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दशरथ – राम के पिता ने मोक्ष ठुकराया | राम को प्रणाम

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कविता: एम. एल. गुप्ता कौशल्ये! यह कैसा स्वर है, लगता है, सुमंत्र आ गया है, शीघ्रता से राम को बुलाओ, मेरा अंत समय आ रहा है। गिरे सुमंत्र राजा के चरणों में, महल में सूनापन छा गया, दशरथ समझ गए, राम न आए, जीवन का अर्थ न रहा। स्मरण हुआ शब्दभेदी बाण, शब्द-श्रवण से हुई उलझन, वह शाप था या वरदान, इस पहेली में कट गया जीवन। ऐसा क्या घटा उस रात, क्या था शाप जो लगा वरदान, मृगया खेलते हुए क्या हुआ, क्यों भूले शब्द की पहचान, सब कुछ पाया जीवन में, लेकिन दशरथ का मन नहीं भरा, मृत्यु के पश्चात् राम से मिले, पिता ने मोक्ष ठुकरा दिया। प्रेम की यह कथा सुनें, तो हर प्रश्न का उत्तर पाएँगे, शीघ्रता में दिए वचन, बनते संकटकारी, जान जाएँगे! भाग 1 – देवों का रक्षक स्वायंभुव मनु ने तप करके, प्रभु को पुत्र रूप में माँगा, जल बिन मछली जी न सके, ऐसे प्रभु से जीवन बाँधा। अगले जन्म में अज-इन्दुमती के पुत्र, बने अवध-नरेश, रथ चलता दसों दिशाओं में, दशरथ नाम हुआ विशेष। शम्बर ने स्वर्ग पर चढ़ाई की, इन्द्र ने अवध से सहायता चाही, वैजयन्त के रण में दशरथ ने, असुरों पर बाणों की झड़ी लगाई। घायल हुए, कैकयी ने रथ हाँका, रणभूमि से प्र...

सीता स्वयंवर – पुष्पवाटिका से धनुष भंग तक | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता राम को इस तरह से हम चाहने लगे हैं, नींद में सपने भी अब आने लगे हैं, राम हमसे दूर रहते हैं या हैं पास में, हम तो अब भ्रम में पड़ने लगे हैं। भ्रम है या माया, राम ने खेल रचाया, लीला जो है उनकी, कोई समझ ना पाया। सुना है जंगल में भेजा था उनको, यज्ञ रक्षा हेतु दो भाइयों को, मार दिया सुबाहु और ताड़का को, मारीच भाग गया जीवन रक्षा को। विश्वामित्र के संग घूमते हुए, जनकपुर स्वयंवर में पहुँच गये। पुष्पवाटिका में दृष्टिगोचर हुए, सूर्य और चंद्र साथ प्रकट हुए। मेरे लिये रचा गया स्वयंवर, चुना जायेगा शर्त के अधीन वर, पिनाक धनुष का जो चाप चढ़ाये, वह सीता के योग्य कहलाये। यह मेरा मन क्यों डोल रहा है, अपने अनुरूप वर जान रहा है, क्या यही करेंगे मेरा वरण, शर्त पूरी कर जीतेंगे स्वयंवर ? कौन जाने, भविष्य के गर्भ में क्या है ? माता गौरी ही जाने, मेरे मन में क्या है? वे ही करेंगी कृपा, कराएँगी मिलन, मन रुचि अनुसार, सहज सुंदर सजन, करुणा निधान, स्नेह शील सुजान, यह अपने मन में अब निश्चित जान। चली अपने भवन, हो मुदित मन, सीता का मन, अब है प्रसन्न। कितना विशाल जमघट है यहाँ, आये हैं सारे राजे-महा...

प्राण प्रतिष्ठा – विराजित हुए रामलला (22 जनवरी 2024) | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता कुछ लोग पूछते हैं कि - मन्दिर से पहले मस्जिद थी मस्जिद से पहले मन्दिर था उस मन्दिर से पहले क्या था एक खेत था या जंगल ! अल्लाह राम के नाम से पहले जँगल में सब मंगल था ! जंगल से भी पहले क्या था साँ साँ करता कहकशाँ था ना कोई हिन्दू ना मुसलमाँ था ! वो कहकशाँ अब दैरो हरम हुआ कहकशाँ के लिए कौन लड़ेगा ! सुनो मेरे भाई कि - जब मुझे लड़ना है आज, कल की कोई बात नहीं है, मंदिर हो या हो मस्जिद, लड़ने की औक़ात अभी है। जब कुचला था तुमने मुझे, उसका नामोनिशान नहीं है, मुझे भी कोई गिला नहीं, मेरा अब ईमान यही है। लेकिन यदि तुमने मुझे चिढ़ाने को, सदियों तक औक़ात याद दिलाने को, बनाई थी मस्जिद तुमने, राम जन्मभूमि पर, किया था अन्याय, हर भारतवासी पर, कराते हो यदि तुम, हर दिन मुझे यह अहसास, देख तेरे ईश्वर करते ग़ुलामी, अल्लाह के पास। तो फिर मुझे लड़ना होगा, हर उस निशान के लिए, जो मुझे हर दिन चिढ़ाएगा और ज़ुल्म की याद दिलाएगा ! अब अगला सवाल तुम पूछोगे कि, अब तक क्यों चुप था मैं, मेरा जवाब ही मेरी हक़ीक़त है, चुप नहीं, बेबस था मैं। मेरी क़ौम जब एक साथ लड़ पाए, हर ग़ुलामी का निशान मिट जाए! क्य...

सुख में राम की याद – दुःख क्यों होता है? | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता राम का नाम, लेते सभी हैं, राम हैं सभी के हृदय में, यह मानते सभी हैं। फिर यह दुःख क्यों होता है, क्यों यह मन रोता है, क्या पीछे छूट जाता है, क्या मानव भूल जाता है ? क्यूँ लगता है कि मैं अकेला हूँ, गम और किस्मत का मारा हूँ। जिनका मैंने उपकार किया, न उन्होंने मेरा साथ दिया, न जिनको मैंने साथ दिया, उन्होंने मेरा काम किया। कौन आता है मेरे पास अब, किसको मुझसे अब काम है ? ऐसा लगता कि अब मेरा, सहारा सिर्फ राम नाम है। इन दुःख का कारण यह नहीं कि, राम मेरे साथ नहीं हैं, दुःख का कारण सिर्फ यह कि, सुख में राम की याद नहीं है। राम सदा साथ दें, यह आशीर्वाद किसलिए ? राम साथ ही सदा, अलग हो ही न सके। लेकिन राम के साथ रहते हुए, उनको याद रखते हुए, कैसे होगा गलत काम ? मन कैसे करेगा प्रमाद ? इसलिए मन भरमाता है, संसार की याद दिलाता है। इन्द्रियाँ अपने अपने विषय से, जब होती हैं एकाकार, मन डूब जाता भंवर में, मन में छा जाता है संसार। अहंकार जाग्रत रहता है, जीव भ्रमित होता है, भूल जाता है राम को, सुख दुःख में खो जाता है। एक लहर चलती है मन में, मिल जाती है संसार सागर में, संसार और मन एक हो जा...

बालि – मन पर विजय की युक्ति | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं ? मारेहु मोहि ब्याध की नाईं ?? प्रश्न पूछता है बालि, मर्यादा पुरुषोत्तम से, राम जिनका जीवन है आदर्श, ज़िक्र जिनका सदा होता आया है, अच्छाई की अंतिम सीमा देखकर, सदा सबको राम ही याद आया है। उन्होंने क्यों मारा बालि को छिपकर, क्यों वार किया ओट में छिपकर, क्यों बनी यह कहानी है, क्या बात तुम्हें बतानी है। बालि है तुम्हारा अपना मन, तुम चाहते हो इस पर नियंत्रण, लेकिन बालि में है यह क्षमता, तुम्हारी आधी शक्ति हर लेता, तुमसे ही शक्ति लेकर, यह तुमसे ताकतवर होता। जो भी लड़े इसके सामने जाकर, होता है निश्चित दुःखी, हार कर। इस कहानी में बालि है तुम्हारा मन, इसका जब तुम चाहते हो नियंत्रण, हारते ही हो हर बार, क्योंकि, यह तुम्हारी शक्ति से होता शक्तिमान। इसलिए मन के सामने से लड़कर, बैठता है प्राणी हर बार हार कर, देता रहता है दोष स्वयं को, या फिर परिस्थिति, अथवा भाग्य को। कहानी में बात सिर्फ़ इतनी नहीं है, बालि से जीतने की युक्ति बतायी है। चाहिये भगवान पर भरोसे की ओट, तब हो सकेगी मायावी मन पर चोट। राम के जीवन में केवल एक बार, करना पड़ा कूटनीति से छिपकर वार। ...

निर्बल के बल राम – अहंकार का पर्दा | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता निर्बल के बल राम, और बलशाली का बल भी राम! अहंकार मानव का अपना, शेष सभी है केवल राम !! अहंकार है एक मिथ्या भ्रांति, जिसके कारण नहीं है शांति, इसका होना भी न जाने, मानव ख़ुद को न पहचाने, अहंकार के पर्दे के पीछे, स्वयं खड़े हैं राम, लेकिन मद में भूला प्राणी, कहे दिखो, अगर हो राम !! क्यों दर्शन करने के ख़ातिर, कर रहा तू क्या क्या प्राणी, राम मिल रहे हर कदम पर, लेकिन तेरी अलग कहानी। अपना साँचा बना लिया है, राम को चाहे उसमें बिठाना, जो अनंत, आधार सभी का, क्या संभव उसे मन में लाना ? घट बिच नीर, नीर बिच घट है, बाहर भीतर पानी, राम ही बाहर, राम ही भीतर, किसे ढूँढ रहा प्राणी ? तेरे दुःख का आधार यही, राम को तू देखता नहीं, अहंकार के पर्दे में, भीतर बाहर जुड़ पाता नहीं। ख़ुद को अकेला पाता भीतर, ढूँढ रहा है साथ बाहर, अपने पराये की सीमा में, अपनाता है चुन-चुन कर। जीवन भर पड़ी रही यह लत, फिर अपना चुनाव पाता ग़लत। जिसे अपना समझा, वह पराया हुआ, जिसके लिये सब कुछ किया, उसी से मुझे धोखा हुआ। लगता फिर यही, कि दुनिया में राम कहीं नहीं, ढूँढूँ कहीं किसी मूरत में, अथवा मंदिर में कहीं। राम...

चार भाइयों का प्रेम – शत्रुघ्न का मौन त्याग | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता राम हैं आदर्श स्वयं, जीवन का हर क्षण आदर्श, संदर्भ स्वयं राम अब, जीवन है शाश्वत आदर्श। लक्ष्मण ने जिया जीवन, भ्राता राम के लिए, राम ने जिया जीवन मानवता के उद्धार के लिए! प्रेम किया इतना, कि राम के सेवक ही बन गए, राम का स्नेह इतना मिला, सब कुछ भूल गए। अपनी निद्रा को भूल, चौदह वर्ष वन में जगे ! जब शक्ति लगी, नींद आई, राम विचलित हुए, हनुमान लाए संजीवनी, राम कृतज्ञ हो गए, सदा सदा के लिए, भक्त के ऋणी हो गए। वन में गए जब राम, विश्वामित्र के साथ, मुनि ने माँगा संग अनुज, लक्ष्मण ही गए साथ। भाइयों के निश्छल प्रेम, की कहानी है रामायण, जैसे हैं राम-लक्ष्मण, ठीक वैसे ही भरत-शत्रुघ्न। भरत जाते हैं अपने ननिहाल, शत्रुघ्न के साथ, राम रह रहे वन में, दोनों सँभालते हैं राजकाज। राम रहते हैं वन में, लक्ष्मण रहते हैं सेवा में, भरत हैं नंदीग्राम में, शत्रुघ्न अवध की सेवा में। जब पढ़ते हैं रामायण, ज़िक्र जिसका कम हुआ, शत्रुघ्न ने अपना धर्म, सेवा ही बना लिया। ना राम के साथ गये वन, ना अवध त्यागी, ना कहा इस जग ने उन्हें, लखन सम बड़भागी। रहे अवध में, सम्भालते रहे राज और प्रजा को, राम की धरोह...

रसो वै सः – रस से भरा तेरा नाम | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता रस से भरा तेरा नाम है, रसमय यह निर्माण है। यह समस्त प्रकृति, है रचना तेरी, मात्र रस ही रस, रस से ही भरी, रस से भरा रहे जब मानव मन, पुलकित रहे तभी उसका तन, जब रस में डूब सके यह जीवन, क्यों चाहूँ मैं होना अ-मन ? मन जो कभी होता है प्रसन्न, और कभी दुःख से होता अप्रसन्न, कभी लगता कि जीवन नीरस है, मन उदास, तन बेबस है, ऐसे में रस बाहर भी नहीं दिखता है, भीतर-बाहर सब वीराना होता है, तो लगता है कि चाहिये कुछ और, इस संसार में नहीं मेरे लिये अब ठौर। फिर लगता है कि मुझे ज्ञान चाहिए, अब जीवन में शांति और ध्यान चाहिए। चला आता है मानव प्रकृति की गोद में, जहाँ सब डूबे हैं आमोद-प्रमोद में। देखो कल कल बहता है झरना, सुरम्य वन के तन का यह गहना, गिरते हुए जल प्रपात की यह ध्वनि, जब शांत वन में कानों ने सुनी, स्वतः मन प्रफुल्लित होने लगा, दुःख छूट गया, मन बहलने लगा। दृश्य और ध्वनि से जब मन भीगा, तन भी भीगने के लिए मचलने लगा। जलाशय में जब डुबकी लगा दी, मन ने सारी यादें, चिंता हटा दी। ऐसे में हो परमात्मा का स्मरण, लग जाएगा ध्यान, हो जाएगा अ-मन। लेकिन यह रस सदा मिल सकता है, परमात्मा सदैव सर...