रामनवमी – कैकयी का बलिदान | राम को प्रणाम
रामनवमी उत्सव मना रहे हैं, राम के आविर्भाव का, स्वप्न साकार हुआ है अब, मंदिर के निर्माण का। मन में राम, तन में राम, साँसों में बसते हैं राम, धर्म का है, मर्म यही , जड़ चेतन में केवल राम। राम ने हमारे लिए , जिया आदर्श जीवन, मनुज लीला करते रहे, भटके जंगल वन। राम-लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न, जन्मे भाई साथ, साथ खेले, बड़े हुए, विवाह भी हुआ साथ। राज्याभिषेक की तैयारी हुई, राम को कुछ करना होगा , आए थे राक्षस वध हेतु, अब अवध छोड़ना होगा। कौन दे बलिदान अब, दाँव पर सर्वस्व है, पति, प्रिय पुत्र राम, और लोक यश है। राज काज में थी निपुण, युद्ध में भी साथ निभाती थी, नाम कैकयी, भरत की माता, राम को अधिक चाहती थी। मानवता है त्रस्त यहाँ, ऋषि पाते हैं कष्ट, राक्षस फैले हैं चारों ओर, तंत्र हो रहा भ्रष्ट। खर-दूषण की छावनी, बना हुआ दंडकारण्य, रावण लंका से करता राज, सुरक्षित नहीं अरण्य। क्या करोगे राजा बनकर, महलों में रहकर के राम, प्रजा को सुखी करे, यही राजा का असली काम। मैं सह लूँगी अपयश सारा, दशरथ के तुम प्राण हो, जीवन मृत्यु विधि के हाथ, तुम...