Friday, May 5, 2017

जागरण - गुरु की तलाश (Written on 16 January 2003 - a peep in the past)

चेतना विकसित हो,
व्यर्थता अनुभव हो,
प्रतीति सघन हो,
हर सुख की कामना दुःख का कारण है।
श्रेय और प्रेय का अंतर यही है,
प्रेय की चाह और उसका अंत दुःख है,
श्रेय की प्राप्ति आनंद का स्त्रोत है।

प्रेय की निरंतरता नहीं देगी आभास दुःख का,
लेकिन यह संभव नहीं,
जीवन का अनुभव बार-बार यह सिद्ध करता है,
प्रेय नश्वर है, एक झोंका जो आता है और चला जाता है,
दुःख की निरंतरता में प्रेय की उपलब्धि,
देती है एक झलक सुख की,
और छा जाती है फिर वही उदासी।

प्रेय की निरंतरता भी मन की मूर्च्छा का क्षण है -
बेहोशी छाई रहती है, मदमस्त हो जाता है मन,
चेतना नहीं जागृत, सब कुछ हो जाता है तन,
लेकिन हर बार नश्वर सिद्ध होता है यह क्षण,
लेकिन करने लगता है, प्रतीक्षा फिर से यह मन।
बार-बार का अनुभव भी सिखा नहीं पाता है,
मन फिर से उसी, पुराने ढर्रे पर लौट जाता है,
संसार रूपी कक्ष में, चेतना घूमती है मन के वर्तुल में,
अनेक बार मोक्ष रूपी द्वार आता है नजदीक में,
ध्यान, लेकिन संसार की और लगा रह जाता है,
अंतर्यात्रा के लिए चेतना का जागरण नहीं हो पाता है।

बाहरी सम्बन्ध जो नजर आते हैं अनेक,
रचने वाला है सबको, भीतर मन मात्र एक,
अनेकों बंधन, जो मुझे जकड़ते नज़र आते हैं,
सब रचे हैं मेरे मन ने, खुद को भरमाते हैं।
मन को, ऊब होनी चाहिए इस दोहराव से,
दुःख की निरंतरता में, क्षणिक सुख के ठहराव से,
न जाने क्यों, यह भाव ठहर नहीं पाता है,
मन फिर से, इस संसार में रम जाता है।

हो सकता है, अभी जागरण का प्रथम क्षण हो,
तन्द्रा छाई हो, आलस्य का आवरण हो,
अनुभव होने लगा है, अभी परिपक्व न हुआ हो,
समय की धारा में, प्रकट तत्व न हुआ हो।
या फिर हो प्रतीक्षा किसी मांझी की,
जो मँझधार से खींच ले, ऐसे सहारे की,
कहते हैं, एकांत यात्रा है, जरूरत नहीं है साथी की,
तन है रथ, मन है घोड़े, जरुरत तो है रथी की।
जो सुना है कि बैठा है मेरे ही मन में,
उम्मीद है, प्रकट होगा किसी क्षण में,
थाम लेगा वल्गा जो, बनकर सारथि,
कौन करेगा प्रार्थना, कौन होगा प्रार्थी।

मन तो अभी मस्त है, सुख-दुःख के सागर में,
यह ज्ञान तो भरा है, बुद्धि की गागर में,
तन, मन, बुद्धि के पार है आत्मा,
कहते हैं, वो तो है स्वयं परमात्मा,
कर्मजन्य कालिमा से ढका हुआ है वह प्रकाश,
हो सकता है प्रकट वह, इसके लिए जो करे प्रयास।
पूर्व कर्मफल भोग ले और न बांधे वर्तमान के कर्म,
तो भविष्य में संभावना, है यह ज्ञान का मर्म।

कृष्ण कहते हैं, तू कर दे समपर्ण,
करता रह कर्म, और कर दे कर्मफल अर्पण।
ईसा कहते हैं, तू आ मेरी शरण,
मुक्त करता हूँ पापों से, तू कर दे समपर्ण।
बुद्ध कहते हैं, तू आशा मत कर,
होश में रहकर, मुक्ति का उपाय कर।
मुहम्मद का कहना है, एक पर विश्वास कर,
सब कुछ मिल जाएगा, अपना फ़र्ज़ अदा कर।
महावीर कहते हैं, सब कुछ पुरुषार्थ यहाँ,
नहीं कोई ईश्वर, हर व्यक्ति है समर्थ यहाँ,
विवेक से कर तू, यहाँ हर काम,
तू स्वयं ही परमात्मा, नहीं शास्त्र से काम।

सूत्र एक है, अंतर्यात्रा जरूरी है,
नश्वर है जगत, शाश्वत की खोज जरुरी है। 

(Now on 5 May 2017, many of the confusions are clear and still working on my inner journey. Now I have my Gurudev and it's like walking in shadow.)

Thursday, June 23, 2016

'स्वयं करे उद्धार'

उद्धार करे क्या कोई किसी का यहाँ पर,
स्वयं ही आदर न दे, विवेक को जहाँ पर ,
यदि परमात्मा की कृपा से होता उद्धार जीव का,
उद्धरेत आत्मनात्मानम से भ्रमित करें क्यों भला ?

यह जो कह रहे, समझा रहे, 
स्वयं भगवान ही तो प्रगट हुए। 
अपना पता प्रभु कभी, देते नहीं हैं जीव को,
लेकिन शरणागत की रक्षा में, प्रगट कर देते स्वयं को। 
जीव का प्रयास तो मात्र उद्धार की चाह है,
आदर दे स्व विवेक को, मात्र यही राह है,
भगवत्कृपा के लिए प्रभु करते हैं चुनाव,
पानी में उतरो तो पार लगाते हैं नाव ,
अपना मित्र स्वयं बनो, अपने विवेक के आदर से,
अपना शत्रु मत बनो, अपने मन के शासन से। 

मन की गुलामी को हम आजादी समझ लेते हैं ,
परम स्वतन्त्रता आत्म ज्ञान से, यह नहीं समझ पाते है। 
लायक हैं जूते खाने के, मन में तो सब जानते हैं ,
पश्चाताप के जूते मगर, सब, चुपचाप सह जाते हैं। 
दुनिया के सामने, भले बने फिरते हैं,
मौका पाते ही, दूसरे के दोष देखते हैं ,
भगवत्कृपा के साधन सभी, गुरु कृपा से मिल गये हैं,
अवसर सामने है उपस्थित, फिर भी चूक सकते हैं। 

गुरु की आवश्यकता नहीं, यह स्वामी जी की व्याख्या है,
उस मार्ग के राही हम नहीं, यह बात जानने की है,
परमात्मा स्वयं मार्ग दिखलाते हैं ,
उचित स्थान पर स्वतः पहुंचाते हैं। 

अब अपना ध्यान हम क्यों भटकाएं भला,
तद्विद्धि प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया। 
प्रणाम तो प्रदर्शित भी किया जा सकता है,
प्रश्न भी, कहीँ से भी, लाया जा सकता है,
लेकिन प्रश्न स्वयं का हो, अपने मन में हो जन्मा,
शास्त्रीय प्रश्न से शिष्य का, कभी न होता है भला,
गुरु के ज्ञान और स्तर का निर्णय शिष्य कैसे कर सकते है,
सद्गुरु भगवान की कृपा प्राप्त, भगवान जैसे ही होते  हैं। 

जो देख सकते हो आसान बात, कि चाह न हो, इनमें से किसी की,
धन, काम, या प्रसिद्धि, तीनो पर दृष्टि न होती सद्गुरु की,
फिर तो बात आसान है, जब कहीँ मन ठहर जाये,
बात हो अध्यात्म की, स्व विवेक से समझ आये,
जो प्रश्न मन में जन्मे हो, सब उत्तर पा जाये ,
सद्गुरु स्वयं ध्यान में, तुम्हें सब बता जाये। 
लेकिन बात इससे भी बने, यह होगा नहीं,
सेवा के बिना, अहंकार मिटेगा नहीं। 

अहंकार के रूप अनेक, कभी समझ नहीं आते,
जितनी भी पहचान अपनी, हम संसार से पाते। 
साधक परिवार भी, जब करे प्रशंसा,
कभी गुरु भी कर दे अनुशंषा ,
कभी मन में लगे कि प्रगति हो रही है,
संसार से वीतराग होने की बात बैठ रही है,
सुबह जागा यह अहंकार,
और शाम को होता बंटाधार। 

सेवया का अर्थ होता है, सेवा के द्वारा,
सेवा हो कैसे ? निर्णय सेव्य के द्वारा। 
प्रदर्शन सम्मान देने का, विनम्रता का करते यहीं,
मन के विरुद्ध बात सुनने का धैर्य भीतर है नहीं, 
जो बात मन के विरुद्ध हो, लगे यहाँ आना व्यर्थ है,
मन कहे कि 'संसार से पार जाने में जीव स्वयं समर्थ है'। 
और खुद को पता भी नहीं चलता, हो जाता है पतन,
दिन, महीने, साल व्यर्थ, सवारी करने लगता मन। 

कैसे हो रक्षा स्वयं से स्वयं की,
बात तो थी स्वयं से स्वयं के उद्धार की। 
स्व विवेक का आदर तो, सभी को कर लेना चाहिए,
लेकिन, इस कमजोर अहंकार को, सहारा चाहिए। 
यह काले सर्प की भाँति, फुंकारता है रात दिन,
अपने भय के कारण, जहर उगलता है सारे दिन,
इस कालियनाग के, फन हैं हमारी इन्द्रियाँ ,
मन के शासन में करे, रस भोग ये सर्वदा। 
इन्हे मर्दन करते है स्वयं, कृष्ण विवेक के द्वारा,
लेकिन अहंकार भरमाता, बुद्धि को मन के द्वारा। 

यही शास्त्र , यही ज्ञान अपना अर्थ प्रकट करने लगते हैं ,
जब सद्गुरु की सेवा से अहंकार का मर्दन करते है,
गुरु के वचनों को ध्यानपूर्वक सुनना,
यथासम्भव पालन करने का भाव रखना,
यही तो सेवा की शुरुआत है,
गुरु संसार के पार हैं, उन्हें संसार की कहाँ प्यास है। 
सद्गुरु परीक्षण करते रहते हैं शिष्य का,
याद करने मात्र से निरीक्षण कर देते है शिष्य का। 
उनकी प्रेरणा ही विवेक को सबल बनाती है,
झूठे राजा बने, मन को सही राह पर लाती है। 

सब कुछ होने पर भी बाहर भला क्या होता है,
यह वाकया तो सारा भीतर ही घटित होता है,
लेकिन सब कुछ न भी हो, इतना तो निश्चित होता है,
संसार में जीना पहले से आसान होता है। 
तितिक्षा के अभ्यास से अनित्य का प्रभाव कम हो जाता है,
गुरु कृपा से अशुभ प्रारब्ध भी क्षीण हो जाता है। 
सेवा और समर्पण से कभी अहंकार मिटे न मिटे ,
गुरु कृपा से हो भगवत्कृपा, संसार के बंधन मिटे। 

संसार का बंधन यह संसार नहीं है,
यहाँ हो रहां विनिमय व्यापार भी नही है,
बंधन है मात्र, अहंकार के द्वारा, संसार का परिचय,
अहंकार के बिना तो, यह संसार ही है वासुदेवमय। 

प्रणिपात हम कर सके, गुरुदेव कृपा कर दो,
प्रश्न रहे न रहे, सेवा का वर दो,
हमे नही चाह अब किसी और बात की,
कृपा कर दे, हमें शरण मिले आपकी। 

ॐ गुरु शरणम् ,ॐ गुरु शरणम् ,ॐ गुरु शरणम्। 



Thursday, May 5, 2016

ॐ गुरु शरणं (Birthday on 5th May 2016)

सृष्टि से पूर्व क्या प्रलय हुआ था ?
या प्रलय से पूर्व सृष्टि नहीं थी ?
क्या सृष्टि के पश्चात प्रलय नहीं होगा ?
या प्रलय के पश्चात सृष्टि न होगी ?
नित्य निरन्तर परिवर्तन , यही है सृष्टि का क्रम ,
प्रति क्षण होती सृष्टि एवं प्रति क्षण होता प्रलय ,
पूर्व और पश्चात कुछ भी तो नहीं,
वर्तमान के अतिरिक्त और कुछ नहीं। 

चेतना का देह के साथ जब अवतरण हुआ,
रूदन, हास्य, भूख व प्यास का स्मरण हुआ,
चेतना का तादात्म्य देह के साथ होने लगा,
मन के संकल्प के साथ देह में विचलन होने लगा। 
चेतना मन के रूप में सीमित हो गयी,
असीमित का अंश देह के साथ मिश्रित हो गयी। 

विजातीय का मिश्रण कभी हो नहीं पाता ,
चेतना को देह की सीमा में चैन मिल नहीं पाता ,
अपने को देह के साथ सीमित जान लिया,
देह के सुख दुःख को अपना मान लिया। 
निरंतर अपना मूल स्वभाव कचोटता रहा,
असीमित चेतन देह की सीमा में विकल होता रहा। 

असीमित होने लगा भूख, प्यास, हास्य और रूदन,
देह की सीमित आवश्यकता लेकिन जीव कर रहा संग्रहण,
देह के साथ तादात्म्य से माना स्वयं को सीमित,
परमात्मा की सृष्टि में, जीव ने किया अहंकार निर्मित। 

सृजन तो मात्र परमात्मा ही करते हैं ,
स्वयं ही शक्ति से प्रकृति रूप रहते हैं ,
स्वयं ही चेतन, जीव रूप में हुए प्रकट,
माया का यह खेल स्वयं का, स्वयं ही बने हुए है नट। 

जीव निर्मित अहंकार भ्रान्ति के सिवा कुछ नहीं ,
इसी लिए मुक्ति की चाह , भ्रान्ति से मुक्ति की ही । 
जब बंधन स्वयं भ्रान्ति हो तो मुक्ति सत्य कैसे होगी?
भ्रान्ति के मिटने से भी मुक्ति, नहीं, शांति ही होगी। 

सत्य है परमात्मा, सृष्टि और यह परिवर्तन,
सत्य है माया के मध्य नटवर का यह नर्तन,
असत्य है, मात्र अहंकार और तादातम्य,
असत्य है प्यास, कि हो जाये स्थायित्व। 

निरन्तर परिवर्तन रूप है यह सृष्टि,
परिवर्तित हो जाये यदि हमारी दृष्टि,
त्याग दें, यह स्थायित्व की तलाश,
और स्वीकार करें, जो भी है आस पास। 

अपने को सीमित माना , इस भ्रान्ति को जान ले ,
निरन्तर रखें स्मरण, स्वयं को पहचान ले  ,
तो होने लगता है अहसास, कि यह स्व निर्मित अहंकार,
और इससे प्रेरित भोग और संग्रहण का यह व्यापार ,
इसी से है दुःख सुख, जीवन में व्याप्त कमियां ,
है प्रेम की कमी, अपनों के दरमियाँ। 

मूल कारण है हमारा अहंकार,
जो है मात्र भ्रान्ति , निराधार। 

"ऐसा लगता है कि यह कैसी बात है ?
अहंकार से ही तो जाना है यह अस्तित्व मैंने,
इसी से तो जाना है इस संसार ने मुझे,
यही तो हुँ मैं स्वयं ,
इसी से तो मैं जानता हुँ खुद को,
इसी से तो पहचानता हुँ इस संसार को। 
और कुछ क्षण के लिए चलो मान भी लें ,
यह मात्र भ्रान्ति है, ऐसा पहचान भी लें ,
तो फिर क्या है उपयोग इस सृष्टि व्यापार का,
कौन, क्यों, किसलिए ? खेल चलेगा संसार का?"

जो अहंकार हर क्षण अपनी और अपनों की चिंता में व्यस्त था,
सुख दुःख, नाम, धन, काम और यौवन में मदमस्त था,
कैसे बात करने लग गया देखो बड़ी बड़ी,
मानो सृष्टि चलाने की जिम्मेदारी इस पर आन पड़ी। 

अरे मूर्ख, अपने दुःख सुख से तो, परेशान है कितने दिन से,
तलाश रहा था कि, काश ! मुक्ति मिल जाये इस झंझट से,
अपनी देह के परे चिंता की , तूने मात्र देह से जुड़े सम्बन्धों की,
अपने धन, मन-मर्यादा, इच्छा पूर्ति और प्रसिद्धि की। 
अब अपने आप को पहचान, 
सृष्टि के शाश्वत परिवर्तन को जान,
इसमें स्थायी अपनी दृष्टि को पहचान,
अपने तादात्म्य को जान , सत्य को पहचान। 

इस सृष्टि से कहीं दूर नहीं जाना है,
किसी नयी परिस्थिति की तलाश में नहीं भटकना है,
अपने कर्त्तव्य से कहीं दूर नहीं होना है,
कर्त्तव्य को जानना और बेहतर पूरा करना है। 

कर्त्तव्य है सदैव वर्त्तमान में,
न भूत काल, न भविष्य में,
क्षमता जितनी, उतना है कर्त्तव्य,
क्षमता के परे, नहीं कोई दायित्व,
कर्त्तव्य तय होता है व्यक्तिगत परिस्थिति से,
उस व्यक्ति की स्वयं की मनःस्थिति से। 
ऐसे कर्त्तव्य को जो सत्यता से पूर्ण करे,
उसकी अहंकार की भ्रान्ति स्वतः ही मिटे। 

"यदि इतना ही आसान है, तो भ्रान्ति मिटती क्यों नहीं है ?
दुःख सुख से मुक्ति हमें मिलती क्यों नहीं है ?
क्यों तलाश कर रहें है हम निरन्तर आगे बढ़ने की ,
यदि शांति मिलने के लिए जरूरत है मात्र ठहरने की ?"

थक गए हो तुम , इसलिए चाहते हो ठहराव,
मरहम ढूंढ रहे हो, संसार से मिले है इतने घाव,
यह अनुकूल में स्थायित्व की तलाश,
प्रतिकूल के परिवर्तन की जगाती है प्यास,
अनुकूल या प्रतिकूल, दोनों का परिवर्तन निश्चित है,
लेकिन, तुम्हारी भूमिका अनिश्चित है,
तुम्हारा कर्त्तव्य का पालन तुम्हे शान्ति के पास लाता है शनेः शनेः,
अहंकार का शमन, दुःख - सुख का नाश होता है शनेः शनेः। 

तुम्हारे परिवर्तन तुम्हारे भीतर होते हैं ,
दृष्टि के परिवर्तन से दृश्य तुम्हारे लिए बदलते हैं ,
तुम मुक्त होने लगते हो तनाव से,
मुक्त होते हो बंधन के भाव से,
यही संसार तुम्हें घाव नहीं, पुरस्कार देने लगता है,
मन शिकायत की जगह कृतज्ञता से भरने लगता है। 
दुःख पूर्ण सृष्टि तुम्हारे लिए शान्त होने लगती है,
दूसरे के दुःख के लिए, करुणा जगने लगती है। 
कर्त्तव्य के प्रति समपर्ण बढ़ने लगता है,
संसार चक्र तुम्हारे लिए सुखपूर्वक चलता है। 
प्रतिकूल घटना होती है, दुःख घट जाता है,
सकारात्मकता बनी रहती है, शीघ्र मन शान्त हो जाता है। 

"ऐसा हो जाये, कौन नहीं चाहता है,
यह चमत्कार जीवन में कैसे घट पाता है ?"

परमात्मा की कृपा से मिल जाये सद्गुरु,
वे कृपा कर अपना ले, तब होता है नवजीवन शुरू,
निरन्तर प्रार्थना यही है गुरुदेव से,
आप हैं समर्थ, हम मगन अपनी नींद में,
निरन्तर स्वप्न के दुःख से, दुःखी - सुखी हो रहे हैं ,
आप दया कर जगा दो, यह प्रार्थना कर रहे हैं। 
ले लो हमें शरण में, हमें समर्पण भी नहीं आता। 
जन्म जन्मांतर से, अहंकार का अभ्यास, झुक भी नहीं पाता।
आप कृपा कर अपनी दृष्टि से,
मुक्त कर दो हमें स्व निर्मित अहंकार की सृष्टि से। 
आप से कर सकें प्रार्थना निरन्तर, बस इतनी कृपा कर दो,
सदैव आश्रय ले मात्र आपका, बस इतनी दया कर दो,
मन करे मात्र यही स्मरण,
ॐ गुरु शरणं , ॐ गुरु शरणं , ॐ गुरु शरणं। 

Saturday, August 22, 2015

व्यर्थ है मुक्ति की तलाश !

मुक्ति कौन चाहता है इस संसार से,
व्यक्ति चाहता है मात्र अपने दुःख से मुक्ति। 

जीवन चलता रहता है सुख दुःख की श्रृंखला में,
कभी ऐसा पीड़ा का अनुभव होता है कि सुख व्यर्थ दीखने लगते है,
उत्पन्न हो जाता है प्रश्न,
कि क्या यह सारा सुख स्वप्न मात्र था ?
और शुरू हो जाती है 
पीड़ा अथवा दुःख से मुक्ति की तलाश। 

जीवन शांत मंथर गति से गुजर सकता है,
लेकिन दूसरे को देख कर जागने लगता है,
ईर्ष्या अथवा प्रतिस्पर्था का भाव,
अनुकरण करने या अनुयायी बनाने की इच्छा,
महत्वाकांक्षा बढ़ती जाती है और 
जो प्राप्त है वह अपर्याप्त होता जाता है,,
बाहर समृद्धि और भीतर खालीपन बढ़ने लगता है,
और शुरू हो जाती है किसी दिन -
महत्वाकांक्षा या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

पूर्व जन्म के किसी संस्कार के कारण 
सांसारिक सुख व्यर्थ दीखने लगते है,
और मन साधना करना चाहता है,
लेकिन संसार आ बैठता है विचार के माध्यम से,
बस जाता है मन के भीतर ,
दुखी होने लग जाता है साधक अपने ही मन से,
और शुरू हो जाती है,
विचार या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

सब पा लेता है व्यक्ति जो चाहा था,
स्वास्थ्य, साधन, सम्पत्ति, परिवार। 
प्रारब्ध के अनुसार जीवन सुख से भर जाता है,
लेकिन सताने लगता है प्राप्त के खोने का भय,
अपनी मृत्यु तथा अपनों की मृत्यु का भय,
भविष्य में हो सकने वाले दुःख का भय,
और शुरू हो जाती है,
भय या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

सांसारिक सम्बन्धो में खोजता रहता है व्यक्ति प्रेम,
हर बार संदेह उठता है मन में,
अपने प्रेमास्पद पर अथवा उसकी अनुपस्थिति पर,
कभी प्रेम का पात्र बदल जाता है,
कभी परिस्थिति बदल जाती है,
जीवन आगे बढ़ जाता है,
प्रेम प्रतीक्षा करता रह जाता है,
उदय होता है कहीं मन के किसी कोने में 
हताशा या निराशा का भाव,
और शुरू हो जाती है,
निराशा या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

व्यक्ति जागरूक होकर कर्त्तव्य का पालन करना चाहता है,
प्रारब्ध के वश मिली हुई परिस्थिति में,
स्वयं, परिवार, कुटुंब या राष्ट्र के प्रति 
कर्त्तव्य पूरा नहीं कर पाता है,
ऐसा स्वयं के प्रति दोष मन में जाग उठता है,
मन में असमर्थता का दुःख जागने लगता है,
और शुरू हो जाती है,
दोष या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

स्वयं को मिला हुआ साधन सुख,
या पूर्व जन्मो के संस्कार,
या प्रारब्ध अथवा पुरुषार्थ से मिला संग साथ,
व्यसन या अवगुणो को जन्म देता है,
परिणाम होता है शारीरिक अथवा मानसिक पीड़ा,
और शुरू हो जाती है,
व्यसन या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

सब पाकर या अत्यल्प भी पाकर,
व्यक्ति को होता है अपने शरीर, परिवार एवं साधन का अहंकार,
बढ़ता जाता है कीर्ति या सम्मान का भाव,
अत्यंत नाजुक अहंकार चोटिल हो उठता है,
अकारण या अनेकानेक कारणों से,
ला देता है मन में दुःख का सैलाब,
और शुरू हो जाती है,
अहंकार या दुःख से मुक्ति की तलाश। 

यह तलाश ले आती है,
गुरु या परमात्मा की शरण में,
लेकिन मुक्ति की तलाश तो पूरी हो जाती है समता में,
समत्वं योग उच्यते। 

अरे, तो फिर व्यर्थ क्यों है मुक्ति की तलाश?
क्योंकि यह शुष्क धरातल है,
मुक्ति से कुछ मिलता नहीं,
वरन मन से संसार चला जाता है,
और जो था, है, वही रह जाता है। 

आनंद है प्रेम में,
भक्ति में, शरणागति में,
क्या फर्क पड़ता है 
यदि कुछ जन्म और हो जाये ?
यह परमात्मा का ही रचा हुआ संसार,
जहाँ उनके अतिरिक्त कोई और तत्त्व है ही नहीं,
उस संसार से मुक्ति की चिंता क्यों की जाए ?

परमात्मा प्रकट होते है गुरु के रूप में,
प्रदान करने को अपनी करुणा,
पूर्ण करने को जीव की शाश्वत प्यास । 
जीव की वास्तविक तलाश है प्रेम की, अनंत काल से,
प्रेम के लिए किये है अनेक जतन, जन्म जन्मान्तर से,
परमात्मा करते हैं जीव पर कृपा किसी जन्म में,
प्रकट हो जाते है वे अनंत अगोचर, दृश्य रूप में ।
जब प्रेम प्रकट हो जाये गुरु के रूप में,
परमात्मा स्वयं कृपा कर दे और आनंद बरसाये ,
व्यर्थ है मुक्ति की तलाश,
जीवन आपके श्री चरणों में कट जाये,
आप की कृपा बरसती रहे,
अमृतवाणी सुनने को मिलती रहे,
इतना ही पर्याप्त है,
दुःख सहने का तो जन्मो का अभ्यास है। 

दुःख से मुक्ति की अब चाह नहीं,
आपका साथ मिला है कृपा से,
मुक्ति का अब कोई लाभ नहीं। 

प्रणाम,
जय जय जय गुरुदेव।

Tuesday, May 5, 2015

तैयारी (Birthday on 5th May 2015) Gurudev's preachings

जीवन और मृत्यु का फासला घटता जा रहा है निरंतर,
यही तो प्रत्येक जन्मदिन स्मरण करवाता है
लेकिन मन तो इसे  भी भूल जाता है,
और तैयारी में जुटा रहता है, उम्र भर। 
आगे और जीने की तैयारी,
अपने बच्चों के और बढ़ने की तैयारी,
अपने बड़ो के मरने की तैयारी,
स्वयं के सुख भोग की तैयारी,
ऐसे ही कभी बज जाती है घण्टी ,
और  होने लगती है चलने की तैयारी। 

कितने संदेशे भेजते हैं भगवान ,
कैसे कर पाये स्मरण यह इंसान,
दाँतो का हिलना, बालों का सफ़ेद होना,
असमय बीमार होना, अधिक न  खा पाना ,
भोजन न पचना, शक्ति का क्षय होना,
भगवान से ज्यादा डॉक्टर को याद करना,
लेकिन मन तो अटका रहता है,
बस कुछ दिन में तबीयत ठीक होने की,
इंतज़ार करता रहता है,
आशा पर टिका है जीवन,
सुख भोग की आशा करता रहता है। 

मन तो निरंतर जवान बना रहता है,
इसकी आशा, तृष्णा में कोई अंतर नहीं आता है। 
यह बार-बार घूमता रहता है, उसी चक्र में,
न थकता है, न पकता है, 
न मरता है और न ही मरने देता है। 

इसका यह स्वभाव चाहता है कि गति हो वर्तुल में,
चक्र की तरह घूमते हुऐ भी,
हर बार बड़ा करले अपनी परिधि को,
न पुनः आना पड़े, वहीँ पर लौट कर,
बढ़ता रहे  वृत्त अगली कक्षा की और। 

 Image result for spiral

ऐसा परिवर्तन संभव है - 
जब जीवन के उत्थान का मार्ग जान लिया जाये,
इस खुले रहस्य की कुंजी मन को मिल जाये,
कि निरंतर अपनी स्थिति में होता रहता है परिवर्तन,
स्थिरता कभी होती नहीं, शाश्वत है परिवर्तन। 

ताकि मन का ध्यान शाश्वत की और चला जाये,
शाश्वत का स्मरण यदि बना रहे,
मन की गति स्वतः ही अगली कक्षा में जाये,
इस तरह मन  का वर्तुल बड़ा होता जाये,
और जीवन अपने लिए नित नये अर्थ खोजता जाये। 

जीवन के अर्थ की तलाश पूरी होगी तभी,
जब यह पा लेगा, शाश्वत को,
जो परिवर्तन से परे है, उस सत्य को,
जो आधार है इस अस्तित्व का,
जिसको पाना ही है लक्ष्य मानव जीवन का। 

इन्द्रिय सुख की पूर्ति मन चाहता है निरंतर,
इसी में कहीं छिपी है, सत्य की प्यास उम्र भर,
कहीं, कभी, किसी दिन  लगता है,
आखिर कब तक घूमता रहूँ मैं इस तरह,
कुछ तो आगे बढ़ूँ जीवन में किसी तरह,
यही सार्थक की तलाश जोड़ देती है,
किसी ऐसे स्रोत से,
जिसे हो गयी है सत्य की उपलब्धि,
जो प्रसन्न है सदैव,
क्योंकि पा लिया है शाश्वत को,
नहीं है शेष कुछ करने को,
नहीं है शेष कुछ पाने को,
और नहीं है शेष कुछ जानने को। 

यदि सौभाग्य से मिलना हो जाये,
गुरु भाव मन में जग जाये,
तो शेष जिम्मा लेते हैं स्वयं गुरुदेव,
करते है निरंतर चोट,
ताकि प्रकट हो सके परमात्मा,
हो जाये भगवत्कृपा ,
मिल जाये दुःखो से छुटकारा ,
प्रसन्नता हो जाये सदा के लिए। 

क्या इसका अर्थ संसार से मुक्ति है ?
क्या इसका अर्थ सन्यास या कर्म से मुक्ति है ?
नहीं, इसका अर्थ सम्यक् ज्ञान है,
सम्यक् कर्म, सम्यक् स्वभाव है। 
सभी कर्म होते रहे लेकिन भाव बदल जाये,
अहंकार के स्थान पर कृतज्ञता आ जाये,
व्यसन छूटे और दुःख मिट जाये,
जीवन का हर कर्म यज्ञ बन जाये। 

करना क्या होगा,
जागरण अपने मन के प्रति,
होश रहे हर कार्य के प्रति,
विवेक करे निर्धारण जीवन पथ का,
न रहे स्वयं पर नियंत्रण मन का। 

ऐसी गुलामी है मन की कि स्वयं भी नहीं जानते हैं। 
अपनी गुलामी को ही आज़ादी मानते हैं। 
अपने मन की करने को मनमानी समझते हैं ,
अहंकार के कारण क्षणिक प्रसन्न हो जाते हैं। 
कर्त्तव्य पालन का सुख जब मिलता है,
दुःख से छुटकारा तभी मिलता है। 
तब  तक तो हर कामना का परिणाम लोभ या क्रोध,
नियंत्रण नहीं हो पाता, जागने लगता है बोध। 
 उपाय है मात्र शरण, परमात्मा या गुरु चरणो की,
शरण हेतु युक्ति है एक मात्र प्रार्थना की। 
अपनी ओर से सब करने का प्रयास,
और बनी रहे कृपा की आस,
एक दिन निश्चित ही काम बन जायेगा,
भव बन्धन से छुटकारा मिल जायेगा। 


Saturday, March 21, 2015

द्वारका कथा यात्रा सम्पन्न (23 दिस० से 29 दिस० )

सफल आयोजन

श्री द्वारकाधीश मंदिर 



                                 



                                   श्री पंडित विजयशंकर मेहता द्वारा श्री मद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ





                                   श्री पंडित सतीश शास्त्री द्वारा नानी बाई का मायरा (सायं सत्र)



Wednesday, November 5, 2014

द्वारका कथा यात्रा 2014

भगवान कृष्ण की पवित्र नगरी द्वारका में श्री मदभागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन 23 दिसंबर से 29 दिसंबर 2014 तक है। 21 दिसंबर को सायंकाल जयपुर से रवाना होकर 22 दिसंबर सायंकाल पहुंचेगे। 29 दिसंबर सायंकाल वापसी है जिससे 30 दिसंबर सायंकाल जयपुर पहुंचेगे। 

श्री विजयशंकर मेहता प्रतिदिन प्रातः 10 बजे से अपराह्न 1 बजे तक सुधी श्रोतागणों को कथामृत का पान कराएँगे।  300 से अधिक परिवार जन एवं मित्र सम्मिलित होंगे। 

सभी का स्वागत है।

निवेदक

भिवाल परिवार
लालसोट-जयपुर


        





                            

            Pt. Vijayshankar Mehta