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द्वारका कथा यात्रा 2014

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भगवान कृष्ण की पवित्र नगरी द्वारका में श्री मद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन 23 दिसंबर से 29 दिसंबर 2014 तक है। 21 दिसंबर को सायंकाल जयपुर से रवाना होकर 22 दिसंबर सायंकाल पहुँचेंगे। 29 दिसंबर सायंकाल वापसी है जिससे 30 दिसंबर सायंकाल जयपुर पहुँचेंगे।  श्री विजयशंकर मेहता प्रतिदिन प्रातः 10 बजे से अपराह्न 1 बजे तक सुधी श्रोतागणों को कथामृत का पान कराएँगे।  300 से अधिक परिवार जन एवं मित्र सम्मिलित होंगे।  सभी का स्वागत है। निवेदक भिवाल परिवार लालसोट-जयपुर                                                    Pt. Vijayshankar Mehta

शरण

तुम क्यों चाहते हो दुःख से मुक्ति ? क्या तुम्हें पता है सुख भी समाप्त हो जायेगा  दुःख के साथ ही।  कहते हैं कि एक अलौकिक आनंद मिलेगा उसके बाद, जिसका शब्दों में वर्णन संभव नहीं।  क्या तुम्हें विश्वास नहीं है अपने सद्गुरु पर, जो चिंता करते हो सुख और दुःख की ? क्या करना है इस लोक के दुःख और सुख का, जब गुरुदेव कर सकते हैं बेड़ा पार इस लोक से ही।  इस छलांग के लिए मन तैयार क्यों नहीं है ? क्योंकि उसे पता है कि यह मात्र छलांग नहीं , वरन मन की मौत है।  मन  तो अनुभव कर सकता है मात्र दुःख या सुख, आनंद का अनुभव तो आत्मा का विषय है।  मन भला इसको कैसे स्वीकार करे ? मन के बिना कोई अभिव्यक्ति भी नहीं, संकल्प और विकल्प भी नहीं, विचार और उनका ठहराव भी नहीं, है बस एक अनिर्वचनीय शांति, जिसका प्रमाण है मात्र सद्गुरु, उनके सिवा जानने का कोई और ढंग भी नहीं।  ऐसे में क्या करें, मन तो अपने दुःख से मुक्ति चाहे, और सुख की निरंतर चाह करे।  बुद्धि तो मन की चेरी है, नित्य मन की ही परवाह करे।  ...

प्रार्थना (Birthday on 5th May, 2014) - Preachings from Gurudev

जन्म को पूर्ण हुए 44 वर्ष, या मृत्यु की दूरी कम हुई 44 वर्ष ? कहने के ढंग का ही अंतर है। जीवन के गुजरते हुए समय के साथ, क्या मुझमें भी कोई अंतर आता है ? क्या शरीर का जन्म, तरुणाई, जवानी और प्रौढ़ावस्था, ये सारे बदलाव मुझमें भी होते हैं ? मेरे मन की स्थिति तो हर समय बदल जाती है, कुछ स्मृतियाँ स्थायी हो जाती हैं, मन उन्हें बार बार दोहराता है, यादों की जुगाली करते करते, अपने ढंग से उन्हें बदल भी देता है। और लगने लगता है कि जीवन को जिया है मैंने अपने ढंग से, संतोष के साथ। बुरी स्मृतियाँ परे हटाकर मन अतीत को खुशनुमा बना लेता है। लेकिन जीवन अतीत में कहाँ चलता है, मन तो भविष्य की आशा व आशंकाओं में, भटकने लग जाता है, कभी आत्म विश्लेषण का प्रयास करने लग जाता है, कभी अपने चारों ओर कमियाँ ढूंढने लग जाता है, ऐसे ही गुजरता रहता है समय। किसी क्षण परमात्मा की कृपा से व्यक्ति का ध्यान चला जाता है, स्वयं, अपने आप पर, किसी संत के दर्शन से चोट लग जाती है, कुछ खोया हुआ सा है, जिसका उसे पता नहीं, लेकिन लगता है कि इन्हें पता है सही, कृपा हो जाती है संत की, गुरु से मिलन हो जात...

रामेश्वरम् कथा यात्रा 2014

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आज रामेश्वरम के लिए प्रस्थान कर रहे हैं।  7 जनवरी से 13 जनवरी श्री मद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन होगा।  200 से अधिक परिवार जन एवं मित्र सम्मिलित होंगे।  सभी का स्वागत है।