कविता: एम. एल. गुप्ता
यह जो जीवन है, रामलीला का अभिनय,
कर रहे हैं आप सदा, सुनिए इसका परिचय ।
अग्नि-परीक्षा क्यों ली प्रभु ने, क्या सीता पर था संदेह?
पूरी कथा सुनेंगे तो, उत्तर पा लेंगे निःसंदेह ।
भाग 1 – लंका के भीतर
लंकापुरी है यह शरीर, राजा अहंकार रूपी रावण,
रावण की सहचरी मंदोदरी, है हमारा चंचल मन ।
सदा से ही रामभक्त, विवेक है विभीषण,
मोह-निद्रा में सोई, बुद्धि है कुम्भकर्ण ।
भोग-संग्रह का साधन, प्रयत्न-सामर्थ्य रूपी मेघनाद,
विकार रूपी राक्षस करते, लंका में नित उन्माद ।
अशोक वाटिका रूपी हृदय में, बंदी है सीता रूपी आत्मा,
सदा शुद्ध-बुद्ध, बस चाहती, मिलें राम रूपी परमात्मा ।
तृण की ओट से रावण को, सीता ने दिया उत्तर कठोर,
आत्मा कभी झुकती नहीं, अहंकार हो कितना भी घोर ।
संसार की पीड़ा जब इतनी बढ़ जाए, कि सहन न हो पाए,
त्रिजटा से सीता अग्नि माँगें, राजसिकता की चिता सज जाए ।
तभी आते हैं हनुमान रूपी गुरुदेव, अहैतुकी कृपा कर,
पहुँचते मन रूपी मंदोदरी के, सुख से भरे महल के भीतर ।
मंदोदरी को सीता समझे, जीव रहे अनजाना,
गुरुदेव से मिलते ही, खुला रहस्य, सच पहचाना ।
तब जाना, यह मन सुख दिखा, दुःख ले आता,
बार-बार यह नाटक होता, जन्म पुनः हो जाता ।
सोए विवेक को गुरु जगाते, विभीषण के भवन में,
राम-नाम सुनकर हनुमान ने, सज्जन पहचाना क्षण में ।
करुणा-सागर गुरु, साधक के हित, स्वयं चलकर,
प्रवेश करते हैं हृदय रूपी, अशोक वाटिका के अंदर ।
मुद्रिका गिराकर विश्वास दिलाते, सीता रूपी आत्मा को,
शीघ्र ही मिला देंगे, राम रूपी परमात्मा को ।
रावण ने पूँछ जलाई, मन के प्रश्रय से भड़के विकार,
उसी आग में जली स्वर्ण-लंका, चोटिल हुआ अहंकार ।
चाहते तो हनुमान, ले जाते सीता को उठाकर,
मिला देते राम से, सहज ही कृपा कर ।
लेकिन चाहते हैं कि हो, अहंकार रूपी रावण का नाश,
परमात्मा की लीला पूरी हो, यही है उनका प्रयास ।
सीता क्यों बंदी लंका में, जीव क्यों भव में आया?
बात करें कुछ पुरानी, जब प्रभु ने खेल रचाया ।
भाग 2 – जीव की कथा
परमात्मा एक से अनेक हुए, रच दिए जीव, भव और भव-पीर,
अपने अंश जीव को दिया, सबसे श्रेष्ठ मानव शरीर ।
जीव ने कहा, क्यों भला, भेज रहे हैं मर्त्य लोक,
मैं आपका अंश सदा, नहीं चाहता कोई भोग ।
परमात्मा को लीला करनी थी, जीव को जाना ही था,
किंतु जीव पर दया भी आनी थी, अंश तो अपना ही था ।
दिया कवच आत्मा को, सदा रहेगी शुद्ध-बुद्ध ऐसे,
हरण से पहले अग्नि में, सीता को रखा प्रभु ने जैसे ।
लंका गईं माया-सीता, सत्य-सीता का था अग्नि में वास,
भटकता है जग में जीव, पर आत्मा रहती प्रभु के पास ।
गर्भ के दस मास जैसे, बीते सीता के, अशोक वाटिका में,
वैसे ही जन्म अनेक बीत गए, जीव के, मोह-निद्रा में ।
ईश्वर ने भी देखा, जीव है मुझे भूला हुआ,
मस्त है कर्मों में, अपनी धुन में खोया हुआ ।
आखिर में सीता ने, चूड़ामणि देकर, कहा हनुमान से,
प्रभु से कहना, कृपा करो! अब निकालो इस जंजाल से ।
भाग 3 – लंका-विजय
हनुमान ने कहा राम से, जीव भले खोया हुआ,
आत्मा की रक्षा आपका, कवच करता है सदा ।
करें कृपा, कर दें उद्धार, सीता रूपी आत्मा का,
भेजें भजन रूपी वानर, करें नाश विकार रूपी राक्षस का ।
अंगद रूपी निश्चय को, भेजें पहले लंका में,
ताकि अहंकार को चेता दे, उसके अपने ही घर में ।
अंगद ने जमाया पाँव, कोई योद्धा हिला न पाया,
दृढ़ निश्चय को भी कोई विकार, कभी डिगा न पाया ।
राम की कृपा से नाश हुआ, प्रयत्न-सामर्थ्य रूपी मेघनाद का,
मोह-निद्रा रूपी कुम्भकर्ण का, अहंकार रूपी रावण का ।
मंदोदरी रूपी मन ने, लिया विवेक-विभीषण का आश्रय,
सत और असत सभी अब, लंका में रहें निर्भय ।
भाग 4 – अग्नि-परीक्षा
जीव की परीक्षा लेकिन, स्वयं लेते हैं भगवान,
अग्नि-परीक्षा सीता की होगी, यह निश्चित विधान ।
लोग कहें यह परीक्षा थी, पर यह था छाया का अंत,
अग्नि से निकलीं सत्य-सीता, जीवन में छाया वसंत ।
जीव का पुनः अग्नि-प्रवेश ही, उसे देगा वास्तविक रूप,
राम रूपी परमात्मा की कृपा, है अनूठी, अनूप ।
मेरे भीतर भी लंका है, मन मंदोदरी-सा सुख में खोए,
क्रोध-लोभ के राक्षस जागें, विवेक मेरा कब तक सोए?
सीता और राम का मिलन, हनुमान के बिना कैसे हो?
आत्मा और परमात्मा का मिलन, गुरुदेव के बिना कैसे हो?
हे गुरुदेव! अब लंकापुरी के, रावण का शीघ्र नाश हो,
करें कृपा कि शीघ्र ही, हमारे विवेक का विकास हो ।
आपका मंत्र विभीषण ने माना, लंका का राजा बन गया,
हम पर भी करें कृपा गुरुदेव, यह मन भी शरण में आ गया ।
नाश हो अहंकार का, मिले भगवत्कृपा अविराम,
गुरु की शरण में रहें, करते रहें राम को प्रणाम ।
संदर्भ
माया-सीता, असली सीता का अग्नि में वास: रामचरितमानस, अरण्यकांड ("तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा")
अग्नि-परीक्षा, अग्नि द्वारा सत्य-सीता को लौटाना: रामचरितमानस, लंकाकांड; वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड 116–118
तृण की ओट से रावण को उत्तर, त्रिजटा से अग्नि माँगना, मुद्रिका, लंका-दहन, चूड़ामणि: रामचरितमानस, सुंदरकांड
हनुमान का मंदोदरी को सीता समझना: वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड 10–11
अंगद का पाँव: रामचरितमानस, लंकाकांड
"तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना": हनुमान चालीसा
शरीर = लंका, मन = मंदोदरी आदि रूपक: कवि की आध्यात्मिक व्याख्या (कथावाचक परम्परा में प्रचलित शैली)
🎬 यह कविता कवि के स्वयं के स्वर में, चित्रों और संगीत के साथ देखें: https://youtu.be/DyTf3U6Yzac
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta