Tuesday, May 28, 2013

पुणे से रामेश्वरम यात्रा










29 May 2013
 from Jaipur to Pune by flight

2 June 2013




 Start roadjourney from Pune to Rameshwaram



332 kms Bijapur - Gol gumbad




123 kms Pattadkal - UNESCO World Heritage Site





134 kms Hampi - UNESCO World Heritage Site


4 June 2013

344 kms Shravanbelgola - Bahubali



  83 kms Mysore - Historical Palace & fountains


6 June 2013


387 kms Madurai - Meenakshi Temple


granite pillars supporting the corridor in the precinct of Ramanathaswamy Temple.

170 kms Rameshwaram

8 June 2013



237 kms Tanjavur - UNESCO World Heritage Site

9 June 2013

 91 kms Kumbhkonam - Temples


 79 kms Chidambaram - Temple





69 kms Puducherry

11 June 2013
160 kms Vellore





124 kms Tirupati

12 June 2013



162 kms Chennai





54 kms Mahabalipuram








पुरी कथा यात्रा 2013

इस वर्ष 2013 का प्रारंभ सपरिवार कुटुंब व मित्रो के साथ पुरुषोत्तम वाटिका, पुरी में भागवत कथा के आयोजन के साथ हुआ । सभी ने इस कार्यक्रम का भरपूर आनंद लिया |


Sunday, May 5, 2013

स्मरण (Birthday on 5th May 2013) - Preachings from Gurudev

ॐ श्री परमात्मने नमः

तियालीस वर्ष हो रहे है पूर्ण,
जीवन भी कभी होगा पूर्ण ,
लेकिन जीवन की पूर्णता क्या मृत्यु में है ?
यदि जीवन में पूर्णता के बिना मृत्यु हुई -
तो जीवन रहेगा निरंतर -
जन्म होगा निश्चित ही, योनि चाहे कोई भी हो !
जन्म मृत्यु के निरंतर चक्र से,
मुक्ति मिल सकती है यदि,
जीवन में पूर्णता आ जाये मृत्यु से पहले,
स्थूल शरीर की मृत्यु से पूर्व,
सुक्ष्म शरीर की मृत्यु हो जाये,
यदि व्यक्ति स्वयं की खोज में सफल हो जाये,
आत्म ज्ञान पा ले, भगवत प्राप्ति हो जाये।
मुक्त हो सकता है मनुष्य ,
करके जीवन मृत्यु को पार,
पाकर वास्तविक स्वरुप अपना,
आनंद रहे निरंतर अपार ।

आनंद और भगवान पर्याय है।
सत्चित्तानंद प्रभु के सत स्वरुप का,
अनुभव करता है हर मनुष्य, हर क्षण, स्वयं के होने में,
चित अर्थात ज्ञान है उसे स्वयं के होने का,
बस खोया रहता है आनंद,
क्योंकि वह आनंद को चाहता है कि मुठ्ठी में बंद कर ले,
कैद कर ले अपनी गिरफ्त में,
स्वयं को आनंद मिले, इस पर नियंत्रण कर ले,
दुसरे को आनंद मिले, इस पर भी नियंत्रण कर ले।
लेकिन कौन पकड़ पाया है भला आनंद को,
जरा सा किसी का कुछ कह देना,
अपने बारे में जरा सा बुरा सुन लेना,
मन के विपरीत जरा सा कुछ घट जाना,
अपने आनंद के क्षण से ध्यान हट जाना।
ले जाता है व्यक्ति को भूत और भविष्य में,
भूत काल की अनेक यादे घेर लेती है उसे,
अतीत की अनेक घटनाये छा  जाती है मानस पटल पर,
और मोह का आवरण छाने लगता है बुद्धि पर,
या फिर भविष्य की आशंकाये डेरा जमाने लगती है,
बुद्धि उनको द्विगुणित और शतगुणित करती है,
मन लालायित हो उठता है नियंत्रण लेने को,
इतने में खो देता है मानव आनंद के क्षण को ।

आनंद है वर्तमान।
वर्तमान भी है भगवान का पर्याय,
यह भी पकड़ में नहीं आता इंसान के,
हर क्षण रहता है वर्तमान में, लेकिन
खोया रहता है भूत-भविष्य मे।
भूत-भविष्य में है, भय, आशंका और दुःख,
उन पर आरोपण करता है - मानव-मन कल्पित सुख,
यह कल्पना कभी साकार नहीं होती है,
वर्तमान के आनंद को पाने नहीं देती है।
कोई दुःख - सुख नहीं वर्तमान में,
वर्तमान में आनंद के अतिरिक्त कुछ नहीं,
आनंद है भगवान के अतिरिक्त कुछ नहीं।

शब्द कोई भी हो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है,
ब्रह्माण्ड असीम चेतना की तरंगों को प्रकट करता है,
जहाँ देखो वही कुछ दिखाई पड़ जाता है,
मन के भीतर भी पूरा संसार बस जाता है।\
अपने इसी संसार को लेकर घूम रहा है यह मन,
बाहर निरंतर करता रहता है, अपना प्रक्षेपण,
इसीलिए प्रारब्ध इसी मन में समाया रहता है,
समय के साथ प्रकट हो, सामने आया रहता है।

प्रारब्ध के कारन परिस्थिति, परिस्थिति में अपना कर्त्तव्य,
यदि कर पाये मनुष्य उसे, वही बन जाता है यज्ञ,
प्रकृति में सभी कोई, करते रहते है यज्ञ यहाँ,
नदी कहाँ जल पीती है, वृक्ष खाते है फल कहाँ,
गाय अपना दूध, स्वयं कहाँ पाती है,
देवी अपनी बलि, स्वयं कहाँ पाती है ?
मै और मेरे का विभ्रम, मनुष्य को भटका देता है,
माया मोह का बंधन, संसार में अटका देता है।

अनेक अवगुणों का मूल है कर्त्तव्य में प्रमाद,
मौत और ईश्वर की, सदा रहती नहीं याद।
ईश्वर ने कृपा कर यहाँ मृत्यु को बनाया है,
इसके बिना कब व्यक्ति को, अपना धर्म याद आया है?
यदि वह हो सकता अमर, अजर इस धरा पर,
हर व्यक्ति मात कर देता, रावण और कंस को यहाँ पर।

जैसे माँ बालक का नित्य पालन पोषण करती है,
ईश्वरीय ऊर्जा विश्व का भरण पोषण करती है।
प्रारब्ध से प्राप्त परिस्थिति में जो कर्त्तव्य पूरा करते है,
ईश्वरीय कृपा से भगवत प्राप्ति के पात्र बनते है,
अनुकूल परिस्थिति है उनकी दया, जिसमे करनी है सेवा,
प्रतिकूल यदि परिस्थिति लगे, करो स्मरण, पाओ मेवा।

ॐ शांति, शांति, शांति।

Monday, January 28, 2013

क्या करें ?

***********************************ॐ******************************************

जानने से होता है बोध,
मानने से होता है विश्वास,
करने से होता है योग।

पैदा होने पर मनुष्य ने जाना स्वयं की सत्ता को- 'मैं हूँ'  ,
फिर देखा इस संसार को, और जाना 'यह है',
फिर आरोपण किया मेरेपन का,
मेरी माँ, मेरा शरीर, मेरा घर और मेरा परिवार,

'मैं' तथा 'हूँ' के मध्य अनुभव हुआ रिक्त स्थान,
जिसमे भरने लगा नित नया, अपना अहंकार,
मैं अपनी माँ का पुत्र हूँ, मैं इस परिवार का अंग हूँ,
मैं इस जात से हूँ, धर्म से हूँ, देश और समाज से हूँ,
ढूंढता गया अपने लिए अनेकानेक पहचान,
लेकिन समय के साथ कभी पहचान छोटी हुई,
और कभी स्वयं की समझ छोटी हो गयी।
हर बार बढ़ता गया रिक्तता का अहसास,
कचोटता रहा हर पहचान में संकीर्णता का भाव,
चोटिल हुआ हर परिस्थिति में मेरेपन का भाव।

शिशु जो स्वतः प्रसन्न था,
कर देता था प्रसन्न अपनी मुस्कान से परिवार को,
रुदन करता था मात्र अपनी भूख प्यास के लिए,
देखो कहाँ से कहाँ आ गया,
अब वह स्वतः दुखी है,
कारण ढूंढता है प्रसन्नता के लिए,
यदि कोई मुस्कराए तो पूछता है कि,
क्या कोई गम छिपा रहे हो,
या, व्यंग से मुस्करा रहे हो ?
पेट भरा इतना है कि भूख की पहचान नहीं,
रात दिन रस भोग से प्यास बुझती नहीं।

आरोपित कर दिया है स्वयं पर संसार इसने,
जिसे जाना था 'यह है', उस का हिस्सा खुदको माना इसने।
यात्रा थी 'मैं हूँ' से 'मैं कौन हूँ', यह जानने की,
होड़ लग गयी, 'मैं' और 'हूँ' के मध्य विशेषण भरने की।

लेकिन इस प्रपंच में उलझा हुआ मन,
दुःख और सुख के जाल में फंसा हुआ तन,
शरीर मेरा है और इसी से जुड़े सारे सम्बन्ध,
दे सत्य का आभास, कि यह सत्य ही लगे अब।

शरीर की सजातीयता है संसार से, इसीलिए संसार लगे मेरा,
निरंतर घटती घटनाओ से, भ्रम टूटे नित मेरा,
लेकिन फिर कोई संस्कार चित्त से शरीर तक जागता है,
भ्रम और साथ ही यह बंधन, शरीर से बढ़ जाता है।

इस शरीर के बिना भी रहेगा मेरा अस्तित्व,
सुनने में अच्छा लगता है, भाव अमरता का जगता है,
लेकिन इस शरीर के बिना, कैसा है, मेरा अस्तित्व,
समझ नहीं पाता, मिथ्या कल्पना सा लगता है।
जब शरीर बदल गया और स्मृति लुप्त हो गयी,
कैसा जीव, कैसी अमरता, बात ही ख़त्म हो गयी।

अब एक दूसरी बात मुक्ति की सुनते है।
मृत्यु होगी देह की, जीवन से मुक्त होते है।
इस आवागमन से छुटकारा, मुक्ति गर्भ में रहने से,
बार-बार दुःख भोगने, जीने और मरने से।

यदि दुःख से मुक्ति चाहो तो मुक्ति होगी सुख से भी,
सुख की वासना जब तक है, मुक्ति नहीं है दुःख से भी।
यह कैसी विचित्र बात है ?
वैद्य कहे, रोग से नहीं, मुक्ति होगी स्वास्थ्य से भी ?

नहीं, यह वैद्य कहे, मुक्ति होगी दुःख रूपी रोग से,
लेकिन तब, जबकि मुक्ति हो पहले सुख रूपी रोग से।
हाय! कैसी विडम्बना है ?
रोगी ने जिसे रोग समझा था, वह तो रोग है ही,
जिसे स्वास्थ्य समझा था, वह भी तो रोग ही है।

ओह! गुत्थी सुलझ गई,
जीव को लगा कि वह जान गया रहस्य को,
स्वयं में जो स्थित, वही है स्वस्थ, इस ज्ञान को।
यह ज्ञान जो सत्य था, वह भी भ्रम सिद्ध होता है,
जीव का शरीर से तादात्म्य अत्यधिक होता है।
जीव और शरीर का संबंध चित्त से जुड़ता है,
चित्त में संस्कार, अनेकानेक परतो में होता है,
हर पर्त का उघड़ना, देता है आभास,
सत्य से हुआ साक्षात्कार, हुआ परमात्मा के पास।

लेकिन इस अनंत यात्रा में ऐसा हर कदम,
मंजिल आती नहीं, जब तक बन्दे में रहता दम।
जब सारा प्रयास पूर्ण हो जाए ,
जब शरण मात्र ही बच जाए,
तो कहते है सतगुरु,
कि यात्रा होती है शुरू।

जाने हुए ज्ञान का आदर,
सुने हुए ईश्वर का विश्वास,
निरंतर कर्त्तव्य का पालन,
यात्रा को प्रारंभ कर सकता है।

शरणागति का भाव,
सतगुरु की कृपा,
परमात्मा से प्रेम,
यात्रा को आगे बढ़ा सकता है।

अपने स्वरुप का बोध,
प्रेमास्पद से प्रेम,
अनंत वर्धमान आनंद,
प्राप्त हो सकता है।

यदि इन सब को चाहे बिना,
जो है, जैसा है, जहाँ है,
वहीँ अपनी स्थिति परमात्मा में मानकर,
करने के वेग को शांत करे,
और इससे अधिक कुछ न करे।

***********************************ॐ******************************************

Saturday, November 24, 2012

प्रेम

क्या पता है तुम्हे,
देखता है वो हमें ।

जो दृष्टि है, वही तो, है वो स्वयं,
जो सृष्टि है, वही तो, है वो स्वयं,
खुद भी जो है, वही तो, है वो स्वयं,
तू भी जो है, वही तो, है वो स्वयं,
यह भी जो है, वही तो, है वो स्वयं,
वह भी जो है, वही तो, है वो स्वयं ।

ऐसा लगता है क्या तुम्हे ?
या सुना है आप्त महापुरुषों से ??
या प्रमाण माना है शास्त्र वचनों को ???
स्वयं जो है अप्रमेय, वह है प्रमाता,
किसी भी प्रमाण के अंतगर्त वह नहीं आता ।

प्रमाण है संसार के, प्रत्यक्ष, अनुभव, अनुमान सभी,
करण है अंतःकरण, करें स्मृति विस्मृति कभी ।
वह तो परे है संसार  से, सभी साधनों से,
सभी इन्दिर्यो से, देह, मन और बुद्धि से ।

दृष्टि भ्रम के चित्र में,
एक को देखो, दूसरा हो जाता है ओझल,
इसी तरह जीव की दृष्टि में, संसार दिखे,
परमात्मा है ओझल ।

जो कुछ दिखता, सुनता और अनुभव होता,
संसार का अनुभव, सांसारिक ही होता ।
इन इन्द्रियों के पीछे मन और बुद्धि,
अहंकार से परिचालित, अंतःकरण की वृत्ति ।

यह सब यदि दीखते है, तो कोई देखने वाला भी तो है,
देखने वाले को कोई नहीं, देखने वाला कहीं भी है ।
सर्व व्याप्त परमात्मा ही, सब जगह देखने वाला है,
दृष्टा ही स्वयं, दृश्य को रचने वाला है ।

स्वयं की अभिव्यक्ति ही, तो है यह संसार,
लेकिन स्वयं को आवृत्त, कर लेता अहंकार,
अहंकार ही चेतना को सीमित कर देता है,
एक को विभक्त कर, मैं, तू, यह, वह रच देता है ।
यह विभक्ति ही तो, भक्ति के विपरीत है,
जीव के दुःख का कारण, यही जगत की रीत है ।
भक्ति में जीव और परमात्मा एक हो जाते है,
संसार में अहंकार से जो अनेक हो जाते है ।

अहंकार से आवृत्त, मायाबद्ध जीव,
ईश्वर कृपा से मनुष्य शरीर पाता है ।
गुरु कृपा से, शास्त्र के वचनों से,
यदि ईश्वर पर विश्वास कर पाता है ।
नहीं मांगता है प्रमाण उनके होने का,
श्रद्धा और समर्पण से यदि झुक जाता है ।
स्वयं प्रकट हो जाते है परमात्मा,
प्रभु कृपा से आनंद, दर्शन और प्रेम पाता है ।