Monday, May 6, 2013

स्मरण (Birthday on 5th May 2013) - Preachings from Gurudev

ॐ श्री परमात्मने नमः

तियालीस वर्ष हो रहे है पूर्ण,
जीवन भी कभी होगा पूर्ण ,
लेकिन जीवन की पूर्णता क्या मृत्यु में है ?
यदि जीवन में पूर्णता के बिना मृत्यु हुई -
तो जीवन रहेगा निरंतर -
जन्म होगा निश्चित ही, योनि चाहे कोई भी हो !
जन्म मृत्यु के निरंतर चक्र से,
मुक्ति मिल सकती है यदि,
जीवन में पूर्णता आ जाये मृत्यु से पहले,
स्थूल शरीर की मृत्यु से पूर्व,
सुक्ष्म शरीर की मृत्यु हो जाये,
यदि व्यक्ति स्वयं की खोज में सफल हो जाये,
आत्म ज्ञान पा ले, भगवत प्राप्ति हो जाये।
मुक्त हो सकता है मनुष्य ,
करके जीवन मृत्यु को पार,
पाकर वास्तविक स्वरुप अपना,
आनंद रहे निरंतर अपार ।

आनंद और भगवान पर्याय है।
सत्चित्तानंद प्रभु के सत स्वरुप का,
अनुभव करता है हर मनुष्य, हर क्षण, स्वयं के होने में,
चित अर्थात ज्ञान है उसे स्वयं के होने का,
बस खोया रहता है आनंद,
क्योंकि वह आनंद को चाहता है कि मुठ्ठी में बंद कर ले,
कैद कर ले अपनी गिरफ्त में,
स्वयं को आनंद मिले, इस पर नियंत्रण कर ले,
दुसरे को आनंद मिले, इस पर भी नियंत्रण कर ले।
लेकिन कौन पकड़ पाया है भला आनंद को,
जरा सा किसी का कुछ कह देना,
अपने बारे में जरा सा बुरा सुन लेना,
मन के विपरीत जरा सा कुछ घट जाना,
अपने आनंद के क्षण से ध्यान हट जाना।
ले जाता है व्यक्ति को भूत और भविष्य में,
भूत काल की अनेक यादे घेर लेती है उसे,
अतीत की अनेक घटनाये छा  जाती है मानस पटल पर,
और मोह का आवरण छाने लगता है बुद्धि पर,
या फिर भविष्य की आशंकाये डेरा जमाने लगती है,
बुद्धि उनको द्विगुणित और शतगुणित करती है,
मन लालायित हो उठता है नियंत्रण लेने को,
इतने में खो देता है मानव आनंद के क्षण को ।

आनंद है वर्तमान।
वर्तमान भी है भगवान का पर्याय,
यह भी पकड़ में नहीं आता इंसान के,
हर क्षण रहता है वर्तमान में, लेकिन
खोया रहता है भूत-भविष्य मे।
भूत-भविष्य में है, भय, आशंका और दुःख,
उन पर आरोपण करता है - मानव-मन कल्पित सुख,
यह कल्पना कभी साकार नहीं होती है,
वर्तमान के आनंद को पाने नहीं देती है।
कोई दुःख - सुख नहीं वर्तमान में,
वर्तमान में आनंद के अतिरिक्त कुछ नहीं,
आनंद है भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं।

शब्द कोई भी हो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है,
ब्रह्माण्ड असीम चेतना की तरंगों को प्रकट करता है,
जहाँ देखो वही कुछ दिखाई पड़ जाता है,
मन के भीतर भी पूरा संसार बस जाता है।\
अपने इसी संसार को लेकर घूम रहा है यह मन,
बाहर निरंतर करता रहता है, अपना प्रक्षेपण,
इसीलिए प्रारब्ध इसी मन में समाया रहता है,
समय के साथ प्रकट हो, सामने आया रहता है।

प्रारब्ध के कारन परिस्थिति, परिस्थिति में अपना कर्त्तव्य,
यदि कर पाये मनुष्य उसे, वही बन जाता है यज्ञ,
प्रकृति में सभी कोई, करते रहते है यज्ञ यहाँ,
नदी कहाँ जल पीती है, वृक्ष खाते है फल कहाँ,
गाय अपना दूध, स्वयं कहाँ पाती है,
देवी अपनी बलि, स्वयं कहाँ पाती है ?
मै और मेरे का विभ्रम, मनुष्य को भटका देता है,
माया मोह का बंधन, संसार में अटका देता है।

अनेक अवगुणों का मूल है कर्त्तव्य में प्रमाद,
मौत और ईश्वर की, सदा रहती नहीं याद।
ईश्वर ने कृपा कर यहाँ मृत्यु को बनाया है,
इसके बिना कब व्यक्ति को, अपना धर्म याद आया है?
यदि वह हो सकता अमर, अजर इस धरा पर,
हर व्यक्ति मात कर देता, रावण और कंस को यहाँ पर।

जैसे माँ बालक का नित्य पालन पोषण करती है,
ईश्वरीय ऊर्जा विश्व का भरण पोषण करती है।
प्रारब्ध से प्राप्त परिस्थिति में जो कर्त्तव्य पूरा करते है,
ईश्वरीय कृपा से भगवत प्राप्ति के पात्र बनते है,
अनुकूल परिस्थिति है उनकी दया, जिसमे करनी है सेवा,
प्रतिकूल यदि परिस्थिति लगे, करो स्मरण, पाओ मेवा।

ॐ शांति, शांति, शांति।

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