कविता: एम. एल. गुप्ता
नवरात्र के नौ दिन, देवी के नौ रूप, रामायण में भी मिले नारी-शक्ति के नौ स्वरूप। सती से सीता तक, आओ करें नमन, नारी तुम शक्ति हो – यही इस कथा का मर्म।
प्रथम दिवस – सती / पार्वती
नारी तुम शक्ति हो! तुमने उल्लंघन किया शिव का, किया विध्वंस पिता के यज्ञ का, लौटीं एक नया रूप लेकर, एक नया जीवन शक्ति और प्रेम का। जन्म हुआ प्रथम पुत्र का, नारी की स्वाधीनता का प्रतीक, अपनी निजता का रक्षक, माँ के द्वारा रचित, पति का सहयोग अनपेक्षित, जिसे स्वीकारा सृष्टि ने प्रथम पूज्य देव गणेश के रूप में, स्वीकारा शिव ने पुत्र के रूप में, और दिया जीवनदान गजानन के रूप में! तुमने जब रौद्र रूप धारण किया राक्षस के संहार हेतु, शांत करने के लिए लेट गए शिव भी चरणों में!
द्वितीय दिवस – कौशल्या / कैकयी
नारी तुम शक्ति हो! तुमने जन्म दिया राम को, एक ने जन्म दिया, एक ने गढ़ा, तुमने ही निर्णय लिया वनवास का, जानती थीं तुम, महलों में रहकर कोई उपाय नहीं राक्षसराज रावण के विनाश का!
तृतीय दिवस – अहल्या
नारी तुम शक्ति हो! तुमने सह लिया दंश अपमान का, इंद्र ने दिया धोखा पति के वेश में आकर, पति ने त्याग दिया आवेश में आकर, तुम प्रतीक्षा करती रहीं भगवान राम की, वे आए और स्थापना की नारी के सम्मान की!
चतुर्थ दिवस – उर्मिला
नारी तुम शक्ति हो! पति ने प्रण लिया वनवासी राम की सेवा का, पूछा तक नहीं, क्या होगा नवयौवना पत्नी का, धैर्यपूर्वक सास की सेवा करती रहीं, अंतहीन प्रतीक्षा का कष्ट सहती रहीं, अनाम सा रहा पात्र महाकाव्य में, नाम भर आया विवाह के वर्णन में, ऐसे अनाम त्याग तुम करती रहीं, पुरुष के कर्तव्य-पालन की नींव बनती रहीं!
पंचम दिवस – अनसूया
नारी तुम शक्ति हो! तुम्हारे सतीत्व की शक्ति से देव भी शिशु बने, त्रिदेव आए और पालना झूलने लगे, तुमने याचक का मान किया, त्रिदेव को शिशु बना भिक्षा-दान किया, अपने सम्मान का रक्षण किया! तुमने ही बताया पतिव्रत धर्म सीता को, तुमने ही पावन किया चित्रकूट धाम को!
षष्ठम दिवस – तारा
नारी तुम शक्ति हो! भाँप लेती हो समय की गति को, सुग्रीव के पीछे खड़े राम के बल को, चेताती हो हठी पति बालि को, लेकिन भवितव्य को रोक नहीं पातीं, प्रभु राम की शरण में पुत्र अंगद का जीवन सँवारतीं!
सप्तम दिवस – मंदोदरी
नारी तुम शक्ति हो! तुमने ही जन्म दिया इंद्रजीत जैसे बलशाली पुत्र को, जिसकी शक्ति को मानना पड़ा रावण को, तुमने ही रक्षा की सीता के शील की, रावण को स्मरण कराई मर्यादा, कि अधिकार तुम्हें एकाधिक विवाह का, लेकिन ज़बरन नहीं, नारी की स्वीकृति के बिना नहीं!
अष्टम दिवस – शबरी
नारी तुम शक्ति हो! भक्ति भी करती हो तो सब भूल जाती हो, आराध्य के लिए जूठे बेर भी ले आती हो, तुम्हारे धैर्य के आगे नतमस्तक होते हैं राम, जूठे बेर खाकर देते हैं भक्ति का प्रमाण!
नवम दिवस – सीता
नारी तुम शक्ति हो! तुमने ही जन्म दिया लव-कुश को, जिन्होंने पुनर्स्थापित किया तुम्हारा सम्मान, झुका दिया अवध समाज और झुके राजा राम, तुमने लेकिन पति की मर्यादा की रक्षा की, धरती में समा गईं, नए इतिहास की रचना की!
उपसंहार
नारी तुम शक्ति हो! शक्ति पूजा का अवसर है, नवरात्र के नौ दिन, लेकिन प्रतिदिन गृहकार्य, नहीं चलता तुम्हारे बिन। नारी तुम शक्ति हो – हम करते हैं तुम्हें माँ के रूप में प्रणाम, और करते रहें सदा, राम को प्रणाम!
🎬 यह कविता कवि के स्वयं के स्वर में, चित्रों और संगीत के साथ देखें: https://youtu.be/4WOurPWUaaI
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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