मैं शरीर नहीं – प्रारब्ध, पुरुषार्थ और कर्तव्य | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

राम को प्रणाम करके, करना है सब काम,
ध्यान काम पर देना है, स्मरण राम का नाम।
राम चाहे क्या तुमसे, वे तो हैं पूर्ण परमात्मा,
तुम भी क्या चाहो राम से, तुम भी तो हो आत्मा।
जीव है परमात्मा का अंश, रहता है सदैव अभेद,
जब तादात्म्य कर ले देह से, जीवात्मा समझे भेद।

सूक्ष्म शरीर है अहंकार, मन, बुद्धि और चित्त,
इन्द्रियों का प्रकाशक मन, कथा है यह विचित्र।
आत्मा प्रकाशक है मन का, सूक्ष्म शरीर जो कहलाता,
मृत्यु के समय स्थूल रहता यहीं, सूक्ष्म अलग हो जाता।
आत्मा कहो या परमात्मा, होता कहीं अभाव नहीं,
यह सत है, सदा रहता, सम्पूर्ण रूप से हर कहीं।

सूक्ष्म शरीर के साथ रहते हैं, जीव के संचित कर्म,
संचित कर्म में से ही बनता प्रारब्ध, ज्ञानी जाने मर्म।
प्रारब्ध के अनुसार प्रारम्भ होती, अब शरीर की तलाश,
वर्तमान जीवन का प्रारम्भ होता, प्रारब्ध के अनुसार।
कर्ता का कर्म पुरुषार्थ रूप, कहलाता क्रियमाण,
क्रियमाण व प्रारब्ध से आता, मिला-जुला परिणाम।

प्रारब्ध सदा परिस्थिति के रूप में, सामने आता है,
कर्म के लिए स्वतंत्र मानव, पुरुषार्थ अपना करता है।
आशा करता परिणाम की, दुःख का होता निर्माण,
एक दिन होता इतना दुःखी, कि चाहने लगे निर्वाण।
निर्वाण होता मृत्यु के पश्चात, यह सबसे बड़ी भ्रांति,
यह भ्रांति जब दूर हो जाती, जीवन में होती क्रांति।

प्रारब्ध से मिला शरीर, शरीर ही मान लिया स्वयं को,
भोग और संग्रह में लगकर, अहंकार समझा खुद को।
जब भाव जगे या ज्ञान मिले, कि मैं शरीर नहीं हूँ,
सूक्ष्म शरीर ही समझे इसको, स्थूल शरीर नहीं हूँ।
स्वयं की अभिव्यक्ति शरीर के माध्यम से ही होती,
इसीलिए मैं शरीर नहीं, यह समझने में मुश्किल होती।

अपने होने और होनेपन का ज्ञान, ही सत और चित्त है,
इसकी स्वीकृति आनंद है, यही और यहीं सच्चिदानंद है।
परिणाम पर दृष्टि रखकर, हम वासना प्रेरित रहते हैं,
आशानुरूप परिणाम नहीं होता, दुःखित हो जाते हैं।
कर्तव्य की दृष्टि से, संपूर्ण प्रकृति संचालित है,
परमात्मा का सृष्टि क्रम, इसी से परिचालित है।

कर्तव्य सदा वर्तमान में, और अपनी सामर्थ्य में,
मेरा क्या कर्तव्य, निर्धारित होता मेरे ही मन में।
अपना अपना कर्तव्य, पूर्ण सभी को करना है,
जीवन जीने का ढंग यही, एक दिन तो मरना है।
संसार मेरा है, सब मेरे अपने हैं, सेवा करने के लिए,
भगवान ही मेरे हैं, मेरे सदा साथ हैं, जीने के लिए।

वासना से ही बना यह शरीर है, इसका यही स्वभाव है,
शरीर मुझे मिला है, मैं शरीर नहीं, ज्ञान का प्रभाव है।
सदैव प्रसन्नता, कर्तव्य कर्म करना, यह मूल स्वभाव है,
इस स्वभाव में स्थित होना, यही अध्यात्म का भाव है।
इसके लिए मार्ग अनेक, सभी का हो एक ही परिणाम,
राम की शरण हो कर्तव्य करें, और करें राम को प्रणाम।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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