Tuesday, August 20, 2019

आत्मालाप

दुःख और सुख शाश्वत है जीवन में,
ऐसा मैंने मान लिया था। 
लेकिन दुःख से छुटकारा पाना तो मैं भी चाहता था। 
जो चाहा वो मिल जाये, लेकिन लोभ बढ़ता जाये,
लोक मर्यादा के विरुद्ध चाहत भी किसको बतलाये। 
जो लोक सोचे वैसा जीवन सुख पूर्ण होता जाये,
भीतर का दुःख , कैसे किसको समझाये ?
जहाँ भी दुःख का गान किया, अपनी अस्मिता का क्षरण किया,
ऐसा जीवन सुन्दर लेकिन, उसमें दुःख इतना भरा,
कहने को सारे सुख,लेकिन मन के भीतर कांटा गड़ा। 

ऐसा जीवन जीते जीते , पुस्तकीय ज्ञान भी पा लिया।
औरों को मार्ग दिखाने का दम्भ भी मन में जगा लिया। 
इतना ज्ञान कि ऐसा लगता धर्म का अर्थ भी समझ लिया। 
आत्म ज्ञान भी मन की एक अवस्था, ऐसा मान लिया। 
ऐसा लगा कि बुद्धि के द्वारा समझ सब आ गया,
मानव प्रकृति के वश मे , यह 'सत्य' समझ में आ गया। 

लेकिन गुरुदेव के दर्शन से, आत्म ज्ञान का सत्य पता चला। 
आत्म ज्ञानी के दर्शन से, शास्त्र का सत्य पता चला। 
आत्म ज्ञान है, मन बुद्धि और प्रकृति के परे ,
इसे जानना है असंभव, इसीलिए मन प्रयत्न न करे ,
मन की मृत्यु है आत्म ज्ञान ,
स्वयं की वास्तिवकता का ज्ञान,
प्रकृति के वश में देह रहेगी सदा ,
लेकिन मुक्त हो जायेगा जो सदैव ही मुक्त है,
जिसे भ्रान्ति हो गयी है, स्वयं को मानता है देह,
सूक्ष्म शरीर जो बार बार धारण करता है नयी स्थूल देह,
आत्मा ने किया है तादात्म्य सूक्ष्म शरीर से ,
कारण है इसका कारण शरीर, जो मूल कारण है,
यह सुक्ष्म शरीर के परे है, इसीलिए इसे बुद्धि से नहीं समझ सकते है। 


सुख दुःख का अनुभव करता है सूक्ष्म शरीर,
यही यात्रा करता है, संस्कार और स्मृतियों के रूप में,
जीव के साथ, जो इससे जुड़ा रहता है, इसे अपना मान कर,
अनुभव करता है , सुख दुःख का इस तादात्म्य के कारण। 
सूक्ष्म शरीर है प्रकृति का अंश, इसी लिए जड़ है,
यह तादात्म्य ही इसकी ऊर्जा का स्त्रोत है। 

साक्षी भाव इस तादात्म्य के संस्कार को शिथिल करता है,
इसीलिए सुख दुःख का अनुभव स्वयं को होने से बचा पाता है। 
लेकिन प्रकृति का वश अधिक होने के कारण ,
साक्षी भाव स्थिर नहीं रह पाता है। 
ऐसे में प्रार्थना के द्वारा व्यक्ति को सम्बल मिल पाता है,
और सुख दुख या आवेग से व्यक्ति बच जाता है। 

यह सब जानते हुए, भी प्रकृति का आकर्षण नहीं छूट पाता है,
बार बार व्यक्ति आवेग के प्रवाह में बह जाता है,
आवेग के प्रवाह में बहने का जन्म-जन्मान्तर का अभ्यास  है। 
इससे पार पा सकने के लिए, करना विपरीत अभ्यास है। 

साक्षी भाव और प्रार्थना, आवेग का प्रवाह,
और आवेग शांत होने पर पुनः साक्षी भाव और प्रार्थना। 
धीरे धीरे साक्षी भाव और प्रार्थना का समय बढ़ता जाये,
आवेग के प्रवाह में समय कम होता जाये ,
कर्त्तव्य सम्पादन में अधिकाधिक समय लगे,
मिथ्याचारिता से जीवन दूर रहे,
ऐसे ही किसी दिन प्रार्थना होगी स्वीकार ,
और परम से होगा जीवन में साक्षात्कार,
उसके बाद आवेग का प्रवाह कुछ न कर पायेगा,
यह जीवन परम शांति से परिपूर्ण हो जायेगा। 
यात्रा अनंत की चलती रहे अनंत,
जीव का शाश्वत आनंद  बढ़ता रहे अनंत। 

CODE SIMPLIFIED: LIFE - (A Talk)

interesting है ना !
LIFE तो simple ही तो है |  नहीं ?
अच्छा कितने लोग कहते हैं की life simple है ?
हाथ खड़े करके बताओ !

हाँ, और अब कितने लोग कहते हैं कि life simple नहीं है | 
हाथ खड़े करके बताओ | 

अच्छा, ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने दोनों options में ही हाथ खड़ा नहीं किया 
होता है confusion, 
सच बोलना बेहतर है, दूसरे को देखकर हाथ खड़ा करने से | 
हाथ खड़े करके बताओ | 

तो अब लेकिन यह तो सभी चाहते हैं ना कि life simple हो !
कमसे कम इतने साल जीने के बाद तो निश्चित ही ऐसा सभी चाहते हैं | 
actually हम जीना चाहते हैं, लेकिन बार-बार भूल जाते हैं | 
क्या भूल जाते हैं ?

जीना भला कोई कैसे भूल सकता है ? साँस तो खुद ही चलती रहती है | 
तो देखो यह तो प्रकृति की सबसे बड़ी देन है कि सांस खुदबखुद चलती है | 
वरना तो हम खाना भूल जाते हैं, पीना भूल जाते हैं,
कोई आश्चर्य नहीं कि हम साँस लेना भी भूल जाते और कब के ही यह दुनिया छोड़ चुके होते | 

अच्छा life में वर्तमान तो हमेशा simple ही होता है !
है ना,
क्षण मात्र का ही तो है,
जो कुछ मैं अब तक बोलै, सब भूतकाल हो चुका,
वह अब सिर्फ आपकी स्मृति में है,
जो आगे बोलूँगा, उसकी मात्र कल्पना है, 
कल्पनां भी स्मृति का ही  परिणाम है | 

अभी, यह अभी का क्षण मूलयवान है,
पर इसकी कीमत हम नहीं जानते,
सही तो है, ऐसा क्या कीमती होने जा रहा है इस क्षण में,
क्या कोई लाख रु देने वाला है अभी इस क्षण में ?
लेकिन बस इन चार पंक्तियों में अनमोल सूत्र छिपे है,
life को simple करने के, जानने के, और simple बनाने के | 

पहला सूत्र अभी,
दूसरा सूत्र, कीमती क्षण है, लेकिन कैसे ?
इसलिए नहीं कि कोई अभी आपको लाख रु देगा,
बल्कि इसलिए की,
मान लो अगले 5 मिनट में मौत आने वाली है,
फिर 
कोई लाख रू दे, वो बेहतर है,
या मरते मरते अपने बच्चों से एक बार बात कर ले,
अपने जीवन साथी को गले लगा लें ,
एक बार उसको बता दें ,
मुझे तुमसे जितना प्यार है, उतना कभी व्यक्त ही नहीं हो पाया,
अपने माता पिता को धन्यवाद कर ले,
जितना आपने दिया, उसका एक अंश भी सेवा नहीं कर पाए,
अपने भाई बहन को बता दे, कि सब लड़ाइयां झूठी थी,
दिल में तो अथाह प्यार भरा पड़ा है,
अपने दोस्तों को एक फ़ोन करके thank you कह दें,
काश ये 5 मिनट थोड़े से लम्बे हो जाये,
एक बार अपने मेरे पास आ जाये,
बस एक बार मरते मरते राम नाम मुख में आ जाये,
कोई तुलसीदल और गंगाजल दे जाये,
भले ही लाख रुपये मुझसे ले जाये | 
कितना कीमती यह क्षण है,
मौत की याद आते ही,
और मौत तो कभी भी आ सकती है | 
तो यह हुआ दूसरा सूत्र कभी भी,

पहला सूत्र था 'अभी'
दूसरा सूत्र 'क्योंकि कभी भी'

सारी की सारी complexity भविष्य की कल्पना और अतीत की स्मृति में है | 
जब भी कोई कुछ मन के विपरीत कहता है या करता है,,
मन तीन तरह से react करता है -
यह व्यक्ति मेरे साथ ऐसा व्यवहार कितनी बार कर चूका है, आगे भी ऐसा ही करेगा,
मेरे साथ ऐसा व्यवहार पहले फलां फलां ने भी किया है, आखिर कब तक सहन करुँ,
और इसके मन में मेरे प्रति सम्मान नहीं है (यदि छोटा है), स्नेह नहीं है (यदि बड़ा है), और इसे मेरी परवाह नहीं है (यदि समान स्तर पर है) | 
और स्मृति के पेट्रोल से भरे टैंक में दियासलाई लग जाती है,
और हम ऐसा react करते हैं, जो कि complexity को जन्म देता है, या बढ़ा देता है,
हल क्या है ?
तीसरा सूत्र 'अ'भी नहीं '
react करना है, लेकिन अभी नहीं | 
थोड़ा समय मन को दिया, शांत  बाद react किया,
तो ढंग बदल जायेगा, वही reaction सकारातमक बन जायेगा,
आपकी और सामने वाले के सम्बन्ध की गुणवत्ता बदल जाएगी,
quality बदल जाएगी, life में जीने का मज़ा बढ़ जायेगा | 

तीसरा सूत्र बड़ा काम का है, 
दुसरे से व्यवहार करने में ही नहीं,
अपने मन से व्यवहार करने में भी | 
घर से shopping का plan बनाया, list बनाई , बजट बनाया,
दुकानदार बड़ा चतुर होता है,
window में वो सजाता है, जो मन को ललचा दे,
और आपका shopping plan, list , budget सब बदलने लगता है | 
बच्चे, नित नई फरमाइशें लाते है,
online sales और discounts ललचाते हैं ,
आपको याद रखना है, तीसरा सूत्र - 'अभी नहीं' 
पहले shopping list ,plan ,बजट,उसके बाद reaction करना है |

और अब चौथा और आज का अंतिम सूत्र - 'कभी नहीं'
अपने को धोखा कभी नहीं ,
झूठ बोलना पड़ता है, लेकिन औरों से,
खुद को बोला झूठ life को complex बनाता है | 
मन - मस्तिष्क से आवाज आ रही है, अब यह situation manage होना मुश्किल है,
नहीं - नहीं सब हो जायेगा ,
देखते हैं, कोई तो हल निकलेगा,
सोचो positive, मैं नहीं कह रहा कि उम्मीद छोड़ दो,
लेकिन खुद को धोखा मत दो,
यह भी सोचो कि अगर हल नहीं हुआ तो क्या होगा ? 
plan B बनाओ, सब कुछ घट सकता है इस संसार में |
कहा गया है - अनहोनी होती नहीं, होनी हो सो होय | 
loss, death सब कुछ होना संभव है,
यदि हो ही जाये, तो क्या होगा ? उस पर विचार करो,
इस तरह से अपने धन, संपत्ति एवं परिवार को व्यवस्थित करो कि,
आप जीवन पर focus कर सको | 
खुद को इस जीवन की सच्चाई से रूबरू होने दो,
सब कुछ यहाँ घट सकता है,
इसलिए plan B पर हमेशा विचार करो | 
सफलता के साथ असफलता के लिए भी खुद को तैयार करो,
और पूरी लगन से सफलता के लिए काम करो | 
अपने को धोखा मत दो कि मेरी ताकत चुक गयी है,
पुरे दम से लगे रहो, और फल जो भी हो,
सफलता या असफलता के लिए तैयार रहो | 
अपने को धोखा मत दो कि,
मैँ असफल नहीं हो सकता हूँ |
और निराशा का रास्ता अपनाकर यह धोखा भी मत दो कि ,
मैं सफल नहीं हो सकता हूँ | 
इसलिए चौथा और अंतिम सूत्र - 'कभी नहीं' | 

याद रखो,
पहला सूत्र - अभी (वर्तमान में है जीवन Simple Life)
दूसरा सूत्र - क्योंकि कभी भी (मौत खड़ी है आगे इंतज़ार में)
तीसरा सूत्र - अभी नहीं (delay your reactions - especially negative ones )
और चौथा सूत्र - कभी नहीं (Never deceive yourself - work for success, be ready with plan B.  

धन्यवाद | 

Sunday, May 5, 2019

मुक्ति - FREEDOM (A peep into time - written on 25 July 1987) 5 May 2019

अगर तुम चाहते हो,
एक मुक्त जिंदगी
- काल गणना का हर साधन मिटा दो,
- दुनिया के सारे कैलेण्डर हटा दो,
- घड़ियों को बीते कल की यादें बना दो,
- और हर घंटाघर की मंजिल गिरा दो।

फिर रहेगा
सिर्फ कल, आज और कल
एक दिन
होगा बराबर
एक घंटे, मिनट और सेकंड के।

आदमी स्वतन्त्र होगा,
समय का न दास होगा,
वक्त के बंधन न होंगे,
वक्त का इंतज़ार न होगा,
न वक्त गुजारेगा आदमी,
न ही वक्त गुजारेगा आदमी को,
खुले आसमां में उड़ेगा आदमी,
मगर न भूलेगा जमीं को।

साल, महीने और सप्ताह न होंगे,
किन्तु,
जन्म और मृत्यु होते रहेंगे।
काल गणना का माध्यम जीवन ही होगा
मूल्याङ्कन मृत्यु के बाद ही होगा
अपने अतीत के लिए
मनुष्य को एक दिन से अधिक
पछताना न होगा
एक दिन से अधिक के लिए
भविष्य का तनाव
सहना न होगा।

लेकिन यह दास.
पीढ़ियों से गुलाम
ऐसी मुक्ति पाना पसंद नहीं करेगा
रेंगने का आदी
समय का कीड़ा
उड़ने का मौका बेकार खो देगा।
सिर्फ वही नहीं,
विश्व की मेधा
जिसे सम्मानित किया जाता है,
समय-समय पर
समय के बिना
इस जहाँ पर
हुकूमत कैसे कर पाएगी
इसीलिए यह बदलाव सह न पायेगी।

आदमी को
समय का डर दिखाकर
पंगु बना दिया गया है
उसकी मानसिक व शारीरिक
क्रियाओं को सीमित कर दिया गया है
वर्षों की मेहनत के नाम पर
सभ्यता के आवरण में
बंधनों को जकड़ दिया गया है
भविष्य को खुशनुमा बनाने के लिए,
वर्तमान का मन मसोस दिया गया है
अतीत की रक्षा और
उससे सीखने के नाम पर
आज को मसल कर दबा दिया गया है।

मगर परिणाम क्या रहा है
अभी भी बगावत के स्वर उठ रहे हैं
अब भी कसमसा रहे हैं
विद्रोही इन जंजीरों के जाल में
पर भला इन्हें कौन समझाए?
सैंकड़ो वर्षों के बंधन कब
कुछ वर्षों में टूट पाए है
हाँ,
जो चिंगारियाँ उठ रही है
वो भड़ककर शोला जरूर बनेगी
आज नहीं तो कल
आने वाली पीढ़ियों को
एक खुला आकाश उड़ने के लिए
और
एक सुदृढ़ जमीं रहने के लिए
बनाने का अवसर देगी।

उस वक्त जरुरत होगी
जहाँ में एक ऐसे इंसान की
वर्तमान के शैतान और
भविष्य के भगवान की
जो
लपटों का रुख मोड़ दे
और एक-एक कर सारे बंधन तोड़ दे
बना दे स्वतन्त्र संसार
न देश काल की सीमा हो,
न हो व्यथा दुत्कार।
इस स्वप्न को
यथार्थ में कौन बदलेगा
सर्वहारा का मसीहा
या
भारत का राजपुत्र
अथवा
कोई विज्ञान-पुत्र
समय ही बताएगा।


Saturday, May 5, 2018

वर्तमान (A peep into start of search: written on 25 July 1990) - 5 May 2018

तुम क्या चाहते हो मुझसे बताओ जरा,
कुछ भी कहना नहीं चाहता हूँ मैं अभी,
मेरे जीवन की राहे अभी तय नहीं,
मुक्त जीवन बिताना चाहता हूँ अभी ।

जीवन लक्ष्य की और बढ़ना है मुझे,
जीवन में 'कुछ' है पाना मुझे,
'क़ुछ' की परिभाषा मैं दूंगा भी क्या,
खुद को ही मालूम नहीं है अभी ।

इतना ही जानता हूँ कि अपनी राह में,
कांटे न बिछाऊ अपनी चाह में,
चाहता हूँ साधनों की शुद्धता भी मैं,
पर साध्य के लिए बढ़ना चाहता हूँ अभी।

समय देखते-देखते गुजर जायेगा,
वह वक्त भी फिर आ जायेगा,
जब मैं खड़ा हूँगा दोराहे पर फिर,
उसके लिए ढलना पड़ेगा अभी।

मुझे business नहीं carrier चाहिये ,
मुझे पैसा नहीं, अध्ययन चाहिये ,
मेरे लक्ष्य के अनुरूप है बस यही,
उससे दूर होना न चाहता हूँ अभी।

जन्मांतर के बंधन से मुक्ति मिले,
न मुझ पर बकाया हो शिकवे-गिले ,
मुझे फिर-फिर न आना पड़े लौटकर,
ऐसा निर्वाण चाहता हूँ मैं अभी। 

Friday, May 5, 2017

जागरण - गुरु की तलाश (Written on 16 January 2003 - a peep in the past) 5 May 2017

चेतना विकसित हो,
व्यर्थता अनुभव हो,
प्रतीति सघन हो,
हर सुख की कामना दुःख का कारण है।
श्रेय और प्रेय का अंतर यही है,
प्रेय की चाह और उसका अंत दुःख है,
श्रेय की प्राप्ति आनंद का स्त्रोत है।

प्रेय की निरंतरता नहीं देगी आभास दुःख का,
लेकिन यह संभव नहीं,
जीवन का अनुभव बार-बार यह सिद्ध करता है,
प्रेय नश्वर है, एक झोंका जो आता है और चला जाता है,
दुःख की निरंतरता में प्रेय की उपलब्धि,
देती है एक झलक सुख की,
और छा जाती है फिर वही उदासी।

प्रेय की निरंतरता भी मन की मूर्च्छा का क्षण है -
बेहोशी छाई रहती है, मदमस्त हो जाता है मन,
चेतना नहीं जागृत, सब कुछ हो जाता है तन,
लेकिन हर बार नश्वर सिद्ध होता है यह क्षण,
लेकिन करने लगता है, प्रतीक्षा फिर से यह मन।
बार-बार का अनुभव भी सिखा नहीं पाता है,
मन फिर से उसी, पुराने ढर्रे पर लौट जाता है,
संसार रूपी कक्ष में, चेतना घूमती है मन के वर्तुल में,
अनेक बार मोक्ष रूपी द्वार आता है नजदीक में,
ध्यान, लेकिन संसार की और लगा रह जाता है,
अंतर्यात्रा के लिए चेतना का जागरण नहीं हो पाता है।

बाहरी सम्बन्ध जो नजर आते हैं अनेक,
रचने वाला है सबको, भीतर मन मात्र एक,
अनेकों बंधन, जो मुझे जकड़ते नज़र आते हैं,
सब रचे हैं मेरे मन ने, खुद को भरमाते हैं।
मन को, ऊब होनी चाहिए इस दोहराव से,
दुःख की निरंतरता में, क्षणिक सुख के ठहराव से,
न जाने क्यों, यह भाव ठहर नहीं पाता है,
मन फिर से, इस संसार में रम जाता है।

हो सकता है, अभी जागरण का प्रथम क्षण हो,
तन्द्रा छाई हो, आलस्य का आवरण हो,
अनुभव होने लगा है, अभी परिपक्व न हुआ हो,
समय की धारा में, प्रकट तत्व न हुआ हो।
या फिर हो प्रतीक्षा किसी मांझी की,
जो मँझधार से खींच ले, ऐसे सहारे की,
कहते हैं, एकांत यात्रा है, जरूरत नहीं है साथी की,
तन है रथ, मन है घोड़े, जरुरत तो है रथी की।
जो सुना है कि बैठा है मेरे ही मन में,
उम्मीद है, प्रकट होगा किसी क्षण में,
थाम लेगा वल्गा जो, बनकर सारथि,
कौन करेगा प्रार्थना, कौन होगा प्रार्थी।

मन तो अभी मस्त है, सुख-दुःख के सागर में,
यह ज्ञान तो भरा है, बुद्धि की गागर में,
तन, मन, बुद्धि के पार है आत्मा,
कहते हैं, वो तो है स्वयं परमात्मा,
कर्मजन्य कालिमा से ढका हुआ है वह प्रकाश,
हो सकता है प्रकट वह, इसके लिए जो करे प्रयास।
पूर्व कर्मफल भोग ले और न बांधे वर्तमान के कर्म,
तो भविष्य में संभावना, है यह ज्ञान का मर्म।

कृष्ण कहते हैं, तू कर दे समपर्ण,
करता रह कर्म, और कर दे कर्मफल अर्पण।
ईसा कहते हैं, तू आ मेरी शरण,
मुक्त करता हूँ पापों से, तू कर दे समपर्ण।
बुद्ध कहते हैं, तू आशा मत कर,
होश में रहकर, मुक्ति का उपाय कर।
मुहम्मद का कहना है, एक पर विश्वास कर,
सब कुछ मिल जाएगा, अपना फ़र्ज़ अदा कर।
महावीर कहते हैं, सब कुछ पुरुषार्थ यहाँ,
नहीं कोई ईश्वर, हर व्यक्ति है समर्थ यहाँ,
विवेक से कर तू, यहाँ हर काम,
तू स्वयं ही परमात्मा, नहीं शास्त्र से काम।

सूत्र एक है, अंतर्यात्रा जरूरी है,
नश्वर है जगत, शाश्वत की खोज जरुरी है। 

(Now on 5 May 2017, many of the confusions are clear and still working on my inner journey. Now I have my Gurudev and it's like walking in shadow.)

Thursday, June 23, 2016

'स्वयं करे उद्धार'

उद्धार करे क्या कोई किसी का यहाँ पर,
स्वयं ही आदर न दे, विवेक को जहाँ पर ,
यदि परमात्मा की कृपा से होता उद्धार जीव का,
उद्धरेत आत्मनात्मानम से भ्रमित करें क्यों भला ?

यह जो कह रहे, समझा रहे, 
स्वयं भगवान ही तो प्रगट हुए। 
अपना पता प्रभु कभी, देते नहीं हैं जीव को,
लेकिन शरणागत की रक्षा में, प्रगट कर देते स्वयं को। 
जीव का प्रयास तो मात्र उद्धार की चाह है,
आदर दे स्व विवेक को, मात्र यही राह है,
भगवत्कृपा के लिए प्रभु करते हैं चुनाव,
पानी में उतरो तो पार लगाते हैं नाव ,
अपना मित्र स्वयं बनो, अपने विवेक के आदर से,
अपना शत्रु मत बनो, अपने मन के शासन से। 

मन की गुलामी को हम आजादी समझ लेते हैं ,
परम स्वतन्त्रता आत्म ज्ञान से, यह नहीं समझ पाते है। 
लायक हैं जूते खाने के, मन में तो सब जानते हैं ,
पश्चाताप के जूते मगर, सब, चुपचाप सह जाते हैं। 
दुनिया के सामने, भले बने फिरते हैं,
मौका पाते ही, दूसरे के दोष देखते हैं ,
भगवत्कृपा के साधन सभी, गुरु कृपा से मिल गये हैं,
अवसर सामने है उपस्थित, फिर भी चूक सकते हैं। 

गुरु की आवश्यकता नहीं, यह स्वामी जी की व्याख्या है,
उस मार्ग के राही हम नहीं, यह बात जानने की है,
परमात्मा स्वयं मार्ग दिखलाते हैं ,
उचित स्थान पर स्वतः पहुंचाते हैं। 

अब अपना ध्यान हम क्यों भटकाएं भला,
तद्विद्धि प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया। 
प्रणाम तो प्रदर्शित भी किया जा सकता है,
प्रश्न भी, कहीँ से भी, लाया जा सकता है,
लेकिन प्रश्न स्वयं का हो, अपने मन में हो जन्मा,
शास्त्रीय प्रश्न से शिष्य का, कभी न होता है भला,
गुरु के ज्ञान और स्तर का निर्णय शिष्य कैसे कर सकते है,
सद्गुरु भगवान की कृपा प्राप्त, भगवान जैसे ही होते  हैं। 

जो देख सकते हो आसान बात, कि चाह न हो, इनमें से किसी की,
धन, काम, या प्रसिद्धि, तीनो पर दृष्टि न होती सद्गुरु की,
फिर तो बात आसान है, जब कहीँ मन ठहर जाये,
बात हो अध्यात्म की, स्व विवेक से समझ आये,
जो प्रश्न मन में जन्मे हो, सब उत्तर पा जाये ,
सद्गुरु स्वयं ध्यान में, तुम्हें सब बता जाये। 
लेकिन बात इससे भी बने, यह होगा नहीं,
सेवा के बिना, अहंकार मिटेगा नहीं। 

अहंकार के रूप अनेक, कभी समझ नहीं आते,
जितनी भी पहचान अपनी, हम संसार से पाते। 
साधक परिवार भी, जब करे प्रशंसा,
कभी गुरु भी कर दे अनुशंषा ,
कभी मन में लगे कि प्रगति हो रही है,
संसार से वीतराग होने की बात बैठ रही है,
सुबह जागा यह अहंकार,
और शाम को होता बंटाधार। 

सेवया का अर्थ होता है, सेवा के द्वारा,
सेवा हो कैसे ? निर्णय सेव्य के द्वारा। 
प्रदर्शन सम्मान देने का, विनम्रता का करते यहीं,
मन के विरुद्ध बात सुनने का धैर्य भीतर है नहीं, 
जो बात मन के विरुद्ध हो, लगे यहाँ आना व्यर्थ है,
मन कहे कि 'संसार से पार जाने में जीव स्वयं समर्थ है'। 
और खुद को पता भी नहीं चलता, हो जाता है पतन,
दिन, महीने, साल व्यर्थ, सवारी करने लगता मन। 

कैसे हो रक्षा स्वयं से स्वयं की,
बात तो थी स्वयं से स्वयं के उद्धार की। 
स्व विवेक का आदर तो, सभी को कर लेना चाहिए,
लेकिन, इस कमजोर अहंकार को, सहारा चाहिए। 
यह काले सर्प की भाँति, फुंकारता है रात दिन,
अपने भय के कारण, जहर उगलता है सारे दिन,
इस कालियनाग के, फन हैं हमारी इन्द्रियाँ ,
मन के शासन में करे, रस भोग ये सर्वदा। 
इन्हे मर्दन करते है स्वयं, कृष्ण विवेक के द्वारा,
लेकिन अहंकार भरमाता, बुद्धि को मन के द्वारा। 

यही शास्त्र , यही ज्ञान अपना अर्थ प्रकट करने लगते हैं ,
जब सद्गुरु की सेवा से अहंकार का मर्दन करते है,
गुरु के वचनों को ध्यानपूर्वक सुनना,
यथासम्भव पालन करने का भाव रखना,
यही तो सेवा की शुरुआत है,
गुरु संसार के पार हैं, उन्हें संसार की कहाँ प्यास है। 
सद्गुरु परीक्षण करते रहते हैं शिष्य का,
याद करने मात्र से निरीक्षण कर देते है शिष्य का। 
उनकी प्रेरणा ही विवेक को सबल बनाती है,
झूठे राजा बने, मन को सही राह पर लाती है। 

सब कुछ होने पर भी बाहर भला क्या होता है,
यह वाकया तो सारा भीतर ही घटित होता है,
लेकिन सब कुछ न भी हो, इतना तो निश्चित होता है,
संसार में जीना पहले से आसान होता है। 
तितिक्षा के अभ्यास से अनित्य का प्रभाव कम हो जाता है,
गुरु कृपा से अशुभ प्रारब्ध भी क्षीण हो जाता है। 
सेवा और समर्पण से कभी अहंकार मिटे न मिटे ,
गुरु कृपा से हो भगवत्कृपा, संसार के बंधन मिटे। 

संसार का बंधन यह संसार नहीं है,
यहाँ हो रहां विनिमय व्यापार भी नही है,
बंधन है मात्र, अहंकार के द्वारा, संसार का परिचय,
अहंकार के बिना तो, यह संसार ही है वासुदेवमय। 

प्रणिपात हम कर सके, गुरुदेव कृपा कर दो,
प्रश्न रहे न रहे, सेवा का वर दो,
हमे नही चाह अब किसी और बात की,
कृपा कर दे, हमें शरण मिले आपकी। 

ॐ गुरु शरणम् ,ॐ गुरु शरणम् ,ॐ गुरु शरणम्। 



Thursday, May 5, 2016

ॐ गुरु शरणं (Birthday on 5th May 2016)

सृष्टि से पूर्व क्या प्रलय हुआ था ?
या प्रलय से पूर्व सृष्टि नहीं थी ?
क्या सृष्टि के पश्चात प्रलय नहीं होगा ?
या प्रलय के पश्चात सृष्टि न होगी ?
नित्य निरन्तर परिवर्तन , यही है सृष्टि का क्रम ,
प्रति क्षण होती सृष्टि एवं प्रति क्षण होता प्रलय ,
पूर्व और पश्चात कुछ भी तो नहीं,
वर्तमान के अतिरिक्त और कुछ नहीं। 

चेतना का देह के साथ जब अवतरण हुआ,
रूदन, हास्य, भूख व प्यास का स्मरण हुआ,
चेतना का तादात्म्य देह के साथ होने लगा,
मन के संकल्प के साथ देह में विचलन होने लगा। 
चेतना मन के रूप में सीमित हो गयी,
असीमित का अंश देह के साथ मिश्रित हो गयी। 

विजातीय का मिश्रण कभी हो नहीं पाता ,
चेतना को देह की सीमा में चैन मिल नहीं पाता ,
अपने को देह के साथ सीमित जान लिया,
देह के सुख दुःख को अपना मान लिया। 
निरंतर अपना मूल स्वभाव कचोटता रहा,
असीमित चेतन देह की सीमा में विकल होता रहा। 

असीमित होने लगा भूख, प्यास, हास्य और रूदन,
देह की सीमित आवश्यकता लेकिन जीव कर रहा संग्रहण,
देह के साथ तादात्म्य से माना स्वयं को सीमित,
परमात्मा की सृष्टि में, जीव ने किया अहंकार निर्मित। 

सृजन तो मात्र परमात्मा ही करते हैं ,
स्वयं ही शक्ति से प्रकृति रूप रहते हैं ,
स्वयं ही चेतन, जीव रूप में हुए प्रकट,
माया का यह खेल स्वयं का, स्वयं ही बने हुए है नट। 

जीव निर्मित अहंकार भ्रान्ति के सिवा कुछ नहीं ,
इसी लिए मुक्ति की चाह , भ्रान्ति से मुक्ति की ही । 
जब बंधन स्वयं भ्रान्ति हो तो मुक्ति सत्य कैसे होगी?
भ्रान्ति के मिटने से भी मुक्ति, नहीं, शांति ही होगी। 

सत्य है परमात्मा, सृष्टि और यह परिवर्तन,
सत्य है माया के मध्य नटवर का यह नर्तन,
असत्य है, मात्र अहंकार और तादातम्य,
असत्य है प्यास, कि हो जाये स्थायित्व। 

निरन्तर परिवर्तन रूप है यह सृष्टि,
परिवर्तित हो जाये यदि हमारी दृष्टि,
त्याग दें, यह स्थायित्व की तलाश,
और स्वीकार करें, जो भी है आस पास। 

अपने को सीमित माना , इस भ्रान्ति को जान ले ,
निरन्तर रखें स्मरण, स्वयं को पहचान ले  ,
तो होने लगता है अहसास, कि यह स्व निर्मित अहंकार,
और इससे प्रेरित भोग और संग्रहण का यह व्यापार ,
इसी से है दुःख सुख, जीवन में व्याप्त कमियां ,
है प्रेम की कमी, अपनों के दरमियाँ। 

मूल कारण है हमारा अहंकार,
जो है मात्र भ्रान्ति , निराधार। 

"ऐसा लगता है कि यह कैसी बात है ?
अहंकार से ही तो जाना है यह अस्तित्व मैंने,
इसी से तो जाना है इस संसार ने मुझे,
यही तो हुँ मैं स्वयं ,
इसी से तो मैं जानता हुँ खुद को,
इसी से तो पहचानता हुँ इस संसार को। 
और कुछ क्षण के लिए चलो मान भी लें ,
यह मात्र भ्रान्ति है, ऐसा पहचान भी लें ,
तो फिर क्या है उपयोग इस सृष्टि व्यापार का,
कौन, क्यों, किसलिए ? खेल चलेगा संसार का?"

जो अहंकार हर क्षण अपनी और अपनों की चिंता में व्यस्त था,
सुख दुःख, नाम, धन, काम और यौवन में मदमस्त था,
कैसे बात करने लग गया देखो बड़ी बड़ी,
मानो सृष्टि चलाने की जिम्मेदारी इस पर आन पड़ी। 

अरे मूर्ख, अपने दुःख सुख से तो, परेशान है कितने दिन से,
तलाश रहा था कि, काश ! मुक्ति मिल जाये इस झंझट से,
अपनी देह के परे चिंता की , तूने मात्र देह से जुड़े सम्बन्धों की,
अपने धन, मन-मर्यादा, इच्छा पूर्ति और प्रसिद्धि की। 
अब अपने आप को पहचान, 
सृष्टि के शाश्वत परिवर्तन को जान,
इसमें स्थायी अपनी दृष्टि को पहचान,
अपने तादात्म्य को जान , सत्य को पहचान। 

इस सृष्टि से कहीं दूर नहीं जाना है,
किसी नयी परिस्थिति की तलाश में नहीं भटकना है,
अपने कर्त्तव्य से कहीं दूर नहीं होना है,
कर्त्तव्य को जानना और बेहतर पूरा करना है। 

कर्त्तव्य है सदैव वर्त्तमान में,
न भूत काल, न भविष्य में,
क्षमता जितनी, उतना है कर्त्तव्य,
क्षमता के परे, नहीं कोई दायित्व,
कर्त्तव्य तय होता है व्यक्तिगत परिस्थिति से,
उस व्यक्ति की स्वयं की मनःस्थिति से। 
ऐसे कर्त्तव्य को जो सत्यता से पूर्ण करे,
उसकी अहंकार की भ्रान्ति स्वतः ही मिटे। 

"यदि इतना ही आसान है, तो भ्रान्ति मिटती क्यों नहीं है ?
दुःख सुख से मुक्ति हमें मिलती क्यों नहीं है ?
क्यों तलाश कर रहें है हम निरन्तर आगे बढ़ने की ,
यदि शांति मिलने के लिए जरूरत है मात्र ठहरने की ?"

थक गए हो तुम , इसलिए चाहते हो ठहराव,
मरहम ढूंढ रहे हो, संसार से मिले है इतने घाव,
यह अनुकूल में स्थायित्व की तलाश,
प्रतिकूल के परिवर्तन की जगाती है प्यास,
अनुकूल या प्रतिकूल, दोनों का परिवर्तन निश्चित है,
लेकिन, तुम्हारी भूमिका अनिश्चित है,
तुम्हारा कर्त्तव्य का पालन तुम्हे शान्ति के पास लाता है शनेः शनेः,
अहंकार का शमन, दुःख - सुख का नाश होता है शनेः शनेः। 

तुम्हारे परिवर्तन तुम्हारे भीतर होते हैं ,
दृष्टि के परिवर्तन से दृश्य तुम्हारे लिए बदलते हैं ,
तुम मुक्त होने लगते हो तनाव से,
मुक्त होते हो बंधन के भाव से,
यही संसार तुम्हें घाव नहीं, पुरस्कार देने लगता है,
मन शिकायत की जगह कृतज्ञता से भरने लगता है। 
दुःख पूर्ण सृष्टि तुम्हारे लिए शान्त होने लगती है,
दूसरे के दुःख के लिए, करुणा जगने लगती है। 
कर्त्तव्य के प्रति समपर्ण बढ़ने लगता है,
संसार चक्र तुम्हारे लिए सुखपूर्वक चलता है। 
प्रतिकूल घटना होती है, दुःख घट जाता है,
सकारात्मकता बनी रहती है, शीघ्र मन शान्त हो जाता है। 

"ऐसा हो जाये, कौन नहीं चाहता है,
यह चमत्कार जीवन में कैसे घट पाता है ?"

परमात्मा की कृपा से मिल जाये सद्गुरु,
वे कृपा कर अपना ले, तब होता है नवजीवन शुरू,
निरन्तर प्रार्थना यही है गुरुदेव से,
आप हैं समर्थ, हम मगन अपनी नींद में,
निरन्तर स्वप्न के दुःख से, दुःखी - सुखी हो रहे हैं ,
आप दया कर जगा दो, यह प्रार्थना कर रहे हैं। 
ले लो हमें शरण में, हमें समर्पण भी नहीं आता। 
जन्म जन्मांतर से, अहंकार का अभ्यास, झुक भी नहीं पाता।
आप कृपा कर अपनी दृष्टि से,
मुक्त कर दो हमें स्व निर्मित अहंकार की सृष्टि से। 
आप से कर सकें प्रार्थना निरन्तर, बस इतनी कृपा कर दो,
सदैव आश्रय ले मात्र आपका, बस इतनी दया कर दो,
मन करे मात्र यही स्मरण,
ॐ गुरु शरणं , ॐ गुरु शरणं , ॐ गुरु शरणं।