कविता: एम. एल. गुप्ता
कैकयी का त्याग - 1
राम लला जब ब्याह कर आए, घर घर मंगल गीत बधाए!
सबके मन में हर्ष जगा है, चारों वर, वधु सहित हैं आए!!
कैकयी को है हर्ष विशेष, भरत से अधिक राम से स्नेह हैं!
सीता को क्या दूँ मुँह दिखाई में, उमड़ा बहु के प्रति नेह है!!
कनक भवन अति सुन्दर, जो बनाया है अत्यंत प्रेम से,
हर कक्ष मनोहर, शीश महल, जगमग चकाचौंध से।
सुन्दर उपवन, वाटिका मनोहर, पुष्पों से सुवासित है,
शीतल जल की मंद सरिता, मध्य में प्रवाहित है।
खग, पिक, शुक, सारिका, वृक्षों पर चहचहाते हुए,
चक, हंस, बक, सारस, जल में मन बहलाते हुए।
ज्येष्ठ में भी रहती शीतलता, बहती सुगन्धित मंद बयार,
नंदन कानन को लज्जित करे, दशरथ का प्रिय उपहार।
सर्वश्रेष्ठ दूँ मैं, अपने सर्वाधिक प्रिय राम की प्रिया को,
हो ऐसा उपहार जो दिया नहीं, कभी किसी सास ने बहु को,
सीता की मुँह दिखाई में, कैकयी ने दे दिया कनक भवन,
सबने सराहा कैकयी का प्रेम, बरसे सब ओर से सुमन।
कौशल्या, कैकयी, सुमित्रा, सभी ने आशीर्वाद दिया,
मांडवी, उर्मिला, श्रुतकीर्ति, सभी का मन पुलकित हुआ।
राम लक्ष्मण, सदा संग रहते, भरत-शत्रुघ्न का भी वैसा प्रेम,
सब भाई राम की सेवा करते, सब करते राम से अति स्नेह।
कभी चारों संग खेलते, कभी करने लगते सैन्य प्रयास,
राज काज में सहायक होते, विद्याध्ययन का भी अभ्यास।
अभी तरुण हैं, वैवाहिक जीवन से हो रहा है परिचय,
स्वयं परब्रह्म अवतरित हो, लीला हेतु कर रहे अभिनय।
जीवन में आनंद बहुत है, माता पिता आनंदित है,
चारों भाई नगर में जाते, सब दर्शन को लालायित हैं।
वृद्धावस्था में पुत्र प्राप्त हुए, माता-पिता का स्नेह अधिक है,
अति सर्वत्र वर्जयेत्! ऐसा कहते सभी सुभाषित हैं।
जीवन सुख दुःख के मध्य, सदैव घूमते रहता है,
घड़ी के पेंडुलम जैसा, समय कहीं नहीं ठहरता है।
कैकयी जानती राज-काज, सीता स्वयंवर के समाचार,
उसे पता है, पृथ्वी पर व्याप्त, राक्षस रावण का अनाचार।
राज अयोध्या का करने को, राम नहीं आए हैं यहाँ,
मनुज लीला में सहायक, लीला सहचर भी आए यहाँ।
समय आ रहा है राम, लीला हेतु यहाँ भी लीला होगी,
राष्ट्र हित हेतु अब, स्नेह, आदर, सुविधा की बलि होगी।
अब लीला में सहभागिता हेतु, कैकयी को अपयश लेना है,
मान, सम्मान, राम से विछोह, और सुहाग भी खो देना है।
हे विधाता! यह कैसी परीक्षा, क्या मानव ने कभी दी है?
सब देकर यश पाया है, अपयश की बात किसने की है?
यह अनुपम त्याग, ना रखे कोई धरा पर कैकयी नाम,
सब कुछ खोया लीला हेतु, भक्त करे बस, राम को प्रणाम।
कैकयी का त्याग - 2
राम करे अब राज काज, भावी राजा वे कहलायेंगे,
राजगुरु वसिष्ठ से आज्ञा ले, राम को युवराज बनायेंगे।
दशरथ उल्लसित हो उठे, कल ही यह शुभ कार्य हो,
भरत-शत्रुघ्न ननिहाल में, होंगे उत्सव से वंचित वो।
यह उतावलापन, जैसे बावलापन, आखिर क्यों होने लगा?
क्या था दशरथ को डर, जो उन पर हावी होने लगा?
दशरथ जानते थे कि, कैकयी का राम पर अति स्नेह है,
लेकिन मन में लगता, नारी सुलभ भरत पर प्रेम है।
नहीं टाल सकता कभी, राजा भी कैकयी की बात को,
नहीं भूल सकता, कैकयी के पिता से प्रथम मुलाकात को।
राजा अश्वपति ने राज शुल्क, कन्या हेतु यही मांगा था,
कैकयी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र, अयोध्या का भावी राजा था।
स्मरण हुआ, कैकयी ने साथ दिया, देवासुर संग्राम में,
रथ का चक्र जब सम्भाला था, कैकयी ने समरांगण में।
रानी की अंगुली से रक्त बहने लगा, दशरथ प्रेम विह्वल हुए,
रानी ले लो दो वरदान, आज तुम्हारे कारण विजयी हुए।
कैकयी ने मुस्कराकर कहा, राजन्, ये दो वर मेरी धरोहर हैं,
जब चाहे तब ले सकती हूँ मैं, मेरा प्रेम तुम्हारी न्यौछावर है।
दशरथ को लगता है, आज ही, शुभ कार्य संपन्न हो जाए,
क्या पता, किस समय क्या विघ्न, उपस्थित हो जाए?
होनी सदा होती बलवान, धरा पर अनहोनी होती नहीं,
अवतार भी मनुज रूप में आकर, मर्यादा भंग करते नहीं।
राम के मन में भी चल रहा, समय है अद्भुत आचरण का,
माँ कैकयी का साथ ही, करेगा उद्देश्य पूर्ण अवतरण का।
बचपन में लेटा था एक दिन, माता कैकयी की गोद में,
पूछ लिया था माँ से प्रश्न, अवसर देख आमोद-प्रमोद में।
माँ कितना करती हो प्रेम राम से, क्या कुछ लुटा सकती हो,
माँ हँसी, पुत्र! क्या धन, क्या प्राण, सर्वस्व भी दे सकती हूँ!
राम गंभीर हो गए, माता वचन दो, ऐसा समय आएगा,
यह राज्य, तुम्हारा प्राण, सर्वस्व भी दांव पर लगाया जाएगा।
कैकयी ने कहा, राम तुम मेरे प्राण हो,
ऐसा मत कहो, मुझे जीवन से त्राण दो!
मुझे पता है, तुम कौन हो, तुम्हारा आना सकारण है,
तुम लीला करते हो यहाँ, सब तुम्हारा ही निर्धारण है।
लेकिन प्रिय पुत्र, तुम्हारे लिए मुझे सब स्वीकार है,
यश मिलता सदा त्याग से, मुझे अपयश भी स्वीकार है।
कैकयी का त्याग - 3
अवध आनंदित है आज, राम युवराज बनाए जाएँगे,
सबके प्राणों के प्यारे राम, भावी राजा कहलायेंगे।
उत्सव की तैयारी विशेष, सुध-बुध भूले हैं नर-नारी,
हर्ष का नहीं है पारावार, मन मुदित सभी खुश हैं भारी।
लेकिन यह धरा का आनंद, स्वर्ग के देवों को खलने लगा,
स्वार्थी देवों को राज्य पुन: पाने का स्वप्न बिखरने लगा।
कैकयी की प्रिय दासी मंथरा, है कैकय से दहेज का उपहार,
हे माँ सरस्वती, उसकी बुद्धि फेरो, करो देवों का उद्धार।
मंथरा चली सुनाने को, कैकयी को विष भरा समाचार,
सुन कैकयी अति प्रसन्न हुई, गले का हार दिया उपहार।
मंथरा ने अपना माया जाल बिछाया, कैकयी को भड़काया,
क्या सोच रही हो महारानी, यह भयानक दुर्दिन आया।
अब राम करेंगे राज, होगा अयोध्या में सारे सुखों का वास,
लेकिन महारानी है कौशल्या, भरत को मिलेगा कारावास।
भयभीत हिरणी की भाँति, रानी थर-थर काँपने लगी,
कुटिल मंथरा रानी को, अपने वरदान स्मरण कराने लगी।
जाओ कोप भवन में, लो राजा से वचन, फिर बात करो,
यह अवसर मत चूकना, भरत के लिए राज्य प्राप्त करो।
रानी को स्मरण है, राम के प्रति वचन, और पति के वरदान,
यह जीवन रंगमंच का अभिनय, रखना है लीला का मान।
चली गई कोप भवन में, राजा को अशुभ समाचार मिला,
प्रथा के अनुरूप, यह राजा के लिए, सर्वप्रथम कार्य हुआ।
राजा गए प्रिय रानी के पास, मान-मनुहार करने लगे,
अपने मन मे आए दोष के लिए, पश्चाताप करने लगे।
सदैव सलाह से राज करते, आज पूर्व सूचना भी नहीं,
युवराज के लिए की मनमर्जी, पहले-पीछे चर्चा भी नहीं।
तुम्हें राम से प्रेम अधिक, इसलिए आश्चर्यचकित किया,
बातें बनाने लगे राजन् , मन के चोर को छिपा लिया।
रानी ने भृकुटी टेढ़ी की, मुख मुद्रा में सुधार नहीं किया,
दो वरदान लेने हेतु, दशरथ को वचन से बांध लिया।
हे रघुकुल दीपक, सत्यव्रती, अपना प्रण निभा लेना,
अब भरत करेगा राज यहाँ, राम को वन भिजवा देना।
राजा बोले, राम स्वयं, खुशी से, राज्य भरत को दे देगा,
राम है प्राणों का आधार, यह वर, मेरा जीवन ले लेगा।
रानी ने कहा निर्दयता से, वर देने से पहले सोचना था,
मन मे सोचा, हे राम! तुम्हें, लीला हेतु मुझे ही चुनना था।
कैकयी का त्याग - 4
राजा बेहोश पड़े हैं, चित्र उभर रहे, कैकयी की स्मृति मे,
चाहती थी कि राम प्रवीण हों, रण मे और राज्यकार्य में।
भावी राजा धरा को, रावण के आतंक से सुरक्षित करे,
राज्य का लाभ क्या, जब प्रजा पर कोई लूटपाट करे।
राष्ट्र को सुरक्षित करने हेतु, जन संगठन करना होगा,
स्थाई शांति के लिए, प्रजा का शिक्षण करना होगा।
वन प्रांतर में, सुरक्षा कार्य, मात्र राज्य से नहीं होगा,
प्रजा को स्वयं रक्षा हेतु, रण निपुण होना होगा।
इस प्रकार की, नेतृत्व क्षमता, है एकमात्र राम में,
प्रेरित कर देगा प्रत्येक व्यक्ति को, लगाएगा काम में।
भील, किरात, वानर आदि, अनेक जातियाँ है वन में,
संवाद स्थापित करना होगा, मानव जुड़ता है मन से।
राज्य करने के लिए, अनेक वर्ष, राष्ट्र कार्य अभी करना है,
रावण का आतंक मिटाना है, प्रजा का दुःख हरना है।
राम के मन-मस्तिष्क पर, अंकित हो गई माँ की बात,
मन में चुन लिया राष्ट्र कार्य, आतंक का होगा प्रतिघात।
माँ, समय आने पर, आपको, इसे सम्भव करना होगा,
मोह के धागे तोड़ कर, राम को वनगमन करना होगा।
आज वह समय आ गया, कैकयी अति कठोर हुई,
राम की लीला में सहभागी, यश त्याग को तत्पर हुई।
प्रभात की अरुणिम वेला में, राम आए पिता के पास,
देखा पिता का हाल और कैकयी का अनुपम प्रयास।
राम, तुम्हारे पिता मोहग्रस्त, भरत को राज्य दे सकते हैं,
लेकिन तुम्हारे वन गमन पर, अपने प्राण दे सकते हैं।
राम ने कहा, माता! मुझे, पितृआज्ञा सहर्ष स्वीकार है,
प्रिय भरत अयोध्या में राज्य करे, मुझे कानन स्वीकार है।
सीता और लक्ष्मण के साथ, वन गमन को प्रस्तुत हैं राम,
वल्कल धारण कर लिए, राज वस्त्र, आभूषण से क्या काम।
विधि को दे रहे धन्यवाद, कि भरत आज अनुपस्थित है,
लक्ष्मण साथ जा रहे हैं, भरत को समझाना मुश्किल है।
कैकयी का अनुपम त्याग, प्राणों से प्रिय राम से विछोह,
शीघ्र ही होने वाला है, अपने सुहाग, पति से भी विछोह।
अयोध्या में सब दुःखी, हुआ आशाओं पर कुठाराघात,
धिक्कार रहे सब कैकयी को, जिसने यश को मारी लात।
राम प्रसन्न, लक्ष्मण क्रोधित, सीता मुदित मन, बढ़ रहे,
अयोध्या के नर-नारी, घर-परिवार भूल पीछे चल रहे।
कैकयी का त्याग - 5
रुके तमसा नदी के तट पर, सब को छोड़कर आगे बढ़े,
गंगा के किनारे पहुँचकर, सुमंत्र एवं रथ लौटाने पर अड़े।
राम, लक्ष्मण एवं सीता मिले, सखा निषादराज गुह से,
तीर्थराज प्रयाग के लिए बढ़े, चरण धुलाए केवट से।
अवध के मित्र निषादराज से, राम ने रिश्ता प्रगाढ़ किया,
अयोध्या से भावी समाचार, और राह को निर्बाध किया।
भारद्वाज ऋषि से युद्ध, आयुध, वन स्थिति पर विमर्श किया,
राक्षस आतंक कहाँ विशेष, अपने निवास का विचार किया।
चित्रकूट राष्ट्र के मध्य में स्थित, यहाँ निवास करना होगा,
सब तरफ यहाँ से जाना सम्भव, जन संगठन करना होगा।
सैन्य संगठन करने के पश्चात्, दक्षिण की ओर बढना होगा,
राक्षस शिविर के पास पहुँच कर, पंचवटी में रुकना होगा।
चित्रकूट पहुँच कर कुटी बनाई, वन्य जीवन का अभ्यास,
सीता यहाँ भी प्रसन्न, राम के, अधरों पर मुस्कान अनायास।
उधर भरत लौटे ननिहाल से, अयोध्या में शत्रुघ्न के साथ,
राम बिना सूनी हो गई अयोध्या, जैसे छाई हो काली रात।
पिता की मृत्यु, और अपने लिए राजगद्दी, लगे विष समान,
अपयश माता को, लात मंथरा को, स्वयं को दे रहे धिक्कार।
कैकयी शांत, मन में चिंता, वन कठोर, राम की कोमलता,
भरत चाहते राम की वापसी, सब चले वन, ले मोह ममता।
जब देखा निषादराज ने, तुरंत सेना को सावधान किया,
लेकिन संवाद के पश्चात्, भरत का मार्ग प्रशस्त किया।
चित्रकूट में जब पहुँचे, राम ने अपने परिवार को देखा,
आगे बढ़कर कैकयी से मिले, जननी कह संबोधित किया।
जन्म दिया माँ कौशल्या ने, पर राम को राम किसने बनाया,
अद्भुत त्याग किया कैकयी ने, इसीलिए राम ने यश पाया।
राम भी बन सकते थे, अयोध्या के एक विलासी राजकुमार,
मोहग्रस्त पिता दशरथ का, अवध में पाते रहते निरंतर दुलार।
इक्ष्वाकु वंश की अनेक पीढ़ियों में, एक नाम बस राम होता,
लेकिन राम के यश के बिना, इक्ष्वाकु वंश भी विस्मृत होता।
राष्ट्रहित में त्याग सभी करते हैं, राजा भी और नागरिक भी,
यश मिलता सभी को त्याग से, यही रीति भी और उचित भी।
पन्नाधाय ने किया, पुत्र के जीवन का त्याग, अमर हो गया,
दधीचि ने किया अस्थियों का त्याग, सदैव हमें स्मरण रहा।
अनेकानेक त्याग की कहानियाँ, यश पाया किसी किसी ने,
लेकिन कैकयी का अनुपम त्याग, अपयश पाया जिसने।
इसीलिए भक्ति में सब कुछ दे देना, यह गाथा है प्रमाण,
राम की जननी कैकयी और, राम को करते रहो प्रणाम।
🎬 यह कविता कवि के स्वयं के स्वर में, चित्रों और संगीत के साथ देखें: https://youtu.be/Hi2ALEBYw4U
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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