हनुमान और राम की अँगूठी – लीला संवरण का रहस्य | राम को प्रणाम
कविता: एम. एल. गुप्ता
आते हैं मेरे राम धरा पर, करने को कल्याण।
भक्त तो तर जाते भक्ति से, दुष्ट को तारे बाण।।
लेकिन भक्त यहाँ हनुमंत जैसा, युक्ति सोच रहे हैं राम,
अपनी लीला पूरी हो गई, अब जाना होगा वैकुण्ठ धाम।
पहरा है हनुमान का यहाँ पर, काल देव कर रहे विचार,
अयोध्या में घुसना असंभव, कैसे पहुँचे मेरी पुकार?
राम तो सदा हैं अंतर्यामी, जान लिया यमराज का संकट,
बोले मैं करता हूँ उपाय, हनुमान को दूँगा कार्य विकट।
सुबह आये जब राज सभा में, अंगुली से अँगूठी गिरा दी,
महल के फर्श में दिख रही दरार, अँगूठी उसमें समा गई।
राम ने देखा हनुमान की ओर, सेवक ने संकेत ग्रहण किया,
लघु रूप धर घुस गए भीतर, दरार के भीतर सुरंग मिला।
बढ़ते गए हनुमान निरंतर, पवनपुत्र पहुँच गए पाताल में,
नागलोक में वासुकि का राज्य, स्वयं आये सत्कार में।
हनुमान बोले, शीघ्रता में हूँ, स्वामी के कार्य से आया हूँ,
मुद्रिका गिरी है राम की, मैं उसे ढूँढने यहाँ आया हूँ।
वासुकि ने कहा, हे पवनपुत्र, आपका कार्य यहाँ सिद्ध होगा,
अँगूठी मिलेगी निश्चित यहाँ, लेकिन आपको चुनना होगा।
ले गए नागराजा हनुमान को, अँगूठियों का ढेर था,
मैं एक ढूँढने आया था, क्या यह नज़र का फेर था?
उठा-उठा कर देखने लगे, हर अँगूठी एक जैसी थी,
सब पर प्रभु श्रीराम का नाम, जैसी थी बिलकुल वैसी थी।
हनुमान कहे मैं माया से परे, मेरी दृष्टि निर्मल ऐसी,
निश्चित ये सभी अँगूठी हैं, प्रभु श्री राम की अँगूठी जैसी।
क्या है रहस्य, उलझन बढ़ी, माथे पर सलवट उभरी जरा,
वासुकि आये, मुस्कराये, प्रभु राम ने यह खेल रचा।
राम आये अनगिनत बार धरा पर, हर बार यही हुआ,
लीला संवरण करने के लिए, यह खेल कई बार रचा।
आपको अवध से हटाना था, आप उन्हें जाने नहीं देते,
अवतार भी मनुष्य देह में, विधि नियम का पालन करते।
ये अँगूठियाँ यहाँ राम की, हर अवतार की निशानी हैं,
इन्हें गिनना है असंभव, प्रभु राम की यही कहानी है।
हनुमान समझ गए लीला को, अब अवध में नहीं हैं राम,
चिरंजीवी रहकर धरा पर, अब भजो बस राम का नाम।
मानव का जीवन है ऐसा, क्यों समझ नहीं आता है,
जाना यहाँ निश्चित है, लेकिन यह दुःख क्यों पाता है?
इस सत्य को स्वीकार नहीं, करना हम चाहते हैं,
चार दिन की ज़िंदगी को, स्थायी मानना चाहते हैं।
हर दिन जियो इस तरह कि, मौत आये तो ग़म ना हो,
मन में पछतावा हो नहीं, मस्ती जीवन की कम ना हो।
क्या आज, क्या कल, रहता परसों का भी इंतज़ाम है,
लेकिन बेटे-पोते से भी आगे, सोचता यह इंसान है।
जिसका भला वो करने का, भ्रम मन में पालता है,
उसी से उसे जो मिलता है, सब समझ आ जाता है।
भजन बना है भज् धातु से, जिसका अर्थ है सेवा,
भजन करो और सेवा करो, निश्चित पाओगे मेवा।
जीवन का मेवा है यही, मन में मस्ती और मुख में नाम,
झुककर रहो प्रभु के आगे, करते रहो राम को प्रणाम।
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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