Wednesday, November 4, 2026

सीता की अग्नि-परीक्षा – क्या राम को सीता पर संदेह था? | राम को प्रणाम


कविता: एम. एल. गुप्ता

यह जो जीवन है, रामलीला का अभिनय,
कर रहे हैं आप सदा, सुनिए इसका परिचय ।
अग्नि-परीक्षा क्यों ली प्रभु ने, क्या सीता पर था संदेह?
पूरी कथा सुनेंगे तो, उत्तर पा लेंगे निःसंदेह ।

भाग 1 – लंका के भीतर

लंकापुरी है यह शरीर, राजा अहंकार रूपी रावण,
रावण की सहचरी मंदोदरी, है हमारा चंचल मन ।
सदा से ही रामभक्त, विवेक है विभीषण,
मोह-निद्रा में सोई, बुद्धि है कुम्भकर्ण ।
भोग-संग्रह का साधन, प्रयत्न-सामर्थ्य रूपी मेघनाद,
विकार रूपी राक्षस करते, लंका में नित उन्माद ।

अशोक वाटिका रूपी हृदय में, बंदी है सीता रूपी आत्मा,
सदा शुद्ध-बुद्ध, बस चाहती, मिलें राम रूपी परमात्मा ।
तृण की ओट से रावण को, सीता ने दिया उत्तर कठोर,
आत्मा कभी झुकती नहीं, अहंकार हो कितना भी घोर ।
संसार की पीड़ा जब इतनी बढ़ जाए, कि सहन न हो पाए,
त्रिजटा से सीता अग्नि माँगें, राजसिकता की चिता सज जाए ।

तभी आते हैं हनुमान रूपी गुरुदेव, अहैतुकी कृपा कर,
पहुँचते मन रूपी मंदोदरी के, सुख से भरे महल के भीतर ।
मंदोदरी को सीता समझे, जीव रहे अनजाना,
गुरुदेव से मिलते ही, खुला रहस्य, सच पहचाना ।
तब जाना, यह मन सुख दिखा, दुःख ले आता,
बार-बार यह नाटक होता, जन्म पुनः हो जाता ।

सोए विवेक को गुरु जगाते, विभीषण के भवन में,
राम-नाम सुनकर हनुमान ने, सज्जन पहचाना क्षण में ।
करुणा-सागर गुरु, साधक के हित, स्वयं चलकर,
प्रवेश करते हैं हृदय रूपी, अशोक वाटिका के अंदर ।
मुद्रिका गिराकर विश्वास दिलाते, सीता रूपी आत्मा को,
शीघ्र ही मिला देंगे, राम रूपी परमात्मा को ।

रावण ने पूँछ जलाई, मन के प्रश्रय से भड़के विकार,
उसी आग में जली स्वर्ण-लंका, चोटिल हुआ अहंकार ।
चाहते तो हनुमान, ले जाते सीता को उठाकर,
मिला देते राम से, सहज ही कृपा कर ।
लेकिन चाहते हैं कि हो, अहंकार रूपी रावण का नाश,
परमात्मा की लीला पूरी हो, यही है उनका प्रयास ।
सीता क्यों बंदी लंका में, जीव क्यों भव में आया?
बात करें कुछ पुरानी, जब प्रभु ने खेल रचाया ।

भाग 2 – जीव की कथा

परमात्मा एक से अनेक हुए, रच दिए जीव, भव और भव-पीर,
अपने अंश जीव को दिया, सबसे श्रेष्ठ मानव शरीर ।
जीव ने कहा, क्यों भला, भेज रहे हैं मर्त्य लोक,
मैं आपका अंश सदा, नहीं चाहता कोई भोग ।
परमात्मा को लीला करनी थी, जीव को जाना ही था,
किंतु जीव पर दया भी आनी थी, अंश तो अपना ही था ।

दिया कवच आत्मा को, सदा रहेगी शुद्ध-बुद्ध ऐसे,
हरण से पहले अग्नि में, सीता को रखा प्रभु ने जैसे ।
लंका गईं माया-सीता, सत्य-सीता का था अग्नि में वास,
भटकता है जग में जीव, पर आत्मा रहती प्रभु के पास ।
गर्भ के दस मास जैसे, बीते सीता के, अशोक वाटिका में,
वैसे ही जन्म अनेक बीत गए, जीव के, मोह-निद्रा में ।

ईश्वर ने भी देखा, जीव है मुझे भूला हुआ,
मस्त है कर्मों में, अपनी धुन में खोया हुआ ।
आखिर में सीता ने, चूड़ामणि देकर, कहा हनुमान से,
प्रभु से कहना, कृपा करो! अब निकालो इस जंजाल से ।

भाग 3 – लंका-विजय

हनुमान ने कहा राम से, जीव भले खोया हुआ,
आत्मा की रक्षा आपका, कवच करता है सदा ।
करें कृपा, कर दें उद्धार, सीता रूपी आत्मा का,
भेजें भजन रूपी वानर, करें नाश विकार रूपी राक्षस का ।
अंगद रूपी निश्चय को, भेजें पहले लंका में,
ताकि अहंकार को चेता दे, उसके अपने ही घर में ।

अंगद ने जमाया पाँव, कोई योद्धा हिला न पाया,
दृढ़ निश्चय को भी कोई विकार, कभी डिगा न पाया ।
राम की कृपा से नाश हुआ, प्रयत्न-सामर्थ्य रूपी मेघनाद का,
मोह-निद्रा रूपी कुम्भकर्ण का, अहंकार रूपी रावण का ।
मंदोदरी रूपी मन ने, लिया विवेक-विभीषण का आश्रय,
सत और असत सभी अब, लंका में रहें निर्भय ।

भाग 4 – अग्नि-परीक्षा

जीव की परीक्षा लेकिन, स्वयं लेते हैं भगवान,
अग्नि-परीक्षा सीता की होगी, यह निश्चित विधान ।
लोग कहें यह परीक्षा थी, पर यह था छाया का अंत,
अग्नि से निकलीं सत्य-सीता, जीवन में छाया वसंत ।
जीव का पुनः अग्नि-प्रवेश ही, उसे देगा वास्तविक रूप,
राम रूपी परमात्मा की कृपा, है अनूठी, अनूप ।

मेरे भीतर भी लंका है, मन मंदोदरी-सा सुख में खोए,
क्रोध-लोभ के राक्षस जागें, विवेक मेरा कब तक सोए?
सीता और राम का मिलन, हनुमान के बिना कैसे हो?
आत्मा और परमात्मा का मिलन, गुरुदेव के बिना कैसे हो?

हे गुरुदेव! अब लंकापुरी के, रावण का शीघ्र नाश हो,
करें कृपा कि शीघ्र ही, हमारे विवेक का विकास हो ।
आपका मंत्र विभीषण ने माना, लंका का राजा बन गया,
हम पर भी करें कृपा गुरुदेव, यह मन भी शरण में आ गया ।
नाश हो अहंकार का, मिले भगवत्कृपा अविराम,
गुरु की शरण में रहें, करते रहें राम को प्रणाम ।

संदर्भ

माया-सीता, असली सीता का अग्नि में वास: रामचरितमानस, अरण्यकांड ("तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा")
अग्नि-परीक्षा, अग्नि द्वारा सत्य-सीता को लौटाना: रामचरितमानस, लंकाकांड; वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड 116–118
तृण की ओट से रावण को उत्तर, त्रिजटा से अग्नि माँगना, मुद्रिका, लंका-दहन, चूड़ामणि: रामचरितमानस, सुंदरकांड
हनुमान का मंदोदरी को सीता समझना: वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड 10–11
अंगद का पाँव: रामचरितमानस, लंकाकांड
"तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना": हनुमान चालीसा
शरीर = लंका, मन = मंदोदरी आदि रूपक: कवि की आध्यात्मिक व्याख्या (कथावाचक परम्परा में प्रचलित शैली)

🎬 यह कविता कवि के स्वयं के स्वर में, चित्रों और संगीत के साथ देखें: https://youtu.be/DyTf3U6Yzac

📚 राम को प्रणाम – सभी कविताएँ

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

Tuesday, November 3, 2026

अभिव्यक्ति

कविता: एम. एल. गुप्ता

साँसों पर पहरा है।
ज़ख़्म कोई गहरा है।
मुझे ख़्याल रहा कि कोई बुला लेगा मुझे,
अचानक सूनापन छा गया
लगा जैसे कोई सो गया !
साँस थमने लगी और जी बैठने सा लगा।
क्या होने वाला है? मन काँपने सा लगा।
ख़बर आई कि हमला हुआ है
वीर जवानों के क़ाफ़िले पर,
किया है आत्मघाती हमला,
माँ भारती के रक्षकों पर !
गिनती बढ़ती गयी,
शव बन गए हँसते मुस्कुराते
खिलखिलाते जवान,
अभी उसने बताया था कि
कैसे उसकी गर्भवती पत्नी ने किया था मुश्किल से विदा,
बूढ़ी माँ ने कहा था कि बेटा जल्द ही आकर मिलना।
कैसे बच्चे कर रहे थे प्यारी प्यारी बातें,
कैसी बीती थी पत्नी के साथ मधुर अंतरंग रातें।
इतने में एक धमाका हुआ,
चिथड़े उड़ने लगे, सब धुआँ धुआँ हो गया।
पता भी न चला, कैसे संसार लुट गया,
कितनी कोख उजड़ गयी, कितना सिंदूर मिट गया।
अब हम दे रहे हैं चिता को आग,
फ़ौजी सम्मान के साथ,
लेकिन मन है क्षुब्ध, क्रोधित,
बदले के लिए आक्रोशित,
ज़ख़्म यह गहरा है,
साँसों पर पहरा है।

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

चिन्तन

कविता: एम. एल. गुप्ता

साँचे के परे
देखे थे सपने,
सिर्फ़ मैंने ही जाना उन्हें !

जलता रहा मन,
कभी एकाकी हो ही न सका,
क्योंकि
ठहरा नहीं वर्तमान में !

हाथ थामकर साथ चले चलो,
इस आशा में जीवन गुज़रता रहा,
और तुम गोद में उठाए,
चलते रहे,
अनगिनत जन्मों से !

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

विराम

कविता: एम. एल. गुप्ता

शब्द बहे जब अविराम,
अर्थ अपना खोने लगे,
क्यों कि,
अर्थ तो विराम से ही है !!

दुःख तो अनवरत है,
सुख
मात्र विराम में है !

जिया अनवरत,
विराम के क्षण में हुआ अहसास !
जिया कहाँ,
जीने का मात्र रहा आभास !!
जब ठहर कर देखा तो पता चला,
यह पागल मन कहाँ भाग रहा,
और मैं भी,
यूँ ही साथ बह रहा ?
बस यूँ ही !!!

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

होली का संदेश

कविता: एम. एल. गुप्ता

सास कहे दामाद से, तेरे गोरे गाल
आ जा मेरे पास में, ला मल दूँ मैं गुलाल,
जो सास मले गुलाल, दामाद बड़ा शर्माये,
सास कहे सब एक एक, अब देवर कहाँ से आए,
कहाँ से आए ननदिया, जो करे ठिठोली,
कहाँ से आए नंदोई, जो भिगोए रंग से चोली,
कैसे खेलें वो होली जो रिश्तों को स्नेह से भिगो दें,
एक एक बच्चा पैदा कर, परिवार कैसे बढ़ा लें !

एक राष्ट्र यह चिर पुरातन, नित नूतन भी यही है,
संस्कृति प्रवाहित निरंतर, युग युग से रही है।
यह प्रवाह, सनातन धर्म के कारण सदा रह पाया,
वसुधैव कुटुम्बकम्, के भाव से ही चल पाया।
हमने आत्मसात किया, विदेशी और विधर्मी को,
लेकिन कभी नहीं भूले, अपने देव और सरज़मीं को,
ऐसा करने के लिए हमने, आटे में नमक मिलाया,
दूध में चीनी की तरह, उनको गले लगाया।
संख्या बल में अधिक रहे, इसीलिए ऐसा कर पाए,
संख्या सीमित होने पर, संस्कृति बच नहीं पाए,
हमारा धर्म, हमारी आस्था दुनिया में भी फैला था।
लेकिन हिमालय से समुद्र तक, उद्गम स्रोत सदा यह था।
इस धरा पर सनातन धर्म को, निश्चित जीवित रखना है,
न्यूनतम दो बच्चों का, पालन हमको करना है।
यदि हम माता पिता का क़र्ज़ चुकाना चाहते हैं,
पति पत्नी के दो बच्चे हों, यह सभी चाहते हैं।
अपने परिवार को बचाओ, संस्कृति को बचाओ,
न्यूनतम दो बच्चे हों, यह पाठ सभी पढ़ जाओ।

बातें कितनी हैं दिल में सारी कहाँ कह पाता हूँ,
होली मंगलमय सभी को, प्रणाम चरणों में करता हूँ।

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

देवात्मा हिमालय

कविता: एम. एल. गुप्ता

प्रकृति की गोद में
जब जगत् हो सामने
उठते हैं निरंतर
संकल्प और विकल्प मन में,
यहाँ नूब्रा घाटी, लद्दाख़ में,
प्रकृति की गोद में,
मन स्वाभाविक रूप से हो रहा है शांत,
सामने हिमालय की अचल प्रेरणा से,
बहती हुई नदी की रसधार से,
रेतीले तट की सुरम्यता से,
मन लौट चला है अपने ही भीतर,
लेना ही नहीं चाहता कुछ और,
यह आनंदित, प्रफुल्लित मन
मेरा ही तो है !
लगता है लौट गया हूँ अपने में,
अवसर है यहाँ अपने से मिलने का !

प्रकृति है माँ के रूप में आँचल फैलाए हुए,
आ अपनी चिंता और तनाव मिटा,
चुप हो जा, बैठ जा, मेरी गोद में लेट जा !
इसीलिए हिमालय के आस पास,
बौद्ध धर्म को अपनाया गया,
ध्यान का मार्ग जनता में अपनाया गया,
मैदान में व्यक्ति लोभ के वशीभूत है,
उसके मन में जागती लूट और भूख है,
देवात्मा हिमालय आज भी अपनी गोद में,
प्रकृति को समेटे है अपने शुद्ध रूप में !

यहाँ लगता है,
यह है सुपरिचित वातावरण,
जाने कितने जन्मों के आवरण,
लेकिन अभी भी लगता है,
यह अपने घर जैसा,
माँ की गोद जैसा प्यारा
और जन्म जन्मांतर की तलाश जैसा,
लगता है यहाँ जीवन है,
जीने के लिए !
और वहाँ लगता है,
जीवन है कुछ करने के लिए !

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

त्रिजटा – राक्षसों के बीच राम भक्ति | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

त्रिजटा नाम राक्षसी एका, राम चरण रति निपुण विवेका,
विभीषण और सरमा की पुत्री ने, साथ दिया था सीता का।
मोक्ष चाहते हैं सभी, जन्म मरण की पीड़ा से बचने के लिए,
भक्त का जन्म दुर्लभ है, जिसका जीवन हो राम के लिए।
परमात्मा के लिए भी आसान है, जीव को मुक्ति का दान,
राक्षस हो, चाहे पशु या मानव, पाया सभी ने मोक्ष महान।
दुर्लभ सदा है भक्ति, जहाँ काम नहीं आती शक्ति,
ज्ञान के सहारे बढ़ता साधक, परिणाम मात्र मुक्ति।
अनेक जन्मों के पश्चात्, ज्ञानी कभी होता, शरण प्रभु की,
सम्पूर्ण जगत, है वासुदेव का रूप, दृष्टि यही होती उसकी।

बत्तीस दाँतों के बीच, जैसे रहती है जिह्वा सदा,
ऐसे ही राक्षसों के साथ, जन्म से रही त्रिजटा।
त्रिजटा है संगम तीन गुणों का,
स्नेह, युक्ति और प्रेम का।
त्रिवेणी बह रही लंका में, कर्म भक्ति और ज्ञान की,
इसका प्रभाव ऐसा कि, सीता की सेवा करे राक्षसी।
गहरी जानकारी थी उसे, राक्षसी स्वभाव की,
प्रयास यही कि कैसे यहाँ, रक्षित रहेगी जानकी।

भय दिखलाना राक्षस स्वभाव, दशानन ने की हुंकार,
करो भयभीत इतना कि, सीता करे रावण को स्वीकार।
रावण धमकी देकर गया, अब मात्र मास एक शेष,
सीता को धैर्य दिलाने के लिए, चाहिये उपाय विशेष।
माँ जानकी संबोधित कर रही, त्रिजटा को माता यहाँ,
कहा कि अब नहीं सहना, करो अग्नि का इंतजाम माँ।
रावण ने कहा, एक मास के बाद जीवन का होगा अंत,
राम के बिना जीवन अर्थहीन, आज ही कर लूँ मैं अंत।

करती है युक्ति का प्रयोग, रात्रि में नहीं मिलेगी आग,
धैर्य धारण करो देवी, दिन में करेंगे उचित प्रयास।
बिठा लिया सभी राक्षसी को, घेरे में सुनाने लगी कहानी,
मुझे आया था स्वप्न भयानक, बात सभी ने सच मानी।
राम आ गए विशाल सेना लेकर, हरा दिया दशानन को,
एक वानर ने आकर जला दिया, स्वर्णमयी लंका को।
सीता के हाथ में होगा सबका जीवन, सेवा करो इनकी,
वरना समय आने पर देनी होगी, कीमत अपने प्राणों की।

स्नेह दिया जानकी को, भय दिखलाया राक्षसी को,
भक्ति और बुद्धि का अद्भुत मिलन, दिखा माँ सीता को।
लंका से जब सीता लौटी, त्रिजटा वियोग में रोने लगी,
दिया सीता राम ने वरदान, कलियुग में एक दिन पूजा होगी,
वर्ष में एक दिन, पूजन होता है माँ त्रिजटा का वाराणसी में,
कार्तिक पूर्णिमा के अगले दिन, साक्षी विनायक मंदिर काशी में,
राक्षस भी पाते वरदान, जब कृपा हो सियाराम की,
करें सब राम को प्रणाम, सब पायेंगे कृपा श्री राम की।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta