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'स्वयं करे उद्धार'

उद्धार करे क्या कोई किसी का यहाँ पर, स्वयं ही आदर न दे, विवेक को जहाँ पर , यदि परमात्मा की कृपा से होता उद्धार जीव का, उद्धरेदात्मनात्मानं से भ्रमित करें क्यों भला ? यह जो कह रहे, समझा रहे,  स्वयं भगवान ही तो प्रगट हुए।  अपना पता प्रभु कभी, देते नहीं हैं जीव को, लेकिन शरणागत की रक्षा में, प्रगट कर देते स्वयं को।  जीव का प्रयास तो मात्र उद्धार की चाह है, आदर दे स्व विवेक को, मात्र यही राह है, भगवत्कृपा के लिए प्रभु करते हैं चुनाव, पानी में उतरो तो पार लगाते हैं नाव , अपना मित्र स्वयं बनो, अपने विवेक के आदर से, अपना शत्रु मत बनो, अपने मन के शासन से।  मन की गुलामी को हम आजादी समझ लेते हैं , परम स्वतन्त्रता आत्म ज्ञान से, यह नहीं समझ पाते हैं।  लायक हैं जूते खाने के, मन में तो सब जानते हैं , पश्चाताप के जूते मगर, सब, चुपचाप सह जाते हैं।  दुनिया के सामने, भले बने फिरते हैं, मौका पाते ही, दूसरे के दोष देखते हैं , भगवत्कृपा के साधन सभी, गुरु कृपा से मिल गये हैं, अवसर सामने है उपस...