प्राण प्रतिष्ठा – विराजित हुए रामलला (22 जनवरी 2024) | राम को प्रणाम
कविता: एम. एल. गुप्ता कुछ लोग पूछते हैं कि - मन्दिर से पहले मस्जिद थी मस्जिद से पहले मन्दिर था उस मन्दिर से पहले क्या था एक खेत था या जंगल ! अल्लाह राम के नाम से पहले जँगल में सब मंगल था ! जंगल से भी पहले क्या था साँ साँ करता कहकशाँ था ना कोई हिन्दू ना मुसलमाँ था ! वो कहकशाँ अब दैरो हरम हुआ कहकशाँ के लिए कौन लड़ेगा ! सुनो मेरे भाई कि - जब मुझे लड़ना है आज, कल की कोई बात नहीं है, मंदिर हो या हो मस्जिद, लड़ने की औक़ात अभी है। जब कुचला था तुमने मुझे, उसका नामोनिशान नहीं है, मुझे भी कोई गिला नहीं, मेरा अब ईमान यही है। लेकिन यदि तुमने मुझे चिढ़ाने को, सदियों तक औक़ात याद दिलाने को, बनाई थी मस्जिद तुमने, राम जन्मभूमि पर, किया था अन्याय, हर भारतवासी पर, कराते हो यदि तुम, हर दिन मुझे यह अहसास, देख तेरे ईश्वर करते ग़ुलामी, अल्लाह के पास। तो फिर मुझे लड़ना होगा, हर उस निशान के लिए, जो मुझे हर दिन चिढ़ाएगा और ज़ुल्म की याद दिलाएगा ! अब अगला सवाल तुम पूछोगे कि, अब तक क्यों चुप था मैं, मेरा जवाब ही मेरी हक़ीक़त है, चुप नहीं, बेबस था मैं। मेरी क़ौम जब एक साथ लड़ पाए, हर ग़ुलामी का निशान मिट जाए! क्य...