Tuesday, November 3, 2026

अभिव्यक्ति

कविता: एम. एल. गुप्ता

साँसों पर पहरा है।
ज़ख़्म कोई गहरा है।
मुझे ख़्याल रहा कि कोई बुला लेगा मुझे,
अचानक सूनापन छा गया
लगा जैसे कोई सो गया !
साँस थमने लगी और जी बैठने सा लगा।
क्या होने वाला है? मन काँपने सा लगा।
ख़बर आई कि हमला हुआ है
वीर जवानों के क़ाफ़िले पर,
किया है आत्मघाती हमला,
माँ भारती के रक्षकों पर !
गिनती बढ़ती गयी,
शव बन गए हँसते मुस्कुराते
खिलखिलाते जवान,
अभी उसने बताया था कि
कैसे उसकी गर्भवती पत्नी ने किया था मुश्किल से विदा,
बूढ़ी माँ ने कहा था कि बेटा जल्द ही आकर मिलना।
कैसे बच्चे कर रहे थे प्यारी प्यारी बातें,
कैसी बीती थी पत्नी के साथ मधुर अंतरंग रातें।
इतने में एक धमाका हुआ,
चिथड़े उड़ने लगे, सब धुआँ धुआँ हो गया।
पता भी न चला, कैसे संसार लुट गया,
कितनी कोख उजड़ गयी, कितना सिंदूर मिट गया।
अब हम दे रहे हैं चिता को आग,
फ़ौजी सम्मान के साथ,
लेकिन मन है क्षुब्ध, क्रोधित,
बदले के लिए आक्रोशित,
ज़ख़्म यह गहरा है,
साँसों पर पहरा है।

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

चिन्तन

कविता: एम. एल. गुप्ता

साँचे के परे
देखे थे सपने,
सिर्फ़ मैंने ही जाना उन्हें !

जलता रहा मन,
कभी एकाकी हो ही न सका,
क्योंकि
ठहरा नहीं वर्तमान में !

हाथ थामकर साथ चले चलो,
इस आशा में जीवन गुज़रता रहा,
और तुम गोद में उठाए,
चलते रहे,
अनगिनत जन्मों से !

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

विराम

कविता: एम. एल. गुप्ता

शब्द बहे जब अविराम,
अर्थ अपना खोने लगे,
क्यों कि,
अर्थ तो विराम से ही है !!

दुःख तो अनवरत है,
सुख
मात्र विराम में है !

जिया अनवरत,
विराम के क्षण में हुआ अहसास !
जिया कहाँ,
जीने का मात्र रहा आभास !!
जब ठहर कर देखा तो पता चला,
यह पागल मन कहाँ भाग रहा,
और मैं भी,
यूँ ही साथ बह रहा ?
बस यूँ ही !!!

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

होली का संदेश

कविता: एम. एल. गुप्ता

सास कहे दामाद से, तेरे गोरे गाल
आ जा मेरे पास में, ला मल दूँ मैं गुलाल,
जो सास मले गुलाल, दामाद बड़ा शर्माये,
सास कहे सब एक एक, अब देवर कहाँ से आए,
कहाँ से आए ननदिया, जो करे ठिठोली,
कहाँ से आए नंदोई, जो भिगोए रंग से चोली,
कैसे खेलें वो होली जो रिश्तों को स्नेह से भिगो दें,
एक एक बच्चा पैदा कर, परिवार कैसे बढ़ा लें !

एक राष्ट्र यह चिर पुरातन, नित नूतन भी यही है,
संस्कृति प्रवाहित निरंतर, युग युग से रही है।
यह प्रवाह, सनातन धर्म के कारण सदा रह पाया,
वसुधैव कुटुम्बकम्, के भाव से ही चल पाया।
हमने आत्मसात किया, विदेशी और विधर्मी को,
लेकिन कभी नहीं भूले, अपने देव और सरज़मीं को,
ऐसा करने के लिए हमने, आटे में नमक मिलाया,
दूध में चीनी की तरह, उनको गले लगाया।
संख्या बल में अधिक रहे, इसीलिए ऐसा कर पाए,
संख्या सीमित होने पर, संस्कृति बच नहीं पाए,
हमारा धर्म, हमारी आस्था दुनिया में भी फैला था।
लेकिन हिमालय से समुद्र तक, उद्गम स्रोत सदा यह था।
इस धरा पर सनातन धर्म को, निश्चित जीवित रखना है,
न्यूनतम दो बच्चों का, पालन हमको करना है।
यदि हम माता पिता का क़र्ज़ चुकाना चाहते हैं,
पति पत्नी के दो बच्चे हों, यह सभी चाहते हैं।
अपने परिवार को बचाओ, संस्कृति को बचाओ,
न्यूनतम दो बच्चे हों, यह पाठ सभी पढ़ जाओ।

बातें कितनी हैं दिल में सारी कहाँ कह पाता हूँ,
होली मंगलमय सभी को, प्रणाम चरणों में करता हूँ।

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

देवात्मा हिमालय

कविता: एम. एल. गुप्ता

प्रकृति की गोद में
जब जगत् हो सामने
उठते हैं निरंतर
संकल्प और विकल्प मन में,
यहाँ नूब्रा घाटी, लद्दाख़ में,
प्रकृति की गोद में,
मन स्वाभाविक रूप से हो रहा है शांत,
सामने हिमालय की अचल प्रेरणा से,
बहती हुई नदी की रसधार से,
रेतीले तट की सुरम्यता से,
मन लौट चला है अपने ही भीतर,
लेना ही नहीं चाहता कुछ और,
यह आनंदित, प्रफुल्लित मन
मेरा ही तो है !
लगता है लौट गया हूँ अपने में,
अवसर है यहाँ अपने से मिलने का !

प्रकृति है माँ के रूप में आँचल फैलाए हुए,
आ अपनी चिंता और तनाव मिटा,
चुप हो जा, बैठ जा, मेरी गोद में लेट जा !
इसीलिए हिमालय के आस पास,
बौद्ध धर्म को अपनाया गया,
ध्यान का मार्ग जनता में अपनाया गया,
मैदान में व्यक्ति लोभ के वशीभूत है,
उसके मन में जागती लूट और भूख है,
देवात्मा हिमालय आज भी अपनी गोद में,
प्रकृति को समेटे है अपने शुद्ध रूप में !

यहाँ लगता है,
यह है सुपरिचित वातावरण,
जाने कितने जन्मों के आवरण,
लेकिन अभी भी लगता है,
यह अपने घर जैसा,
माँ की गोद जैसा प्यारा
और जन्म जन्मांतर की तलाश जैसा,
लगता है यहाँ जीवन है,
जीने के लिए !
और वहाँ लगता है,
जीवन है कुछ करने के लिए !

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

त्रिजटा – राक्षसों के बीच राम भक्ति | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

त्रिजटा नाम राक्षसी एका, राम चरण रति निपुण विवेका,
विभीषण और सरमा की पुत्री ने, साथ दिया था सीता का।
मोक्ष चाहते हैं सभी, जन्म मरण की पीड़ा से बचने के लिए,
भक्त का जन्म दुर्लभ है, जिसका जीवन हो राम के लिए।
परमात्मा के लिए भी आसान है, जीव को मुक्ति का दान,
राक्षस हो, चाहे पशु या मानव, पाया सभी ने मोक्ष महान।
दुर्लभ सदा है भक्ति, जहाँ काम नहीं आती शक्ति,
ज्ञान के सहारे बढ़ता साधक, परिणाम मात्र मुक्ति।
अनेक जन्मों के पश्चात्, ज्ञानी कभी होता, शरण प्रभु की,
सम्पूर्ण जगत, है वासुदेव का रूप, दृष्टि यही होती उसकी।

बत्तीस दाँतों के बीच, जैसे रहती है जिह्वा सदा,
ऐसे ही राक्षसों के साथ, जन्म से रही त्रिजटा।
त्रिजटा है संगम तीन गुणों का,
स्नेह, युक्ति और प्रेम का।
त्रिवेणी बह रही लंका में, कर्म भक्ति और ज्ञान की,
इसका प्रभाव ऐसा कि, सीता की सेवा करे राक्षसी।
गहरी जानकारी थी उसे, राक्षसी स्वभाव की,
प्रयास यही कि कैसे यहाँ, रक्षित रहेगी जानकी।

भय दिखलाना राक्षस स्वभाव, दशानन ने की हुंकार,
करो भयभीत इतना कि, सीता करे रावण को स्वीकार।
रावण धमकी देकर गया, अब मात्र मास एक शेष,
सीता को धैर्य दिलाने के लिए, चाहिये उपाय विशेष।
माँ जानकी संबोधित कर रही, त्रिजटा को माता यहाँ,
कहा कि अब नहीं सहना, करो अग्नि का इंतजाम माँ।
रावण ने कहा, एक मास के बाद जीवन का होगा अंत,
राम के बिना जीवन अर्थहीन, आज ही कर लूँ मैं अंत।

करती है युक्ति का प्रयोग, रात्रि में नहीं मिलेगी आग,
धैर्य धारण करो देवी, दिन में करेंगे उचित प्रयास।
बिठा लिया सभी राक्षसी को, घेरे में सुनाने लगी कहानी,
मुझे आया था स्वप्न भयानक, बात सभी ने सच मानी।
राम आ गए विशाल सेना लेकर, हरा दिया दशानन को,
एक वानर ने आकर जला दिया, स्वर्णमयी लंका को।
सीता के हाथ में होगा सबका जीवन, सेवा करो इनकी,
वरना समय आने पर देनी होगी, कीमत अपने प्राणों की।

स्नेह दिया जानकी को, भय दिखलाया राक्षसी को,
भक्ति और बुद्धि का अद्भुत मिलन, दिखा माँ सीता को।
लंका से जब सीता लौटी, त्रिजटा वियोग में रोने लगी,
दिया सीता राम ने वरदान, कलियुग में एक दिन पूजा होगी,
वर्ष में एक दिन, पूजन होता है माँ त्रिजटा का वाराणसी में,
कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन, साक्षी विनायक मंदिर काशी में,
राक्षस भी पाते वरदान, जब कृपा हो सियाराम की,
करें सब राम को प्रणाम, सब पायेंगे कृपा श्री राम की।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

धनुष टूटे जब अहंकार का | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

धनुष टूटे जब अहंकार का, तब ही करो विवाह,
अहंकार यदि बना रहा, हो ना सकेगा निबाह!
यह नाजुक रिश्ता जब बनता है, राम खड़े रह जाते हैं,
सीता के हाथ वरमाला लिए, ऊँचे नहीं जा पाते हैं!
समस्या के हल के लिए परिवार जन आगे आते हैं,
लक्ष्मण आकर भाई के, चरणों में झुक जाते हैं!
प्रेम विवश राम, लक्ष्मण के लिए झुक जाते हैं,
सीता के हाथ तुरंत, वरमाला के साथ बढ़ जाते हैं!
शोभित होती है जयमाला, सीता राम मुस्कुराते हैं,
करतल ध्वनि के मध्य, देवता पुष्प बरसाते हैं!

पहुंचे अवध, छाई खुशी, हुआ स्वागत, उमड़ा प्यार,
कैकयी के प्रिय राम को, मिला कनक भवन उपहार!
युवराज बना दूँ राम को, उठा दशरथ के मन में विचार,
लेकिन जगाया मंथरा ने, कैकयी के मन में अहंकार।
मति भंग हो गई, ममता जागी, अब नहीं रहा विचार,
कैकयी सो गई कोप भवन में, भूल राम से प्यार।
राम ने स्वीकार किया सहर्ष, छोड़ अवध, गए वनवास,
अहंकार ने सुहाग छीना, सीता सौमित्र गए वन साथ।

शूर्पणखा का अहंकार, काम के वशीभूत आहत हुआ,
सीता की सुंदरता सुन, दशानन काम से पीड़ित हुआ।
चल दिया सीता हरण को, कपटी बना, निर्लज्ज हुआ,
लंका दहन, वानर राक्षस युद्ध, सकुटुम्ब नष्ट हुआ।
सीख सुन नहीं सका, समझा रहे मंदोदरी, माल्यवान,
मारीच, विभीषण, कुंभकर्ण, कालनेमि, अंगद, हनुमान।
सीख दी लक्ष्मण को, शत्रु एवं रोग नहीं होते हैं कमजोर,
अपने राज सदा गुप्त रखें, अपने घर में भी होते हैं चोर।

परिवार की मर्यादा, शील, स्नेह, कुल परम्परा का सम्मान,
अपने घर में हो सीधापन, आगंतुक अतिथि को दें मान।
राज्य ठुकराया भरत ने, करे राम पादुका, अवध का राज,
सम्मान राम से भी अधिक, भरत का होता आज।
जीवन को राम काज में, कर दे जो उत्सर्ग,
कहलाये हनुमान वही, पाते जीवन में अपवर्ग।
हम सब भी मुक्त हो अहंकार से, जाग्रत हो अस्मिता का बोध,
करें राम को प्रणाम, जीवन में ना रहे, काम, लोभ या क्रोध।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta