करें क्यों भला ?

यह जो कह रहे, समझा रहे, 
स्वयं भगवान ही तो प्रगट हुए। 
अपना पता प्रभु कभी, देते नहीं हैं जीव को,
लेकिन शरणागत की रक्षा में, प्रगट कर देते स्वयं को। 
जीव का प्रयास तो मात्र उद्धार की चाह है,
आदर दे स्व विवेक को, मात्र यही राह है,
भगवत्कृपा के लिए प्रभु करते हैं चुनाव,
पानी में उतरो तो पार लगाते हैं नाव ,
अपना मित्र स्वयं बनो, अपने विवेक के आदर से,
अपना शत्रु मत बनो, अपने मन के शासन से। 

मन की गुलामी को हम आजादी समझ लेते हैं ,
परम स्वतन्त्रता आत्म ज्ञान से, यह नहीं समझ पाते है। 
लायक हैं जूते खाने के, मन में तो सब जानते हैं ,
पश्चाताप के जूते मगर, सब, चुपचाप सह जाते हैं। 
दुनिया के सामने, भले बने फिरते हैं,
मौका पाते ही, दूसरे के दोष देखते हैं ,
भगवत्कृपा के साधन सभी, गुरु कृपा से मिल गये हैं,
अवसर सामने है उपस्थित, फिर भी चूक सकते हैं। 

गुरु की आवश्यकता नहीं, यह स्वामी जी की व्याख्या है,
उस मार्ग के राही हम नहीं, यह बात जानने की है,
परमात्मा स्वयं मार्ग दिखलाते हैं ,
उचित स्थान पर स्वतः पहुंचाते हैं। 

अब अपना ध्यान हम क्यों भटकाएं भला,
तद्विद्धि प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया। 
प्रणाम तो प्रदर्शित भी किया जा सकता है,
प्रश्न भी, कहीँ से भी, लाया जा सकता है,
लेकिन प्रश्न स्वयं का हो, अपने मन में हो जन्मा,
शास्त्रीय प्रश्न से शिष्य का, कभी न होता है भला,
गुरु के ज्ञान और स्तर का निर्णय शिष्य कैसे कर सकते है,
सद्गुरु भगवान की कृपा प्राप्त, भगवान जैसे ही होते  हैं। 

जो देख सकते हो आसान बात, कि चाह न हो, इनमें से किसी की,
धन, काम, या प्रसिद्धि, तीनो पर दृष्टि न होती सद्गुरु की,
फिर तो बात आसान है, जब कहीँ मन ठहर जाये,
बात हो अध्यात्म की, स्व विवेक से समझ आये,
जो प्रश्न मन में जन्मे हो, सब उत्तर पा जाये ,
सद्गुरु स्वयं ध्यान में, तुम्हें सब बता जाये। 
लेकिन बात इससे भी बने, यह होगा नहीं,
सेवा के बिना, अहंकार मिटेगा नहीं। 

अहंकार के रूप अनेक, कभी समझ नहीं आते,
जितनी भी पहचान अपनी, हम संसार से पाते। 
साधक परिवार भी, जब करे प्रशंसा,
कभी गुरु भी कर दे अनुशंषा ,
कभी मन में लगे कि प्रगति हो रही है,
संसार से वीतराग होने की बात बैठ रही है,
सुबह जागा यह अहंकार,
और शाम को होता बंटाधार। 

सेवया का अर्थ होता है, सेवा के द्वारा,
सेवा हो कैसे ? निर्णय सेव्य के द्वारा। 
प्रदर्शन सम्मान देने का, विनम्रता का करते यहीं,
मन के विरुद्ध बात सुनने का धैर्य भीतर है नहीं, 
जो बात मन के विरुद्ध हो, लगे यहाँ आना व्यर्थ है,
मन कहे कि 'संसार से पार जाने में जीव स्वयं समर्थ है'। 
और खुद को पता भी नहीं चलता, हो जाता है पतन,
दिन, महीने, साल व्यर्थ, सवारी करने लगता मन। 

कैसे हो रक्षा स्वयं से स्वयं की,
बात तो थी स्वयं से स्वयं के उद्धार की। 
स्व विवेक का आदर तो, सभी को कर लेना चाहिए,
लेकिन, इस कमजोर अहंकार को, सहारा चाहिए। 
यह काले सर्प की भाँति, फुंकारता है रात दिन,
अपने भय के कारण, जहर उगलता है सारे दिन,
इस कालियनाग के, फन हैं हमारी इन्द्रियाँ ,
मन के शासन में करे, रस भोग ये सर्वदा। 
इन्हे मर्दन करते है स्वयं, कृष्ण विवेक के द्वारा,
लेकिन अहंकार भरमाता, बुद्धि को मन के द्वारा। 

यही शास्त्र , यही ज्ञान अपना अर्थ प्रकट करने लगते हैं ,
जब सद्गुरु की सेवा से अहंकार का मर्दन करते है,
गुरु के वचनों को ध्यानपूर्वक सुनना,
यथासम्भव पालन करने का भाव रखना,
यही तो सेवा की शुरुआत है,
गुरु संसार के पार हैं, उन्हें संसार की कहाँ प्यास है। 
सद्गुरु परीक्षण करते रहते हैं शिष्य का,
याद करने मात्र से निरीक्षण कर देते है शिष्य का। 
उनकी प्रेरणा ही विवेक को सबल बनाती है,
झूठे राजा बने, मन को सही राह पर लाती है। 

सब कुछ होने पर भी बाहर भला क्या होता है,
यह वाकया तो सारा भीतर ही घटित होता है,
लेकिन सब कुछ न भी हो, इतना तो निश्चित होता है,
संसार में जीना पहले से आसान होता है। 
तितिक्षा के अभ्यास से अनित्य का प्रभाव कम हो जाता है,
गुरु कृपा से अशुभ प्रारब्ध भी क्षीण हो जाता है। 
सेवा और समर्पण से कभी अहंकार मिटे न मिटे ,
गुरु कृपा से हो भगवत्कृपा, संसार के बंधन मिटे। 

संसार का बंधन यह संसार नहीं है,
यहाँ हो रहां विनिमय व्यापार भी नही है,
बंधन है मात्र, अहंकार के द्वारा, संसार का परिचय,
अहंकार के बिना तो, यह संसार ही है वासुदेवमय। 

प्रणिपात हम कर सके, गुरुदेव कृपा कर दो,
प्रश्न रहे न रहे, सेवा का वर दो,
हमे नही चाह अब किसी और बात की,
कृपा कर दे, हमें शरण मिले आपकी। 

ॐ गुरु शरणम् ,ॐ गुरु शरणम् ,ॐ गुरु शरणम्। 



Thursday, May 5, 2016

ॐ गुरु शरणं (Birthday on 5th May 2016)

सृष्टि से पूर्व क्या प्रलय हुआ था ?
या प्रलय से पूर्व सृष्टि नहीं थी ?
क्या सृष्टि के पश्चात प्रलय नहीं होगा ?
या प्रलय के पश्चात सृष्टि न होगी ?
नित्य निरन्तर परिवर्तन , यही है सृष्टि का क्रम ,
प्रति क्षण होती सृष्टि एवं प्रति क्षण होता प्रलय ,
पूर्व और पश्चात कुछ भी तो नहीं,
वर्तमान के अतिरिक्त और कुछ नहीं। 

चेतना का देह के साथ जब अवतरण हुआ,
रूदन, हास्य, भूख व प्यास का स्मरण हुआ,
चेतना का तादात्म्य देह के साथ होने लगा,
मन के संकल्प के साथ देह में विचलन होने लगा। 
चेतना मन के रूप में सीमित हो गयी,
असीमित का अंश देह के साथ मिश्रित हो गयी। 

विजातीय का मिश्रण कभी हो नहीं पाता ,
चेतना को देह की सीमा में चैन मिल नहीं पाता ,
अपने को देह के साथ सीमित जान लिया,
देह के सुख दुःख को अपना मान लिया। 
निरंतर अपना मूल स्वभाव कचोटता रहा,
असीमित चेतन देह की सीमा में विकल होता रहा। 

असीमित होने लगा भूख, प्यास, हास्य और रूदन,
देह की सीमित आवश्यकता लेकिन जीव कर रहा संग्रहण,
देह के साथ तादात्म्य से माना स्वयं को सीमित,
परमात्मा की सृष्टि में, जीव ने किया अहंकार निर्मित। 

सृजन तो मात्र परमात्मा ही करते हैं ,
स्वयं ही शक्ति से प्रकृति रूप रहते हैं ,
स्वयं ही चेतन, जीव रूप में हुए प्रकट,
माया का यह खेल स्वयं का, स्वयं ही बने हुए है नट। 

जीव निर्मित अहंकार भ्रान्ति के सिवा कुछ नहीं ,
इसी लिए मुक्ति की चाह , भ्रान्ति से मुक्ति की ही । 
जब बंधन स्वयं भ्रान्ति हो तो मुक्ति सत्य कैसे होगी?
भ्रान्ति के मिटने से भी मुक्ति, नहीं, शांति ही होगी। 

सत्य है परमात्मा, सृष्टि और यह परिवर्तन,
सत्य है माया के मध्य नटवर का यह नर्तन,
असत्य है, मात्र अहंकार और तादातम्य,
असत्य है प्यास, कि हो जाये स्थायित्व। 

निरन्तर परिवर्तन रूप है यह सृष्टि,
परिवर्तित हो जाये यदि हमारी दृष्टि,
त्याग दें, यह स्थायित्व की तलाश,
और स्वीकार करें, जो भी है आस पास। 

अपने को सीमित माना , इस भ्रान्ति को जान ले ,
निरन्तर रखें स्मरण, स्वयं को पहचान ले  ,
तो होने लगता है अहसास, कि यह स्व निर्मित अहंकार,
और इससे प्रेरित भोग और संग्रहण का यह व्यापार ,
इसी से है दुःख सुख, जीवन में व्याप्त कमियां ,
है प्रेम की कमी, अपनों के दरमियाँ। 

मूल कारण है हमारा अहंकार,
जो है मात्र भ्रान्ति , निराधार। 

"ऐसा लगता है कि यह कैसी बात है ?
अहंकार से ही तो जाना है यह अस्तित्व मैंने,
इसी से तो जाना है इस संसार ने मुझे,
यही तो हुँ मैं स्वयं ,
इसी से तो मैं जानता हुँ खुद को,
इसी से तो पहचानता हुँ इस संसार को। 
और कुछ क्षण के लिए चलो मान भी लें ,
यह मात्र भ्रान्ति है, ऐसा पहचान भी लें ,
तो फिर क्या है उपयोग इस सृष्टि व्यापार का,
कौन, क्यों, किसलिए ? खेल चलेगा संसार का?"

जो अहंकार हर क्षण अपनी और अपनों की चिंता में व्यस्त था,
सुख दुःख, नाम, धन, काम और यौवन में मदमस्त था,
कैसे बात करने लग गया देखो बड़ी बड़ी,
मानो सृष्टि चलाने की जिम्मेदारी इस पर आन पड़ी। 

अरे मूर्ख, अपने दुःख सुख से तो, परेशान है कितने दिन से,
तलाश रहा था कि, काश ! मुक्ति मिल जाये इस झंझट से,
अपनी देह के परे चिंता की , तूने मात्र देह से जुड़े सम्बन्धों की,
अपने धन, मन-मर्यादा, इच्छा पूर्ति और प्रसिद्धि की। 
अब अपने आप को पहचान, 
सृष्टि के शाश्वत परिवर्तन को जान,
इसमें स्थायी अपनी दृष्टि को पहचान,
अपने तादात्म्य को जान , सत्य को पहचान। 

इस सृष्टि से कहीं दूर नहीं जाना है,
किसी नयी परिस्थिति की तलाश में नहीं भटकना है,
अपने कर्त्तव्य से कहीं दूर नहीं होना है,
कर्त्तव्य को जानना और बेहतर पूरा करना है। 

कर्त्तव्य है सदैव वर्त्तमान में,
न भूत काल, न भविष्य में,
क्षमता जितनी, उतना है कर्त्तव्य,
क्षमता के परे, नहीं कोई दायित्व,
कर्त्तव्य तय होता है व्यक्तिगत परिस्थिति से,
उस व्यक्ति की स्वयं की मनःस्थिति से। 
ऐसे कर्त्तव्य को जो सत्यता से पूर्ण करे,
उसकी अहंकार की भ्रान्ति स्वतः ही मिटे। 

"यदि इतना ही आसान है, तो भ्रान्ति मिटती क्यों नहीं है ?
दुःख सुख से मुक्ति हमें मिलती क्यों नहीं है ?
क्यों तलाश कर रहें है हम निरन्तर आगे बढ़ने की ,
यदि शांति मिलने के लिए जरूरत है मात्र ठहरने की ?"

थक गए हो तुम , इसलिए चाहते हो ठहराव,
मरहम ढूंढ रहे हो, संसार से मिले है इतने घाव,
यह अनुकूल में स्थायित्व की तलाश,
प्रतिकूल के परिवर्तन की जगाती है प्यास,
अनुकूल या प्रतिकूल, दोनों का परिवर्तन निश्चित है,
लेकिन, तुम्हारी भूमिका अनिश्चित है,
तुम्हारा कर्त्तव्य का पालन तुम्हे शान्ति के पास लाता है शनेः शनेः,
अहंकार का शमन, दुःख - सुख का नाश होता है शनेः शनेः। 

तुम्हारे परिवर्तन तुम्हारे भीतर होते हैं ,
दृष्टि के परिवर्तन से दृश्य तुम्हारे लिए बदलते हैं ,
तुम मुक्त होने लगते हो तनाव से,
मुक्त होते हो बंधन के भाव से,
यही संसार तुम्हें घाव नहीं, पुरस्कार देने लगता है,
मन शिकायत की जगह कृतज्ञता से भरने लगता है। 
दुःख पूर्ण सृष्टि तुम्हारे लिए शान्त होने लगती है,
दूसरे के दुःख के लिए, करुणा जगने लगती है। 
कर्त्तव्य के प्रति समपर्ण बढ़ने लगता है,
संसार चक्र तुम्हारे लिए सुखपूर्वक चलता है। 
प्रतिकूल घटना होती है, दुःख घट जाता है,
सकारात्मकता बनी रहती है, शीघ्र मन शान्त हो जाता है। 

"ऐसा हो जाये, कौन नहीं चाहता है,
यह चमत्कार जीवन में कैसे घट पाता है ?"

परमात्मा की कृपा से मिल जाये सद्गुरु,
वे कृपा कर अपना ले, तब होता है नवजीवन शुरू,
निरन्तर प्रार्थना यही है गुरुदेव से,
आप हैं समर्थ, हम मगन अपनी नींद में,
निरन्तर स्वप्न के दुःख से, दुःखी - सुखी हो रहे हैं ,
आप दया कर जगा दो, यह प्रार्थना कर रहे हैं। 
ले लो हमें शरण में, हमें समर्पण भी नहीं आता। 
जन्म जन्मांतर से, अहंकार का अभ्यास, झुक भी नहीं पाता।
आप कृपा कर अपनी दृष्टि से,
मुक्त कर दो हमें स्व निर्मित अहंकार की सृष्टि से। 
आप से कर सकें प्रार्थना निरन्तर, बस इतनी कृपा कर दो,
सदैव आश्रय ले मात्र आपका, बस इतनी दया कर दो,
मन करे मात्र यही स्मरण,
ॐ गुरु शरणं , ॐ गुरु शरणं , ॐ गुरु शरणं। 

Saturday, August 22, 2015

व्यर्थ है मुक्ति की तलाश !

मुक्ति कौन चाहता है इस संसार से,
व्यक्ति चाहता है मात्र अपने दुःख से मुक्ति। 

जीवन चलता रहता है सुख दुःख की श्रृंखला में,
कभी ऐसा पीड़ा का अनुभव होता है कि सुख व्यर्थ दीखने लगते है,
उत्पन्न हो जाता है प्रश्न,
कि क्या यह सारा सुख स्वप्न मात्र था ?
और शुरू हो जाती है 
पीड़ा अथवा दुःख से मुक्ति की तलाश। 

जीवन शांत मंथर गति से गुजर सकता है,
लेकिन दूसरे को देख कर जागने लगता है,
ईर्ष्या अथवा प्रतिस्पर्था का भाव,
अनुकरण करने या अनुयायी बनाने की इच्छा,
महत्वाकांक्षा बढ़ती जाती है और 
जो प्राप्त है वह अपर्याप्त होता जाता है,,
बाहर समृद्धि और भीतर खालीपन बढ़ने लगता है,
और शुरू हो जाती है किसी दिन -
महत्वाकांक्षा या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

पूर्व जन्म के किसी संस्कार के कारण 
सांसारिक सुख व्यर्थ दीखने लगते है,
और मन साधना करना चाहता है,
लेकिन संसार आ बैठता है विचार के माध्यम से,
बस जाता है मन के भीतर ,
दुखी होने लग जाता है साधक अपने ही मन से,
और शुरू हो जाती है,
विचार या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

सब पा लेता है व्यक्ति जो चाहा था,
स्वास्थ्य, साधन, सम्पत्ति, परिवार। 
प्रारब्ध के अनुसार जीवन सुख से भर जाता है,
लेकिन सताने लगता है प्राप्त के खोने का भय,
अपनी मृत्यु तथा अपनों की मृत्यु का भय,
भविष्य में हो सकने वाले दुःख का भय,
और शुरू हो जाती है,
भय या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

सांसारिक सम्बन्धो में खोजता रहता है व्यक्ति प्रेम,
हर बार संदेह उठता है मन में,
अपने प्रेमास्पद पर अथवा उसकी अनुपस्थिति पर,
कभी प्रेम का पात्र बदल जाता है,
कभी परिस्थिति बदल जाती है,
जीवन आगे बढ़ जाता है,
प्रेम प्रतीक्षा करता रह जाता है,
उदय होता है कहीं मन के किसी कोने में 
हताशा या निराशा का भाव,
और शुरू हो जाती है,
निराशा या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

व्यक्ति जागरूक होकर कर्त्तव्य का पालन करना चाहता है,
प्रारब्ध के वश मिली हुई परिस्थिति में,
स्वयं, परिवार, कुटुंब या राष्ट्र के प्रति 
कर्त्तव्य पूरा नहीं कर पाता है,
ऐसा स्वयं के प्रति दोष मन में जाग उठता है,
मन में असमर्थता का दुःख जागने लगता है,
और शुरू हो जाती है,
दोष या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

स्वयं को मिला हुआ साधन सुख,
या पूर्व जन्मो के संस्कार,
या प्रारब्ध अथवा पुरुषार्थ से मिला संग साथ,
व्यसन या अवगुणो को जन्म देता है,
परिणाम होता है शारीरिक अथवा मानसिक पीड़ा,
और शुरू हो जाती है,
व्यसन या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

सब पाकर या अत्यल्प भी पाकर,
व्यक्ति को होता है अपने शरीर, परिवार एवं साधन का अहंकार,
बढ़ता जाता है कीर्ति या सम्मान का भाव,
अत्यंत नाजुक अहंकार चोटिल हो उठता है,
अकारण या अनेकानेक कारणों से,
ला देता है मन में दुःख का सैलाब,
और शुरू हो जाती है,
अहंकार या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

यह तलाश ले आती है,
गुरु या परमात्मा की शरण में,
लेकिन मुक्ति की तलाश तो पूरी हो जाती है समता में,
समत्वं योग उच्यते। 

अरे, तो फिर व्यर्थ क्यों है मुक्ति की तलाश?
क्योंकि यह शुष्क धरातल है,
मुक्ति से कुछ मिलता नहीं,
वरन मन से संसार चला जाता है,
और जो था, है, वही रह जाता है। 

आनंद है प्रेम में,
भक्ति में, शरणागति में,
क्या फर्क पड़ता है 
यदि कुछ जन्म और हो जाये ?
यह परमात्मा का ही रचा हुआ संसार,
जहाँ उनके अतिरिक्त कोई और तत्त्व है ही नहीं,
उस संसार से मुक्ति की चिंता क्यों की जाए ?

परमात्मा प्रकट होते है गुरु के रूप में,
प्रदान करने को अपनी करुणा,
पूर्ण करने को जीव की शाश्वत प्यास । 
जीव की वास्तविक तलाश है प्रेम की, अनंत काल से,
प्रेम के लिए किये है अनेक जतन, जन्म जन्मान्तर से,
परमात्मा करते हैं जीव पर कृपा किसी जन्म में,
प्रकट हो जाते है वे अनंत अगोचर, दृश्य रूप में ।
जब प्रेम प्रकट हो जाये गुरु के रूप में,
परमात्मा स्वयं कृपा कर दे और आनंद बरसाये ,
व्यर्थ है मुक्ति की तलाश,
जीवन आपके श्री चरणों में कट जाये,
आप की कृपा बरसती रहे,
अमृतवाणी सुनने को मिलती रहे,
इतना ही पर्याप्त है,
दुःख सहने का तो जन्मो का अभ्यास है। 

दुःख से मुक्ति की अब चाह नहीं,
आपका साथ मिला है कृपा से,
मुक्ति का अब कोई लाभ नहीं। 

प्रणाम,
जय जय जय गुरुदेव।

Tuesday, May 5, 2015

तैयारी (Birthday on 5th May 2015) Gurudev's preachings

जीवन और मृत्यु का फासला घटता जा रहा है निरंतर,
यही तो प्रत्येक जन्मदिन स्मरण करवाता है
लेकिन मन तो इसे  भी भूल जाता है,
और तैयारी में जुटा रहता है, उम्र भर। 
आगे और जीने की तैयारी,
अपने बच्चों के और बढ़ने की तैयारी,
अपने बड़ो के मरने की तैयारी,
स्वयं के सुख भोग की तैयारी,
ऐसे ही कभी बज जाती है घण्टी ,
और  होने लगती है चलने की तैयारी। 

कितने संदेशे भेजते हैं भगवान ,
कैसे कर पाये स्मरण यह इंसान,
दाँतो का हिलना, बालों का सफ़ेद होना,
असमय बीमार होना, अधिक न  खा पाना ,
भोजन न पचना, शक्ति का क्षय होना,
भगवान से ज्यादा डॉक्टर को याद करना,
लेकिन मन तो अटका रहता है,
बस कुछ दिन में तबीयत ठीक होने की,
इंतज़ार करता रहता है,
आशा पर टिका है जीवन,
सुख भोग की आशा करता रहता है। 

मन तो निरंतर जवान बना रहता है,
इसकी आशा, तृष्णा में कोई अंतर नहीं आता है। 
यह बार-बार घूमता रहता है, उसी चक्र में,
न थकता है, न पकता है, 
न मरता है और न ही मरने देता है। 

इसका यह स्वभाव चाहता है कि गति हो वर्तुल में,
चक्र की तरह घूमते हुऐ भी,
हर बार बड़ा करले अपनी परिधि को,
न पुनः आना पड़े, वहीँ पर लौट कर,
बढ़ता रहे  वृत्त अगली कक्षा की और। 

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ऐसा परिवर्तन संभव है - 
जब जीवन के उत्थान का मार्ग जान लिया जाये,
इस खुले रहस्य की कुंजी मन को मिल जाये,
कि निरंतर अपनी स्थिति में होता रहता है परिवर्तन,
स्थिरता कभी होती नहीं, शाश्वत है परिवर्तन। 

ताकि मन का ध्यान शाश्वत की और चला जाये,
शाश्वत का स्मरण यदि बना रहे,
मन की गति स्वतः ही अगली कक्षा में जाये,
इस तरह मन  का वर्तुल बड़ा होता जाये,
और जीवन अपने लिए नित नये अर्थ खोजता जाये। 

जीवन के अर्थ की तलाश पूरी होगी तभी,
जब यह पा लेगा, शाश्वत को,
जो परिवर्तन से परे है, उस सत्य को,
जो आधार है इस अस्तित्व का,
जिसको पाना ही है लक्ष्य मानव जीवन का। 

इन्द्रिय सुख की पूर्ति मन चाहता है निरंतर,
इसी में कहीं छिपी है, सत्य की प्यास उम्र भर,
कहीं, कभी, किसी दिन  लगता है,
आखिर कब तक घूमता रहूँ मैं इस तरह,
कुछ तो आगे बढ़ूँ जीवन में किसी तरह,
यही सार्थक की तलाश जोड़ देती है,
किसी ऐसे स्रोत से,
जिसे हो गयी है सत्य की उपलब्धि,
जो प्रसन्न है सदैव,
क्योंकि पा लिया है शाश्वत को,
नहीं है शेष कुछ करने को,
नहीं है शेष कुछ पाने को,
और नहीं है शेष कुछ जानने को। 

यदि सौभाग्य से मिलना हो जाये,
गुरु भाव मन में जग जाये,
तो शेष जिम्मा लेते हैं स्वयं गुरुदेव,
करते है निरंतर चोट,
ताकि प्रकट हो सके परमात्मा,
हो जाये भगवत्कृपा ,
मिल जाये दुःखो से छुटकारा ,
प्रसन्नता हो जाये सदा के लिए। 

क्या इसका अर्थ संसार से मुक्ति है ?
क्या इसका अर्थ सन्यास या कर्म से मुक्ति है ?
नहीं, इसका अर्थ सम्यक् ज्ञान है,
सम्यक् कर्म, सम्यक् स्वभाव है। 
सभी कर्म होते रहे लेकिन भाव बदल जाये,
अहंकार के स्थान पर कृतज्ञता आ जाये,
व्यसन छूटे और दुःख मिट जाये,
जीवन का हर कर्म यज्ञ बन जाये। 

करना क्या होगा,
जागरण अपने मन के प्रति,
होश रहे हर कार्य के प्रति,
विवेक करे निर्धारण जीवन पथ का,
न रहे स्वयं पर नियंत्रण मन का। 

ऐसी गुलामी है मन की कि स्वयं भी नहीं जानते हैं। 
अपनी गुलामी को ही आज़ादी मानते हैं। 
अपने मन की करने को मनमानी समझते हैं ,
अहंकार के कारण क्षणिक प्रसन्न हो जाते हैं। 
कर्त्तव्य पालन का सुख जब मिलता है,
दुःख से छुटकारा तभी मिलता है। 
तब  तक तो हर कामना का परिणाम लोभ या क्रोध,
नियंत्रण नहीं हो पाता, जागने लगता है बोध। 
 उपाय है मात्र शरण, परमात्मा या गुरु चरणो की,
शरण हेतु युक्ति है एक मात्र प्रार्थना की। 
अपनी ओर से सब करने का प्रयास,
और बनी रहे कृपा की आस,
एक दिन निश्चित ही काम बन जायेगा,
भव बन्धन से छुटकारा मिल जायेगा। 


Monday, November 3, 2014

शरण

तुम क्यों चाहते हो दुःख से मुक्ति ?
क्या तुम्हे पता है सुख भी समाप्त हो जायेगा 
दुःख के साथ ही। 
कहते हैं कि एक अलौकिक आनंद मिलेगा उसके बाद,
जिसका शब्दों में वर्णन संभव नहीं। 

क्या तुम्हे विश्वास नहीं है अपने सद्गुरु पर,
जो चिता करते हो सुख और दुःख की ?
क्या करना है इस लोक के दुःख और सुख का,
जब गुरुदेव कर सकते है बेडा पार इस लोक से ही। 

इस छलांग के लिए मन तैयार क्यों नहीं है ?
क्योंकि उसे पता है कि यह मात्र छलांग नही ,
वरन मन की मौत है। 
मन  तो अनुभव कर सकता है मात्र दुःख या सुख,
आनंद का अनुभव तो आत्मा का विषय है। 
मन भला इसको कैसे स्वीकार करे ?

मन के बिना कोई अभिव्यक्ति भी नहीं,
संकल्प और विकल्प भी नहीं,
विचार और उनका ठहराव भी नहीं,
है बस एक अनिवर्चनीय शांति,
जिसका प्रमाण है मात्र सद्गुरु,
उनके सिवा जानने का कोई और ढंग भी नहीं। 

ऐसे में क्या करें,
मन तो अपने दुःख से मुक्ति चाहे,
और सुख की निरंतर चाह करे। 
बुद्धि तो मन की चेरी है,
नित्य मन की ही परवाह करे। 
आश्रय है मात्र विवेक
जिसे जगाते है सद्गुरु,
जो है परमात्मा के आलोक की किरण,
विवेक के द्वारा ही संभव है यात्रा। 

सद्गुरु निरंतर करते है मार्गदर्शन,
अपनी उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों में,
जगाते रहते है दृष्टा भाव,
हर अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति में,
कृतज्ञता का भाव इसे गति देता है,
भाव से साधक को लाभ अधिक मिलता है। 

साधक तो वही है, जो अटका हुआ है अभी राग द्वेष में,
लेकिन उसे विश्वास हो गया है अपने गुरु पर,
तैयार है अज्ञात में छलांग लगाने को,
जहाँ संसार छूट जायेगा और आनंद मिल जायेगा। 

परमात्मा को चाहे माने या न माने ,
प्रकृति की शक्ति को सभी स्वीकार करते है,
शक्ति की कल्पना बिना शक्तिमान के,
मूढ़ वैज्ञानिक और अहंकारी ही करते है। 
शक्ति के पीछे है सार्वभोम चेतना,
जो सुन सकती है और स्वीकार कर सकती है प्रार्थना,
इतना सा मान लेना ही तो है परमात्मा की स्वीकृति। 

और जो यह मान लो कि यह शक्ति असीम है,
अकल्पनीय है, कर सकती है मानव शरीर धारण,
देने को शिक्षा मानव जगत को,
करने को संसार का कल्याण ,
हो जायेगा अवतार की अवधारणा का समाधान। 

सगुण साकार को मानते ही तो भाव उमड़ पड़ते है,
क्या परम दयालु परमात्मा हमारे लिए इतना कष्ट करते है,
मानव शरीर में आकर लीला प्रकट करते है,
भव तारण हेतु गीता ज्ञान प्रकट करते है। 

ऐसे परम कृपालु पुनः पुनः अवतरित होते है,
सद्गुरु की देह में स्वयं को प्रकट करते है,
मानव पर कृपा का अंत नहीं,
उनकी दया का अंत नहीं,
हमारा कोई पुण्य नहीं,
और कोई पुरुषार्थ नहीं,
नहीं जानते रहस्य इस अनन्त कृपा का,
मात्र कर सकते है प्रार्थना हम,
दे दो शरण,
नहीं कर पाते हैं अपना कर्त्तव्य भी,
बस एक ही आस है हमारे पास,
आपकी शरण की। 




Monday, May 5, 2014

प्रार्थना (Birthday on 5th May, 2014) - Preachings from Gurudev

जन्म को पूर्ण हुए 44 वर्ष,
या मृत्यु की दूरी कम हुई 44 वर्ष ?
कहने के ढंग का ही अंतर है।

जीवन के गुजरते हुए समय के साथ,
क्या मुझमें भी कोई अंतर आता है ?
क्या शरीर का जन्म, तरुणाई, जवानी और प्रौढ़ावस्था,
ये सारे बदलाव मुझमें भी होते हैं ?
मेरे मन की स्थिति तो हर समय बदल जाती है,
कुछ स्मृतियाँ स्थाई हो जाती है,
मन उन्हें बार बार दोहराता है,
यादों की जुगाली करते करते,
अपने ढंग से उन्हें बदल भी देता है।
और लगने लगता है कि
जीवन को जिया है मैंने अपने ढंग से,
संतोष के साथ।
बुरी स्मृतियॉ परे हटाकर
मन अतीत को खुशनुमा बना लेता है।

लेकिन जीवन अतीत में कहाँ चलता है,
मन तो भविष्य की आशा व आशंकाओं में,
भटकने लग जाता है,
कभी आत्म विश्लेषण का प्रयास करने लग जाता है,
कभी अपने चारों ओर कमियाँ ढूंढने लग जाता है,
ऐसे ही गुजरता रहता है समय।

किसी क्षण परमात्मा की कृपा से व्यक्ति का ध्यान चला जाता है,
स्वयं, अपने आप पर,
किसी संत के दर्शन से चोट लग जाती है,
कुछ खोया हुआ सा है, जिसका उसे पता नहीं,
लेकिन लगता है कि इन्हें पता है सही,
कृपा हो जाती है संत की,
गुरु से मिलन हो जाता है,
जीवन को अर्थ मिल जाता है।
सूचना और ज्ञान का अंतर पता चलता है,
समझ आता है कि,
तथ्य भी सापेक्ष है भावनाओं की तरह,
सारा विद्वता का दंभ साथ छोड़ने लगता है।

अपने को जाने बिना, व्यर्थ है सारी जानकारी,
अपनी पहचान क्या शरीर से है ?
हां, अन्य तो इसी को पहचानते हैं ,
लेकिन यह बदल रहा निरंतर,
दर्पण से हम भी जानते हैं ,
क्या हम मन एवं स्मृतियों से खुद को पहचानते है,
लेकिन इनमें भी निरंतर परिवर्तन ?
तो क्या हम अपनी आदतों या स्वभाव से खुद को जानते हैं ?
स्वभाव ऐसा ही बना रहता है जीवन भर,
लेकिन क्या हम आदतों का समूह मात्र है?
जैसे आँख आँख को नहीं देख सकती,
तो देह, मन, स्वभाव को यदि हम देखते हैं,
तो कोई देखने वाला इनके अतिरिक्त ही है।

दृष्टा, दृष्टि और दृश्य,
इनमें अदृश्य तो मात्र दृष्टि ही है।
दृश्य के परिप्रेक्ष्य में ही है, दृष्टा और दृष्टि का भेद,
अन्यथा दृष्टा और दृष्टि एक ही है।
यदि हम दृष्टि मात्र हैं ,
तो क्या हम इस दृश्य में भिन्न-भिन्न है ?
या फिर यह दृष्टि रूप से व्याप्त सम्पूर्ण तत्त्व एक ही है ?

शरीर बना है पांच महाभूत से,
पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश,
जो हम सभी के शरीर में एक ही है,
यह आसानी से समझ में आ जाता है।
मन जिसे हम अपना अलग मानते है,
इसकी गति प्रकाश से भी अधिक है मानो ,
संसार के श्रेष्ठतम और निकृष्ट विचार आते है सभी के मन में,
ऐसा इसलिए होता है,
जैसे वायु एक होते हुए भी अलग अलग स्थान पर भिन्न होती है,
स्थान के अनुसार ही वायु का सेवन हम करते हैं ,
इसी प्रकार सम्पूर्ण संसार के एक ही मन के,
अलग अलग विचारों का आना जाना अपने मन में देखते हैं।

ऐसे में सवाल उठता है,
कि यह शरीर, मन, स्वभाव आखिर है किसलिए?
मानव को जन्म मिला है, आनंद के लिए,
और इसी का प्रयास तो कर रहे है हम,
लेकिन हर प्रयास एक समय के बाद असफल क्यों सिद्ध होता है?
सीमांत उपयोगिता का नियम हर वस्तु पर क्यों लागू होता है?
हर कामना का परिणाम लोभ या क्रोध क्यों होता है?
हर मजे की घटना का अन्त दुःख में क्यों होता है ?
ऐसे में स्वयं को जानना जरूरी हो जाता है।

अभ्यास है हमारा जानने का,
सूचनाओं एवं प्रयोगों के माध्यम से,
ज्ञान और कर्म के मार्ग स्वयं को जानने की राह बतलाते हैं,
निष्काम कर्म और स्थिर मन से प्रयास करने होते हैं,
जीवन का वर्षों का अभ्यास ऐसा होने कहाँ देता है ?
कभी थक जाने पर यह पता चलता है,
कि स्वयं को नहीं जान सकते अपने प्रयास से।

समर्पण के बिना यात्रा प्रारम्भ नहीं होगी,
समर्पण किसके प्रति,
परमात्मा को जाना नहीं,
वो है भी, या नहीं ?
कैसे कर सकते हैं समर्पण और क्यों भला ?
क्यों का उत्तर है कि जब सारे प्रयास असफल हो ही गए,
तो और विकल्प ही क्या है?
यह शरीर तो समाप्त हो ही जायेगा,
इसके बाद अवसर भी क्या है?
किसके प्रति का उत्तर है, उस अज्ञात के प्रति,
जो प्रतिध्वनित है स्वयं के अस्तित्व में,
स्वयं के होने से तो कोई इंकार किसी को भी नहीं।
कैसे का उत्तर तो प्रार्थना के सिवा क्या हो सकता है भला?
प्रार्थना के लिए भाव हो जाग्रत यही है आवश्यकता।

हमारा जानने का अभ्यास स्थूल के माध्यम से है,
इसीलिए परमात्मा हमारे कल्याण हेतु देह धारण करते है,
या फिर आत्मज्ञानी सन्तों में अवतरित होते हैं ,
अपने को प्रकट करते है, भाव जागरण होने के लिए,
गुरु के रूप में मिल जाते है,
करुणावश कृपा कर देते हैं,
अकारण,
अपात्र पर भी।

भावग्राही जनार्दन।
भाव नहीं,
तो भी करें प्रार्थना,
उनसे ही कहें कि -
भाव करें जाग्रत,
ताकि,
हम कर सकें प्रार्थना।

Wednesday, December 18, 2013

मुक्ति

सांसारिक सुख की वर्षा में,
कुछ देर के लिए भूलने का प्रयास,
अपने दुःख को या अपने आप को,
पुनः पुनः लौटा देता है,
व्यक्ति को वही पर,
उदासी छाने लगती है,
शाश्वत बेचैनी एक बार फिर,
घेर लेती है। 

अपने मन में याद करता है,
बीते हुए अच्छे पलों को,
एक मुस्कराहट छा जाती है,
मन में जाग जाती है एक उमंग,
मन खोने लगता है, यादों में,
लेकिन फिर कुछ देर बाद,
पुनः आ जाता है वर्तमान में,
नहीं - नहीं,
फिर खो जाता है किसी और पुरानी याद में,
या कोई आशंका का सर्प फुँकार उठता है,
भीतर कोई तुलना या ईर्ष्या का दावानल,
प्रज्ज्वलित हो उठता है,
और शुरू हो जाता है एक नया दौर,
शिकायत का,
अथवा अपने दुर्भाग्य को कोसने का। 

कभी वर्तमान पर ध्यान चला जाता है,
कोई भी तो कष्ट नहीं है अभी इस समय,
अतीत या भविष्य में ही हैं सारे दुःख,
वर्तमान में है दुःख का अभाव,
यही तो है सच में सुख,
जिसे कहते है आनंद । 

लेकिन ध्यान वर्तमान में ठहरता नहीं,
दुःख दूर करने का प्रयास शुरू हो जाता है,
खुद को अच्छा बुरा समझाता है,
व्यक्ति स्वयं और आस पास के सभी लोग,
तथाकथित अपने है जो,
मित्र, साथी और सम्बन्धी, परिवार जन और कुटुम्बी,
कहते हैं कि हमें क्या है,
हम तो तुम्हारे भले के लिए कह रहे है,
भविष्य में समझ आएगा तो पछताओगे। 
ऐसे में प्रश्न यही कि,
अपने कर्त्तव्य का पालन कैसे होगा। 

कर्त्तव्य का पालन सभी करना चाहते हैं ,
पर कर्त्तव्य का निर्धारण नहीं कर पाते हैं। 
कर्मफल के आधार पर निर्धारण,
या अपनों की इच्छा के आधार पर निर्धारण,
या अपनी इच्छा के आधार पर निर्धारण,
या अपने अहंकार के आधार पर निर्धारण,
कुछ भी कर्त्तव्य को नहीं बतलाता है। 
कर्त्तव्य तो व्यक्ति की स्थिति और 
प्रारब्ध से प्राप्त परिस्थिति के अनुसार,
निर्धारित होता है। 
अंतिम लक्ष्य सब का है भगवत प्राप्ति,
कर्त्तव्य का उद्देश्य सदैव,
करने के वेग की शांति। 
दूसरों के हित के लिए काम करें ,
ऐसा प्रयास देता है शांति। 

लेकिन तन और मन को होने लगती है थकान,
अतः मन भी चाहता है कुछ मनोरंजन,
अहंकार से उत्पन्न होते है विकार,
जो करते है सांसारिक सुखों में आकर्षित,
तर्क जाग उठता है,
संसार परमात्मा ने बनाया है आनंद के लिए,
प्रारब्ध के अनुसार सभी पाते हैं सुख दुःख,
अर्थ और काम से दूर हों किसलिए ?
त्याग के पश्चात, अपने भाग का उपभोग,
भला अनुचित कैसे होगा ?
सांसारिक सुखों को पाने का प्रयास,
भला अनुचित क्यों कर होगा। 

भगवत्प्राप्ति 
है परम आनंद कि स्थिति,
इसे पाने के बाद कोई आकर्षण नहीं रह जाता है,
इस संसार के सुखो में कोई रस नहीं बच जाता है,
तम , रज और सत्व, तीनो गुणो के परे,
है आनंद का महासमुद्र, 
जिसे पाने के लिए जीव  है बेचैन, उदास, लालायित,
लेकिन उससे पहले जीव को संसार के सुखो से वैराग चाहिए,
क्योंकि 
त्याग ना टिके रे वैराग बिना, करिये कोटि उपाय जी। 

प्रयास पूर्वक त्याग से हल नहीं होता है,
कुछ मदद मिलती है,
पुरानी आदतो को छोड़ने के लिए,
सुख भोग के समय विचार पूर्वक जागरण,
देता है आकर्षण से मुक्ति,
लेकिन दृढ अभ्यास है, पिछले अनेक जन्मों का,
स्वेच्छा से, बलात और अनायास भोगे हुए सुखों का,
स्वप्न की भाँति जीते रहने का,
कि जागरण नहीं रह पाता है हर समय। 

विषय चिंतन के समय से ही जागृति क्षीण होने लगती है,
आसक्ति मन पर छा जाती है, कामना प्रबल होने लगती है,
ऐसे में सुख भोग में जागरण रहता नहीं,
और वैराग्य की अग्नि प्रज्जवलित होती नहीं,
मान्यता से उत्पन्न हुआ दुःख,
माने हुए सुख के द्वारा भुला दिया जाता है,
कुछ देर के लिए मन प्रसन्न हो जाता है,
और अगले दुःख के लिए तैयार हो जाता है,
जैसे कोई श्रमिक बीड़ी के धुएँ में थकान मिटाकर,
पुनः काम में लग जाता है। 

इस दुःख से दग्ध मन पर संसार के सुख की बूँद,
गर्म तवे पर छन्न से गिरने वाली बूँद की तरह,
लुप्त हो जाती है,
कभी सुख वर्षा भी हो जाये तो, 
निरंतर जलती दुःख की आग बुझ नहीं पाती है। 
फिर भी, जैसे
चन्द्रमा की उपस्थिति में गिरने वाली ओस की बूंदे,
तन मन को शीतल कर देती है,
वैसे ही सदगुरु की उपस्थिति में, सत्संग में,
आनंद की वर्षा हो जाती है। 
लेकिन दुःख की आग को सदा के लिए मिटाना है तो,
गुरु से प्रार्थना यही कि,
आपकी कृपा से मिले, विषय चिंतन रुपी ईधन से मुक्ति,
दुःख अग्नि हो जायेगी शान्त, एक मात्र राह है शरणागति। 


Thursday, October 17, 2013

एक ही आस

मैं शरीर नहीं हूँ।
आता है समझ में कि मेरा शरीर बदलता रहा,
बचपन, जवानी और प्रोढ़ावस्था में,
मैं तो नहीं बदला, मैं तो वही हूँ।

मैं सुक्ष्म शरीर भी नहीं हूँ।
जब मुझे दिखाई देते हैं,
मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार,
देखने वाला रहता है इनके पार ,
जो देता है दिखाई, वह स्वयं नहीं हो सकता,
इसीलिए सुक्ष्म शरीर मेरा अस्तित्व नहीं हो सकता।

कारण शरीर कहते हैं कि
स्वभाव है, अज्ञान है, प्रकृति है,
इसके विषय में समझने से लाभ कम,
अधिक भ्रान्ति है।
अतः जानने वाला यह नहीं हो सकता,
इतना समझ लेना ही काफी है।

जो जानता है,
जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति को,
जो देख सकता है इन सभी को,
जिसको देखना संभव नहीं,
जिसके लिए सभी दृश्य है,
क्या है स्वयं दृष्टि वही,
दृष्टा जैसा कोई नहीं, जानने वाला भी नहीं,
उसमे स्थित होने जैसी कोई स्थिति भी नहीं,
शुन्य यदि नहीं भी हो, कोई सीमा भी नहीं।
असीमितता का बोध होता है,
सर्वज्ञता या सर्वशक्तिमता का नहीं।

यदि मन के प्रति नहीं है साक्षी भाव,
मन विषय-चितन से बढ़ जाता है, आसक्ति की ओर,
आसक्ति से बढ़ जाता है, कामना की ओर,
कामना से उत्पन्न होता है लोभ, अंततः क्रोध,
क्रोध से संमोह, स्मृति लोप, अंततः विनाश।
यदि साक्षी भाव बना रहे,
विषय चिंतन, आसक्ति या कामना के स्तर से,
संभव है मन का पुनः शांत अवस्था में लौट जाना,
साक्षी के रूप में मन की स्थिति को देख पाना,
लेकिन इसके बाद प्रकृति का है साम्राज्य,
विनाश के बाद ही जाग सकता है पश्चाताप,
परिणाम हो सकता है साधना के प्रति आग्रह,
और दृढ हो सकता है साक्षी भाव।

लेकिन यह मन क्यों चाहता है,
वासना के भंवर में डूबना बार बार,
दुःख के निश्चित अंत की ओर बढ़ता है बार बार,
स्वयं की नज़रों में होता है शर्मसार।
क्यों चाहता है देखे और आजमाए हुए,
अनेको बार ठोकर खाए हुए,
उन्ही दुष्चक्रो से गुजरना बार बार ?
लगता है कि एक अदम्य आकर्षण है दुःख में,
जो आता है सुख का नकाब  ओढ़ कर। 
लोभ और संग्रह परिणाम है कामनापूर्ति का,
और क्रोध परिणाम है कामना अपूर्ति का,
दुःख है एक सा परिणाम दोनों का। 

संयोग से प्राप्त प्रत्येक सुख,
है मात्र एक आभास,
क्योंकि समय के चक्र में,
वियोग भी खड़ा है पास। 
वियोग की निश्चितता कर देती है दुःख को भी निश्चित,
नहीं रहने देती है, इस मर्त्य जगत में, कभी निश्चिन्त। 

समझ सब आने पर भी क्या कुछ भी समझ नहीं आता है,
चित्त में संग्रहित संस्कार, आदत ही बन जाता है। 
कौन चाहता है? संसार के सुखों में  बने रहना,
निश्चित दुःख की राह में आगे बढ़ते रहना,
"मन" जो कि संसार का प्रतिरूप है,
अमन होना ही स्वयं का स्वरुप है। 

लगता है कि चुनाव कुछ कठिन नहीं है -
दुःख और सुख दोनों ही एक समान है,
अतः साक्षी भाव ही एक मात्र समाधान है। 
लेकिन यह भी सदा कहाँ रह पाता है,
ऐसे में मुझे तो बस एक मार्ग नजर आता है,
ले लो शरण अपने गुरु या ईश्वर की,
कृपा जो करते है सदा अहैतुकी। 

समर्पण ही यात्रा की शुरुआत करता है,
और यही यात्रा को आगे बढाता है,
और इसी से हो जायेगा यात्रा का समापन,
गुरुदेव की कृपा से मिलता रहे मार्गदर्शन। 
अपने गुरु के दर्शन, क्या मात्र शरीर के दर्शन हैं,
परमात्मा भी प्रकट होने के लिये लेते आश्रय है,
योगमाया के बिना संसार प्रकट नहीं होता है,
गुरु के रूप में ही परमात्मा का दर्शन यहाँ होता है। 
जो सर्वव्याप्त है, वह तो स्वयं में भी मिल जायेगा,
जब गुरु की कृपा होगी, खुद ही प्रकट हो जायेगा। 

मेरे गुरु ने कब चाहा कि कोई आये उनके पास,
करो जी भर कर संदेह, नहीं कहा, करो विश्वास,
जब स्वयं का संदेह श्रद्धा में परिणत हो जाता है,
प्रत्यक्ष ही स्वयं, प्रमाण बन जाता है। 
भगवत प्राप्ति और आत्म-ज्ञान अच्छे शब्द लगते है,
दुःख मिट जाये सदा के लिए, अतः करणीय लगते है,
यह करने से होगा नहीं और बिना किये होगा नहीं,
समर्पण ही है करने को, इसके सिवा कुछ भी नहीं,
शेष सभी मात्र कृपा से, संभव होता है,
मेरे अनुभव में तो समर्पण भी कृपा से ही होता है। 

अतः गुरुदेव कृपा करो, अवश मुझे रहने दो,
चरणों का दास बना लो, सृष्टि का साम्राज्य रहने दो। 
दृष्टि ही प्रकाश है, नित्य का अनुभव बन जाये,
जो क्षण का मोक्ष मिलता है, सदा का अनुभव बन जाये। 
लेकिन मुझे तो नहीं पता, कि क्या करूं प्रयास,
प्रयोग कर रहा निरंतर, आप सदा रहो पास। 
आपका साथ के अतिरिक्त कोई मांग नहीं,
एक ही आस गुरुदेव की, दूजी कोई आस नहीं।

Friday, September 20, 2013

शरणागति

जो है, जैसा है, उसे स्वीकार करना सर्वोत्तम विधान है।
ईश्वर की कृपा सदा, यह स्वीकार करता अभिमान है।
ऐसा ही अपने बारे में सोचता रह गया,
अपने अवगुणों को भी विधान मानता रहा।
करता रहा सारे कर्म, यही मन में विश्वास लिए,
जन्म हुआ इन कामना के साथ, इनकी पूर्ति के लिए।
काश इस जन्म में यह कामना पूर्ण हो जाये,
ताकि अगले जन्म में इससे मुक्ति हो जाये।

सुख मिलता तो उसे भी विधान मान लेता था,
दुःख मिलता था, उसे भी स्वीकार कर लेता था,
सोचता था मानव जीवन दुःख सुख से है भरा हुआ,
कामना, दुःख और सुख का साथ सदा जुड़ा हुआ।
इसलिये जो बन सके वह सेवा करो,
अपने मन को सुख मिले ऐसा सदा काम करो।
जीवन के साथ कोई विकार सदा रहता है,
इसीलिए जीव शरीर में स्थित रहता है।
विकार से मुक्ति ही, जीवन से मुक्ति भी होगी,
मृत्यु के पहले तो, यह मन की ही स्थिति होगी।
प्रवृत्ति का परिणाम एक दिन निवृत्ति होगा,
अगले जन्म में मुक्ति, लाभ यह निश्चित होगा।

पढ़कर पुस्तके अनेक, जानकारी प्राप्त करता रहा,
अपने आपको औरो से ज्ञानी समझता रहा,
देता रहा सलाह अनेक, शेखी बघारता रहा,
अपनी समझ से लोगो को, राह दिखाता रहा।
कुछ अपने कर्म से, और कुछ दैव कृपा से,
करते रहे प्रगति जीवन में, बढ़ते रहे आगे।
मुझे भी लगता रहा, कि मेरी सलाह ठीक रही,
समझदार हूँ, ऐसी ही सोच बनती रही।

जब बचपन में पढ़ता बात मोक्ष की,
तो मन में लगता कि ऐसा होता होगा,
लेकिन मिलकर तथाकथित गुरुओ से,
लगा कि यह मृत्यु के बाद होता होगा।
लाखो शिष्य थे, फिर भी कामना बाकी थी,
धन की कमी नहीं,लेकिन इच्छा तो बची थी,
जो कुटिया में रहते, वो भी कुछ चाहते थे,
जो गृहस्थ थे, वो भी पार न हुए थे।
जो परमात्मा सदैव प्राप्त, उनकी अप्राप्ति तो न होगी,
लेकिन कामना यदि साथ थी, तो मोक्ष की स्थिति भी न होगी।

ऐसे में मुझसे हो जाता यह गुरुतर अपराध,
इस संस्कृति में जन्म, जानकारी पाने के बाद।
कहता रह जाता, परम आनंद मन की स्थिति मात्र है,
मनोविज्ञान के चरम पर भारतीय ज्ञान है।
व्यक्ति के मन में भय और लोभ है,
परम आनंद की लालसा लोभ का उत्कर्ष है,
भय है मृत्यु का, शरीर छूट जाने का,
मोक्ष उस भय से मुक्ति का उपाय है।

व्यक्ति चाहता है, जीवन में ऐसा कोई सहारा,
जो सदा साथ रहे, और दुःख सुने हमारा,
जिसकी कोई मांग न हो, कोई जिम्मेदारी न हमपर हो,
काम कर दे सब हमारे, हमसे पहले मृत्यु न हो।
ऐसा सोचकर बनाया मानव ने ईश्वर को,
और उसी का उपयोग करके रच दिया धर्म को।

ताकि मानव मानवों का शोषण करता रहे,
अपने पाप का भार, शोषित के पूर्व जन्मो पर डालता रहे,
साथ देते रहे पण्डे पुरोहित भी ऐसे दानव का,
धर्म के नाम पर शोषण करते रहे जन जन का।

कर्मयोग के नाम पर अपना ली अकर्मण्यता ,
समता नहीं करते प्रभु, इसलिए आर्थिक विषमता,
कहानियाँ अति सुन्दर, दान और पुण्य की सुनाई हमने,
वर्ण भेद और जाति भेद कि खाई बनाई हमने।

मुझे जीवन में ऐसा ही रह जाना था,
लेकिन ईश्वरीय कृपा को जीवन में आना था,
मेरे अति दयालू गुरुदेव ने कृपा की,
मुझसे मिलने को कैसी लीला रची।
उनके सामने आने पर धर्म साकार हो गया,
सूर्य के सामने बादल तिरोहित हो गया,
जान लिया कि मोक्ष होता है जीवन में,
सत्य है परम आनंद, मिलता इसी जीवन में,
मृत्यु से मुक्ति का नहीं कोई सम्बन्ध है,
मन के पार है, जहाँ न मन का कोई बन्ध है।

मेरे गुरुदेव ने रक्षा की इस गुरुतर अपराध से,
जाग्रत किया विवेक को, प्यार और दुलार से।
माता की तरह, प्रेम बस करते रहे,
अनगिनत गलतियाँ, माफ़ बस करते रहे।
उनकी उपस्थिति मात्र से सब बदल जाता है,
पत्थर भी गंगा में शालिग्राम हो जाता है।

जाना कि सर्वोत्तम विधान है शरणागति,
ईश्वर के विधान को समझने योग्य नहीं मति।
अपनी बुद्धि से सिर्फ वो समझ में आता है,
जो कामना से भरा मन समझाता है,
बुद्धि तो वैश्या  है, सती नहीं होती है,
यह तो मन के अनुरूप वर का चयन करती है।

ऐसे में विकारो से रक्षा करते है गुरुदेव,
उनसे प्रार्थना मात्र से टल जाते है दैव,
आकर्षण मन का इतना है, बुद्धि के तर्क अनेक है,
गुरु से प्रार्थना ही ऐसे में, राह मात्र एक है।
हो सकता है कि उनको कष्ट होता हो मेरी रक्षा में,
लेकिन मैं उनकी शरण,  लाज नहीं मुझे भिक्षा में,
वो जो चाहे करे, मुझे तो न ज्ञान चाहिये और न ही आनंद,
उनकी याद से, मिट जाते है दुःख, यही मेरे लिए परमानन्द।

विवेक हो जाग्रत, तो व्यर्थ हो जाती है बुद्धि,
जब प्रभु हो समक्ष, चाहिये मात्र शरणागति।

Monday, September 9, 2013

मृत्यु के पार

जीवन के सारे सम्बन्ध है, अपेक्षा आधारित।
सापेक्ष यह संसार है, सभी कुछ यहाँ सापेक्षिक। 
अपेक्षा के कारण ही कुछ ऐसा घटता यहाँ। 
स्वयं का प्रयत्न अधिक, प्रतिदान कम लगता सदा। 

प्रकृति का विधान ही कुछ ऐसा होता है। 
जो सापेक्षिक, वही प्राकृतिक कहलाता है। 
परमात्मा भी जीव से करते अपेक्षा कर्तव्यपालन की,
करते स्वयं व्यवस्था यहाँ , उसके जीवन यापन की। 

स्वयं ही लीला करते, स्वयं से ही जीव बनाते,
स्वयं से ही रचते संसार, स्वयं ही सब बन जाते। 
ध्यान रखते सदा, जीव को, ठहरने न देते कहीं भी,
पशु योनि में दुःख विहीन, पर देते मनुष्य योनि भी।

अवसर देते उसे अपनी प्रकृति में विकास करने का,
विकसित मस्तिष्क में भाव भर देते अहंकार का।
यही अहंकार, प्रेरित करता कुछ भी कर देने को,
स्मृति के माध्यम से नया इतिहास रचने को। 

मृत्यु की शाश्वत चुनौती, परमात्मा ने यहाँ रची,
परिवर्तन के आधार पर, उन्होंने यह सृष्टि रची। 
इसी मृत्यु के पार जाने के मानवीय प्रयास ने 
दिया जन्म हर विशाल स्थापत्य कलाकृति को,
ज्ञान से भरी कालजयी साहित्यिक कृति को,
समाज को दिशा देती ऐतिहासिक काव्य कृति को। 
प्रकृति को विजय करते वैज्ञानिक आविष्कार को,
मन का हरण करने वाले महान कलाकार को,
विश्व विजेता कीर्तिमान चक्रवर्ती सम्राट को,
ऐसा लगे कि जैसे मनुष्य रचता हो विराट को। 

लेकिन ऐसा हर प्रयास काल के आगे निष्फल हुआ,
अवशेष रहे, या कहीं मात्र स्मृति में अवशेष रहा। 
भारत में अद्भुत प्रयास हुए यह जानने को,
अनेक शताब्दियों तक रहस्य पाने को। 
कैसे मानव पार करे मृत्यु की सीमा को,
कैसे जाने जो शेष कर सकता हो मृत्यु को। 

जीवन तो मृत्यु को प्राप्त करेगा यह सत्य है,
जो मृत्यु को पार करे, वो जीवन मुक्त है। 
यदि जीवन से मुक्ति की राह मिल सकती है,
तो मृत्यु के भय से मुक्ति मिल सकती है। 
लेकिन जाना होगा प्रकृति के पार,
यह शक्ति परमात्मा की, है अनंत अपार। 

प्रकृति के नियंता है परमात्मा,
प्रकृति के पार है परमात्मा,
प्रकृति के हर कण में भी है परमात्मा,
इसी लिए सबके पास है परमात्मा। 

जीव, नियंता का अंश होने से, प्रकृति से परे है। 
उसी के समान, अपेक्षा और सांसारिकता से परे है। 
प्रकृति के अनुरूप व्यवहार, देह व मन का धर्मं है। 
मृत्यु के पार शुद्ध आनंद , जीव का स्वधर्म है। 

लेकिन मनुष्य फिर रहा अपेक्षाओ का भार लिए,
अपने और अपने साथी के दुःख का प्रबंध लिए। 
अपेक्षा के कारण, उसे अन्य कृपण नजर आता है। 
स्वयं में उदारता, औरो में दोष नजर आता है। 

निरपेक्ष परमात्मा का अंश जीव, शरीर को जानता है ऐसे,
घड़े में भरा पानी अपने को, घड़े से पहचानता हो जैसे। 

संसार ने पूछा बचपन में, तू कौन है, 
तेरा क्या नाम है, तेरी क्या पहचान है ?
अपने देह से जाना स्वयं को, इसी से ऐसा माना,
सबसे नाता जोड़ा इसी ने, इसी को अपना जाना। 
 
लेकिन हर सम्बन्ध अपेक्षा से भरा हुआ था,
स्वयं का मन भी कामनाओ से भर रहा था। 
प्रारब्ध समाया हुआ चित्त में, प्रेरित कर रहा था,
अहंकार प्रेरित बुद्धि से जीवन चल रहा था। 

लेकिन यह सुख की और बढ़ते कदम,
दुःख के जाल में उलझ जाते है,
परमात्मा निश्चित ही, जीव को,
ऐसे भुलावे में न छोड़ पाते है। 
करते है कृपा जीव पर, उसे दुःख देकर,
याद दिलाते है अपनी, उसे तडपा कर। 

यहाँ तुम यह नास्तिक प्रश्न, मत पूछ लेना,
जब जीव को सुख में मजा, दुःख क्यों वे देते भला?
-यदि वो ऐसा करते है, तो यह उनकी लीला है,
-अनंत परमात्मा की  प्रकृति में जीव की अनंत यात्रा है। 
यहाँ से विकसित जीव किस लोक में जाते है?
-क्या वैज्ञानिक भी इस सृष्टि का पार पाते है?
जब  वैज्ञानिक उपलब्धि सभी को मिल जाती है। 
यह अध्यात्म की बात, व्यक्तिगत क्यों रह जाती है ?
-साथ सिर्फ संसार में, आगे की यात्रा अकेले ही होती है,
-हर व्यक्ति का इतिहास भिन्न, प्रकृति में नक़ल नहीं होती है। 
यदि सब कुछ यहाँ करते मानव, परमात्मा की कृपा क्या है?
-तू अदना सा मिटटी का पुतला, यह सवाल करे, यह और क्या है ?

परमात्मा जीव की करते रक्षा अपनी बनाई प्रकृति से,
मानव को दिया अवसर कि छेड कर सके प्रकृति से। 
मानव को स्वतन्त्र बनाया, लीला करने के लिए,
वो सदा आनंदमय, देंगे कष्ट क्या करने के लिए ?
यह खेल है जो प्रकृति और पुरुष में चलता रहता है,
असीमित का अंश भी प्रकृति के वश में आता रहता है। 

वह अपने अंशी को भूलकर प्रकृति में रम जाता है,
प्रकृति माया है, इसको पाश से बांधने  में मजा आता है। 
महा ठगिनी है, यह अनेको रूप लेती है,
परमात्मा के अंश को भी भ्रमित कर देती है। 

अंश ही अंशी के अस्तित्व पर सवाल उठा देता है। 
प्रकृति को भी वश में करने का सपना देख लेता है। 
लेकिन परमात्मा के विधान के आगे प्रकृति विवश है,
मृत्यु की निश्चितता, के आगे किसी का नहीं वश है। 

ऐसे में मानुष को दिया गया यह परमात्मा का विवेक,
कर सकता है उसका इस जीवन में भला मात्र एक। 
वह अपने अस्तित्व के वास्तविक स्वरुप को पहचान ले,
मृत्यु के परे, अपने अंशी से अपनी एकता को जान ले। 

पा सकता है इस माया रूपी ठगिनी से मुक्ति,
यदि स्वीकार कर ले, ईश्वर या गुरु की शरणागति। 
वर्ना भी कोई बड़ा नुकसान नहीं होता है,
कुछ लाख जन्म, कुछ और कष्ट, आना फिर भी होता है। 
इस जगत के विधालय से कभी तो लेनी है मुक्ति,
कितनी बार अनुत्तीर्ण होना, निश्चय करो यथा मति। 

मुझे तो गुरुदेव समझ अब आता नहीं,
ज्ञान भी और अब, बुद्धि में समाता नहीं,
आप करो कृपा और दे दो आशीर्वाद,
उत्तीर्ण भले न हो, लेकिन आपका साथ मिले निर्बाध। 

Wednesday, August 28, 2013

मेरे तो गुरुदेव, आप ही तारणहार

मेरे तो गुरुदेव, आप ही तारणहार । 

भले बुरे की समझ भी नाही, ना आचार विचार । 
मेरे तो गुरुदेव, आप ही तारणहार । 

भगति विरति माला जप नाही, आप एक आधार । 
मेरे तो गुरुदेव, आप ही प्राणाधार । 

पोथी पुराण ज्ञान कुछ नाही , ना प्रेम व्यवहार । 
मेरे तो गुरुदेव, आप ही तारणहार । 

सत रज तमस समझ कछु नाही , आप एक आधार । 
मेरे तो गुरुदेव, आप ही प्राणाधार । 

प्राण शक्ति और चिति शक्ति का, जानूँ नहीं व्यापार । 
मेरे तो गुरुदेव, आप ही तारणहार । 

राम न देख्या, कृष्ण न देख्या, न देख्या सिरजनहार । 
मेरे तो गुरुदेव, आप ही प्राणाधार । 

Wednesday, August 7, 2013

गुरुदेव - एक भजन

मेरे तो गुरुदेव एक बस, आप ही तारणहार। 

भले बुरे की समझ भी नाही, ना आचार विचार,
भगति विरति माला जप नाही, एक आप आधार। 

मेरे तो गुरुदेव एक बस, आप ही तारणहार। 

पोथी पुराण ज्ञान कुछ नाही , ना प्रेम व्यवहार ,
सत रज तमस समझ कछु नाही , एक आप आधार। 

मेरे तो गुरुदेव एक बस, आप ही तारणहार। 

प्राण शक्ति और चिति शक्ति का, जानूँ नहीं व्यापार,
राम न देख्या, कृष्ण न देख्या, न देख्या सिरजनहार,

मेरे तो गुरुदेव एक बस, आप ही प्राणाधार । 
मेरे तो गुरुदेव एक बस, आप ही प्राणाधार । 

Monday, August 5, 2013

धर्मं

चैतन्य, शुद्ध ज्ञान आवृत हुआ अज्ञान से,
लिपट गया प्रकृति से, बद्ध हुआ मायिक पाश से।
ऐसा उसे प्रतीत हुआ, यह भला क्यों संभव हुआ ?
प्रकृति शक्ति चैतन्य की, इसीलिए ऐसा हुआ।

बादल सूर्य को भला कहाँ ढ़कता है ?
सम्पूर्ण पृथ्वी पर अँधेरा कहाँ होता है ?
प्रकृति के चक्र से संचारित सभी जीव है,
पाश से बंधे पशु, स्वंतत्र  मानव शरीर है।
मानव की यात्रा भी तम  से सत की ओर है,
इसी के विभिन्न तलों पर सारे मानव शरीर है।

चैतन्य का प्रकाश चित्त से परावर्तित निरंतर हो रहा,
जैसे चन्द्रमा को सूर्य, प्रकाशित निरंतर कर रहा।
रात्रि में लगता है कि चन्द्रमा स्वयं प्रकाशित है,
धवल शुद्ध चाँदनी से मन कितना आनंदित है।
ठीक इसी प्रकार चित्त से प्रकाशित है हमारे दिन रात,
इसी को मुनि कहते निशा, जागरण से होगा प्रभात।
सूर्य है मानो आत्मा, और चित्त है मानो चन्द्रमा,
चित्त और चैतन्य का अंतर, जान ले यदि जीवात्मा।
चैतन्य से प्रकाशित हो जाते है उसके सभी कर्म,
मानव देह मे परमात्मा का अवतरण ही है धर्म।

परमात्मा स्वयं हुए प्रकट संसार के रूप में,
उन्ही की अभिव्यक्ति है, प्रकृति प्रकट रूप में,
आत्मा की अभिव्यक्ति ही, सारे शरीर है,
आत्मा है निराकार, साकार रूप शरीर है।

 मूल स्वरूप सदा आनंदित, चित्त क्यों दुःख कर रहा ?
अहंकार के वशीभूत, स्वयं को कर्ता समझ रहा।
सीमित कर लिया स्वयं को शरीर की सीमा में,
शरीर से मैं और शरीर से जुड़े वो मेरा, यह जाना इसने।
मै और मेरे की सीमा, शरीर के साथ रहेगी सदा,
मैं गिरते ही, मेरे की भी, चिंता क्यों होगी भला ?

दुःख के मध्य सुख का आभास यात्रा को आगे बढाता है,
निरंतर सुख की खोज में, व्यक्ति अध्यात्म में, चला आता है।
अध्यात्म में प्रगति, समर्थ गुरु के बिना संभव नहीं,
जो मुक्त हो स्वयं, उसकी करुणा से ही, संभव यही।
गुरु की करुणा और कृपा जिन्हें मिल पाती है,
यात्रा इस दिशा में, उनकी संभव हो पाती है।

मानव शरीर मिला, रूचि जगी अध्यात्म की ओर,
गुरु भी मिल गए, भगवत कृपा का ओर न छोर।
इस अनंत कृपा के प्रवाह में जो भीग रहे है,
निर्वाण के बिना ही सुख का अनुभव कर रहे है।

भाव ही है महत्वपूर्ण, क्रिया कुछ अधिक नहीं,
निषेध का ही है महत्व, करने से कुछ होता नहीं।
करने से कुछ होता नहीं, और बिना किये होगा नहीं,
यह निषेध के लिए कहा, ध्यान देना है यही।
जो एक अक्षर न पढ़े, या नाम न सुने, वह भी पा सकता है,
यदि निषेध का पालन करे, कर्त्तव्य सदा कर सकता है।
लेकिन ऐसा हर प्रयास सफल नहीं हो पाता है,
इसीलिए समर्थ गुरु करुणा से राह दिखलाता है।

हे नाथ ! मैं भुलूँ नहीं, अपना सम्बन्ध जोड़ लो,
परमात्मा एक परिकल्पना, सीमित से असीम को जोड़ लो।
गुरु एक द्वार है, जो जुड़ चुका है असीम से,
गुजर जाओ इससे यदि, तुम भी जुड़ो असीम से।
गुजरने का अर्थ है पूर्ण समर्पण,
आज्ञापालन और अहंकार का अर्पण।
ऐसा होते ही हो जाएगा निर्वाण, शरीर भले चलता रहे,
प्रारब्ध से निर्मित हुआ, अपना समय पूरा करता रहे।

गुरु का मिलना परम सौभाग्य की शुरुआत है,
समर्पण गुरु के प्रति, यात्रा की शुरुआत है।
जिस अनुपात में गुरु के प्रति बढता रहे समर्पण,
यात्रा भी बढ़ती रहे, सुख का होता रहे संवर्धन।
यह अध्यात्म त्याग का मार्ग है, इसका विचित्र प्रभाव है,
भौतिक जीवन भी प्रकाशित, बढ़ता आनंद का भाव है।
होगा भला क्यों नहीं, यह जगत क्या कुछ और है,
उसी परमात्मा का प्रकाश, यहाँ फैला चहुँओर है।
सुख दुःख, आनंद विषाद, सभी कुछ भ्रान्ति है,
वास्तविक स्वरूप तो मात्र ज्ञान, आनंद, पूर्ण शांति है।

Sunday, May 5, 2013

स्मरण (Birthday on 5th May 2013) - Preachings from Gurudev

ॐ श्री परमात्मने नमः

तियालीस वर्ष हो रहे है पूर्ण,
जीवन भी कभी होगा पूर्ण ,
लेकिन जीवन की पूर्णता क्या मृत्यु में है ?
यदि जीवन में पूर्णता के बिना मृत्यु हुई -
तो जीवन रहेगा निरंतर -
जन्म होगा निश्चित ही, योनि चाहे कोई भी हो !
जन्म मृत्यु के निरंतर चक्र से,
मुक्ति मिल सकती है यदि,
जीवन में पूर्णता आ जाये मृत्यु से पहले,
स्थूल शरीर की मृत्यु से पूर्व,
सुक्ष्म शरीर की मृत्यु हो जाये,
यदि व्यक्ति स्वयं की खोज में सफल हो जाये,
आत्म ज्ञान पा ले, भगवत प्राप्ति हो जाये।
मुक्त हो सकता है मनुष्य ,
करके जीवन मृत्यु को पार,
पाकर वास्तविक स्वरुप अपना,
आनंद रहे निरंतर अपार ।

आनंद और भगवान पर्याय है।
सत्चित्तानंद प्रभु के सत स्वरुप का,
अनुभव करता है हर मनुष्य, हर क्षण, स्वयं के होने में,
चित अर्थात ज्ञान है उसे स्वयं के होने का,
बस खोया रहता है आनंद,
क्योंकि वह आनंद को चाहता है कि मुठ्ठी में बंद कर ले,
कैद कर ले अपनी गिरफ्त में,
स्वयं को आनंद मिले, इस पर नियंत्रण कर ले,
दुसरे को आनंद मिले, इस पर भी नियंत्रण कर ले।
लेकिन कौन पकड़ पाया है भला आनंद को,
जरा सा किसी का कुछ कह देना,
अपने बारे में जरा सा बुरा सुन लेना,
मन के विपरीत जरा सा कुछ घट जाना,
अपने आनंद के क्षण से ध्यान हट जाना।
ले जाता है व्यक्ति को भूत और भविष्य में,
भूत काल की अनेक यादे घेर लेती है उसे,
अतीत की अनेक घटनाये छा  जाती है मानस पटल पर,
और मोह का आवरण छाने लगता है बुद्धि पर,
या फिर भविष्य की आशंकाये डेरा जमाने लगती है,
बुद्धि उनको द्विगुणित और शतगुणित करती है,
मन लालायित हो उठता है नियंत्रण लेने को,
इतने में खो देता है मानव आनंद के क्षण को ।

आनंद है वर्तमान।
वर्तमान भी है भगवान का पर्याय,
यह भी पकड़ में नहीं आता इंसान के,
हर क्षण रहता है वर्तमान में, लेकिन
खोया रहता है भूत-भविष्य मे।
भूत-भविष्य में है, भय, आशंका और दुःख,
उन पर आरोपण करता है - मानव-मन कल्पित सुख,
यह कल्पना कभी साकार नहीं होती है,
वर्तमान के आनंद को पाने नहीं देती है।
कोई दुःख - सुख नहीं वर्तमान में,
वर्तमान में आनंद के अतिरिक्त कुछ नहीं,
आनंद है भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं।

शब्द कोई भी हो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है,
ब्रह्माण्ड असीम चेतना की तरंगों को प्रकट करता है,
जहाँ देखो वही कुछ दिखाई पड़ जाता है,
मन के भीतर भी पूरा संसार बस जाता है।\
अपने इसी संसार को लेकर घूम रहा है यह मन,
बाहर निरंतर करता रहता है, अपना प्रक्षेपण,
इसीलिए प्रारब्ध इसी मन में समाया रहता है,
समय के साथ प्रकट हो, सामने आया रहता है।

प्रारब्ध के कारन परिस्थिति, परिस्थिति में अपना कर्त्तव्य,
यदि कर पाये मनुष्य उसे, वही बन जाता है यज्ञ,
प्रकृति में सभी कोई, करते रहते है यज्ञ यहाँ,
नदी कहाँ जल पीती है, वृक्ष खाते है फल कहाँ,
गाय अपना दूध, स्वयं कहाँ पाती है,
देवी अपनी बलि, स्वयं कहाँ पाती है ?
मै और मेरे का विभ्रम, मनुष्य को भटका देता है,
माया मोह का बंधन, संसार में अटका देता है।

अनेक अवगुणों का मूल है कर्त्तव्य में प्रमाद,
मौत और ईश्वर की, सदा रहती नहीं याद।
ईश्वर ने कृपा कर यहाँ मृत्यु को बनाया है,
इसके बिना कब व्यक्ति को, अपना धर्म याद आया है?
यदि वह हो सकता अमर, अजर इस धरा पर,
हर व्यक्ति मात कर देता, रावण और कंस को यहाँ पर।

जैसे माँ बालक का नित्य पालन पोषण करती है,
ईश्वरीय ऊर्जा विश्व का भरण पोषण करती है।
प्रारब्ध से प्राप्त परिस्थिति में जो कर्त्तव्य पूरा करते है,
ईश्वरीय कृपा से भगवत प्राप्ति के पात्र बनते है,
अनुकूल परिस्थिति है उनकी दया, जिसमे करनी है सेवा,
प्रतिकूल यदि परिस्थिति लगे, करो स्मरण, पाओ मेवा।

ॐ शांति, शांति, शांति।

Tuesday, October 2, 2012

Sita ki Agni-Pariksha (Examination of Sita through Fire)

यह जो जीवन  है, रामलीला का अभिनय ;
कर रहे हो तुम सदा, लो सुनो परिचय ।

लंकापुरी है यह शरीर,
इसका राजा है अहंकार रूपी रावण ।
रावण का सहचर है,
मंदोदरी रूपी मन ।

सदैव से रामभक्त, विवेक है विभीषण,
मोह निद्रा से आवृत, बुद्धि है कुम्भकर्ण ।

भोग संग्रह रूपी, साधन है मेघनाद,
विकार रूपी राक्षश, करे लंका में निवास ।

अशोक वाटिका रूपी हृदय में, स्थित है सीता रूपी आत्मा,
जो सदा है शुद्ध बुद्ध, चाहती है मिले राम रूपी परमात्मा ।

पीड़ा जब इतनी बढ़ जाए,
राजसिकता की चिता सज जाए ।

आते है हनुमान रूपी गुरुदेव,
दुन्ढ़ते है मन रूपी मंदोदरी के महल में,
जगाते  है विवेक को, विभीषण के भवन में ।

अकारण करुण होते है, गुरु स्वयं कृपा में,
प्रवेश करते है ह्रदय रूपी अशोक वाटिका में ।
विश्वास दिलाते है, सीता रूपी आत्मा को,
मिला देंगे राम रूपी, परमात्मा को ।

चाहते तो हनुमान, ले जाते सीता को उठाकर,
मिला देते राम को, सहज ही कृपा कर ।
लेकिन चाहते है कि, हो अहंकार रूपी रावण का नाश,
परमात्मा की लीला पूरी हो, यही उनका प्रयास।

बात करे कुछ पुरानी, ताकि पूरी हो सके कहानी ।

परमात्मा एक से अनेक हुए, बना दिए जीव, भव  और भव  पीर,
और दिया अपने अंश जीव को, श्रेष्ठ मानव शरीर ।

जीव ने कहा, क्यों भला, क्यूँ भेज रहे हो मर्त्य लोक,
मैं आपका अंश सदा, नहीं चाहता कोई भोग ।

परमात्मा को लीला करनी थी,
अतः जीव पर दया आनी  थी।

दिया कवच आत्मा को, रहेगी शुद्ध बुद्ध ऐसे,
सीता को अग्नि प्रवेश, हरण से पूर्व दिया जैसे ।

गर्भ के दस मास गुजरे, सीता के अशोक वाटिका में,
शेष अनेक जन्म गुजरे, जीव के मोह निद्रा में ।

ईश्वर  ने भी देखा, जीव है मुझे भुला हुआ,
मस्त है कर्मो में, अपनी आजादी में खोया हुआ ।

हनुमान ने कहा राम से, जीव भले खोया हुआ,
आत्मा की रक्षा आपका, कवच करता है सदा ।

करो कृपा, कर दो उद्धार, सीता रूपी आत्मा का,
भेजो भजन रूपी वानर,
जो कर दे नाश, विकार रूपी राक्षश का ।

अंगद रूपी निश्चय को, भेजो पहले लंका में,
ताकि अहंकार को चेता दे, अपने ही घर में ।

परमात्मा रूपी राम की कृपा से होता नाश ,
प्रयत्न, सामर्थ्य, रूपी मेघनाद का,
मोहनिद्रा रूपी कुम्भकर्ण का,
और अहंकार रूपी रावण का ।

मंदोदरी रूपी मन, लेता, विभीषण का आश्रय,
सत और असत, सभी अब लंका में रहे निर्भय ।

जीव की परीक्षा, लेकिन लेते है भगवान,
अग्नि परीक्षा सीता की, होगी, यह निश्चित जान ।

जीव का पुनः अग्नि प्रवेश ही, उसे देगा वास्तविक रूप,
राम रूपी परमात्मा की कृपा, है अनूठी, अनूप ।

सीता और राम का मिलन हनुमान के बिना कैसे हो ?
आत्मा और परमात्मा का मिलन गुरुदेव के बिना कैसे हो ?

हे गुरुदेव, अब लंकापुरी के रावण  का शीघ्र नाश हो !
करो कृपा कि, शीघ्र ही विवेक का, विकास हो ।

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना , लंकेश्वर भये सब जग जाना ।

हम पर भी करो गुरुदेव कृपा,
नाश हो अहंकार का, मिले भगवतकृपा ।

Saturday, May 5, 2012

Birthday on 5th May 2012 - Preachings from Gurudev

 ॐ श्री परमात्मने नमः

बयालीस वर्ष हुए पूर्ण,  जीवन फिर भी रहा अपूर्ण। 

देह का लक्ष्य है मृत्यु और जीवन का लक्ष्य है मुक्ति,
आवागमन देह का स्वभाव, मुक्ति की क्या है युक्ति?

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, शरीर से होते एकाकार,
ज्ञान स्वरुप परमात्मा, है अनंत, अदृश्य और अपार। 
परमात्मा स्वयं ही सृष्टि का रूप धर लेते हैं,
व्यक्ति की दृष्टि में, सृष्टि को रच देते हैं।

यह संसार रचित हुआ जीवात्मा की दृष्टि में,
हो जाता ओझल पुनः, आत्मा के अनुभव में।

नित्य मिलन और नित्य विरह, परमात्मा की प्यास का अनुभव।

संसार में है परमात्मा, या परमात्मा में है संसार,
या सिर्फ है परमात्मा, और नहीं है संसार।

है वही, जो सदा है, न आदि है, न अंत है।
जो होने से पहले है, है, रहेगा, वह अनंत है।

जो अंत हो जाये,  वही तो होता है,
उसको अपना मानकर जीवात्मा रोता है।

इस दुःख के सतत क्रम में सुख का भ्रम,
छोटा सा दुःख भी मिटा दे, सारा सुख का विभ्रम।

जब सुख और दुःख के परे, 
राग और द्वेष के परे,
हर्ष और शोक के परे,
मन और बुद्धि के परे।
स्वयं को स्वयं का अनुभव होता है।
स्वयं को आनंद का अनुभव होता है।

अंतःकरण से होते है, संसार के सारे अनुभव,
पर जड़ता के परे, कैसे होता है चैतन्य का अनुभव।

संसार में मन का स्वाभाविक आकर्षण,
निरंतर द्वंद में डूबा यह मानव मन।
कभी तो दुःख सुख की कड़ी से ऊब जाता है,
स्वतः ही स्वयं परमात्त्व तत्त्व में डूब जाता है।

क्या मेरे लिए उचित है, स्वयं की तलाश,
क्या जगी है मेरे मन में, तत्त्व ज्ञान की प्यास।
जब बुद्धि और भाव का चरम आता है,
मनुष्य का इस संसार में ऐसा जन्म आता है।
लगता है आखिर कब तक करूँ यह दोहराव,
सुख का भ्रम और सतत दुःख का भाव।
यह सुख है, ऐसा मानने का प्रयास,
वास्तविक सुख की कब पूरी हो आस?

कोई गुरु, महापुरुष या संकेत मिल जाता है,
जीवन का अस्तित्व मानो हिल जाता है।

जैसे देश का इतिहास, आजादी के पहले और आजादी के बाद,
ऐसे ही मनुष्य का इतिहास, गुरु मिलने के पहले और मिलने के बाद।

जब शिष्य परिपक्व हो जाता है,
सतगुरु स्वयं प्रकट हो जाता है। 

ॐ शांति, शांति, शांति।