कविता: एम. एल. गुप्ता
चाहे कहीं भी राम हो, चाहे कहीं भी हो सीता,
वातावरण पवित्र हो जाता, धरा होती परम पुनीता।
राक्षसराज रावण की लंका भी, विनाश से बच गई थी,
जब विभीषण को राजा बनाया, लंका स्वर्णमयी थी!
परशुराम के क्रोध से, जनकपुर, काँपने लग गया था,
राम के शीतल वचनों से, मुनि क्रोध शांत हो गया था।
सीता राम का नाम लेने से, बन जाते हैं सारे काम,
वरना चिंता और फिक्र में, उम्र होती सारी तमाम।
राम बैठे थे जंगल में, शांत थे, मुस्कुरा रहे थे,
लक्ष्मण को लगता कभी कि, समय गंवा रहे थे।
वनवास का कारण लक्ष्मण को, समझ आ गया था,
सब है राम की लीला, व्यर्थ कैकयी को कोसा गया था।
राक्षसों के नाश के लिए, अयोध्या से बाहर जाना पड़ेगा,
अपनी प्रजा की रक्षा के लिए, राजा को आना पड़ेगा।
पता है कि सेना से, सीमा की रक्षा की जा सकती है,
लेकिन प्रजा में देशभक्ति, नहीं भरी जा सकती है।
अपने ही देश की अंतिम पंक्ति में जो व्यक्ति खड़ा है,
राजा का उत्तरदायित्व, उसके प्रति ज्यादा बड़ा है।
राजमहल का ऐश्वर्य, राजा को विलासी बनाता है,
उसे प्रजा की रक्षा के, मुख्य लक्ष्य से भटकाता है।
राजा का मुख्य कार्य है, प्रजा पालन और सीमा की रक्षा,
अपना भोग विलास त्याग कर, हर एक की जीवन रक्षा।
अयोध्या के राजा इस संदर्भ में कर्तव्यच्युत हो गए थे,
इसीलिए पूरे दंडकारण्य में, इतने राक्षस बढ़ गए थे।
राम और लक्ष्मण अब, प्रजा के संगठन में जुट गए थे,
प्रत्येक वनवासी को, युद्ध लड़ने की शिक्षा दे रहे थे,
यहां हर व्यक्ति को, अपनी रक्षा के योग्य बनाना था,
क्योंकि राजा को तो एक दिन, नगर में लौट जाना था।
यदि राष्ट्र को जीना है, तो हमें निरंतर आगे बढ़ना होगा,
जनता के हर व्यक्ति को, समर्थ और सक्षम बनना होगा।
लेकिन राक्षस सदा रहते हैं, जनता के मध्य वेश बदल कर,
जनता को गुमराह करते हैं, अनुचित आदर्श प्रस्तुत कर।
वन में आना क्यूँ जरूरी था, राम ने लक्ष्मण को बतलाया,
माता कैकयी ने यह अपयश, राष्ट्र हित में था अपनाया।
राजमहल से बाहर आकर, जनता के बीच रहकर,
हमें संगठित होकर, करना है प्रहार, राक्षस सभ्यता पर।
राष्ट्र धर्म है सर्वोपरि, यह भाव सभी को समझाना है,
किसी के भरोसे नहीं रहना, रक्षक का धर्म निभाना है।
जब सामान्य जन सैनिक बनकर, लड़ना सीख जाए,
राजा, ऋषि, मुनि और वनचर, सब सुरक्षित रह पाए।
चौदह वर्ष तक वनवासी राम ने, राष्ट्र को सुरक्षित बनाया,
राक्षस सत्ता की जड़ उखाड़ कर, उनको सभ्य बनाया।
खर, दूषण को पराजित करके, रावण को संदेश दिया,
अवसर है सुधर जाने का, अब ईश्वर का अवतरण हुआ।
रावण सब जानते हुए भी, अहंकार के वशीभूत हुआ,
परिणाम हुआ रावण वध, विभीषण राम की शरण हुआ।
राम ने शत्रु देश की प्रजा, को भी अभय दान दिया,
अयोध्या आकर राम राज्य का, आदर्श स्थापित किया।
राम स्वयं परब्रह्म के अवतार, उनका जीवन, उनका काम,
है अनुकरणीय मानव मात्र हेतु, हम करें राम को प्रणाम।
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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