कविता: एम. एल. गुप्ता
दशानन कहा, दसशीश कहा, दसग्रीव कहा हमने जिसको,
स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम ने, मुक्त किया जीवन से उसको।
कौन था वह रावण और क्या थे उसके, ये दस सिर ?
क्यों नहीं भूल पाए उसे, जलाएँगे पुतला इस बार फिर।
जीवन में प्रगति के लिए, स्वाभिमान सहायक है,
अभिमान, दर्प और अहंकार, बन जाते बाधक हैं।
यहाँ कितना सूक्ष्म अंतर है, जहाँ हम चूक जाते हैं,
अन्य की श्रेष्ठता, अधिकार का आदर भूल जाते हैं।
अपना हित, अपनों का हित, हमारे जीवन का उद्देश्य रहे,
लेकिन अन्य का अनहित न हो, इसका भी हमें ध्यान रहे।
अपने कुल, राष्ट्र, गुण का, गौरव बोध सदा बना रहे,
राक्षस बन कर दमन न करें, पतन की राह से बचे रहें।
अपने दस गुणों के कारण ही, दस सिर वाला कहलाया,
अहंकार के दीमक से, हर गुण, अवगुण बनकर आया।
क्या-क्या गुण थे, कैसे बना था, दस सिरों का स्वामी,
अति आदर पा सकता था, जो होता सत्य का अनुगामी।
पहला सिर – विद्या → कुबुद्धि
चार वेद, छह शास्त्र, सब कंठ में धारण कर लिए,
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद जिसने जान लिए।
शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष,
शास्त्रों का ज्ञाता था रावण, विद्वत्ता का मानो शीर्ष।
पर अहंकार ने रावण के, विद्या के सिर को गिरा दिया,
विद्या से उपजी कुबुद्धि, उसका पतन करा दिया।
वेद पढ़कर भी नहीं समझा, यज्ञ का अर्थ है त्याग,
अपनी कामना पूर्ति हेतु, जीवन भर की दौड़-भाग।
दूसरा सिर – तप → मद
घोर तप किया कुंभकर्ण, विभीषण और रावण ने,
एक-एक सिर काटकर, अर्पित किए दशानन ने,
ब्रह्मा ने कहा, अमरता के सिवा, वर कोई भी लो माँग,
न मार सके मुझे देव-दानव, यक्ष, राक्षस या नाग ।
पर अहंकार ने रावण के, तप के सिर को गिरा दिया,
तप करके भी वर का मद, सिर पर चढ़कर बोल गया,
मनुज, वानर क्या मारेंगे मुझे, जीत लूँगा त्रिलोक को,
तुच्छ समझा उस मानव को, जो पा लेता है परमात्मा को,
तीसरा सिर – संगीत → मन
संगीत शास्त्र के प्रणेता, शिव का भक्त था रावण,
डमरू से नाद उत्पन्न हुआ, किया सुरों का आराधन,
शिवताण्डव स्तोत्र रचा, जब पीड़ा में भीगा था मन,
वीणा कहलाई रावणहत्था, जिसका करता था वादन।
पर अहंकार ने रावण के, संगीत के सिर को गिरा दिया,
संगीत के स्थान पर मन ने, भोग को स्वभाव बना लिया।
वासना और मदिरा के व्यसन, बने रावण के मन के स्वामी,
सुर-ताल बह गए भोग में, मन हुआ इंद्रियों का अनुगामी।
चौथा सिर – पराक्रम → क्रोध
देव - दानव, मानव या वानर, युद्ध सदा करता रहा,
उसके पराक्रम का जयघोष, जगत् में होता रहा।
बालि या सहस्रार्जुन के सिवा, कोई उसे न हरा सका,
उसके पराक्रम के आगे, भूलोक व देवलोक थका।
पर अहंकार ने रावण के, पराक्रम के सिर को गिरा दिया,
उसने पराक्रम के स्थान पर, क्रोध धारण कर लिया।
दूत का वध करना चाहा, अंग-भंग हेतु पूँछ जला दी,
अंगद को अपमानित किया, विभीषण को लात मार दी।
पाँचवाँ सिर – ऐश्वर्य → लोभ
एक ही उदाहरण पर्याप्त, प्रजा स्वर्णमहल मे रहती थी,
अतुलनीय ऐश्वर्य लंका में, वैभव की नदी बहती थी।
प्रजा को कोई कष्ट नहीं, सब अति उल्लास में रहते थे,
धन से राजकोष एवं आयुध से शस्त्रागार भरे रहते थे।
पर अहंकार ने रावण के, ऐश्वर्य के सिर को गिरा दिया,
ऐश्वर्य सदा कम ही लगा, लोभ से विवश वह हो गया।
भाई कुबेर से लंका छीनी, पुष्पक विमान झपट लिया,
त्रिलोकी में सभी जगह, लूट-पाट कर-करके जिया ।
छठा सिर – नीति → मात्सर्य
युद्धनीति, राजनीति और, कूटनीति का पंडित रावण,
आतंक और अत्याचार से, व्यथित होते रहे देवगण।
बालि और सहस्रार्जुन से, हार कर भी राज्य बचा लिया,
रिपु से मित्रता कर ली, वैर को मैत्री में बदल दिया।
पर अहंकार ने रावण के, नीति के सिर को गिरा दिया,
नीति पर हावी मात्सर्य, किसी को सुखी रहने न दिया
देवों का वैभव देखकर, ईर्ष्याग्नि से जलता रहा,
इसी स्वभाव के कारण, सबको शत्रु बनाता रहा।
सातवाँ सिर – चिकित्सा → चित्त
आयुर्वेद के दो ग्रंथ, 'अर्क प्रकाश' एवं 'कुमार तंत्र',
एक में रस-रसायन विधि, दूसरे में बालक उपचार मंत्र।
दोनों का रचयिता कहलाता, रावण देह का था वैद्य,
अपनी देह को भी उसने, रोग के लिए किया अभेद्य।
पर अहंकार ने रावण के, चिकित्सा के सिर को गिरा दिया,
चिकित्सा करता रहा देह की, चित्त को रोगी बना लिया।
सलाह दी विभीषण, मंदोदरी, मारीच और माल्यवान ने,
चित्त पर अहंकार का ज्वर, नहीं सुनी किसी की रावण ने।
आठवाँ सिर – ज्योतिष → मोह
कहते हैं कि रावण अनेक, ज्योतिष ग्रंथों का प्रणेता था,
ग्रह-नक्षत्रों की गति पढ़ लेता , शुभ मुहूर्त चुन लेता था।
मेघनाद के सौभाग्य हेतु, जन्म पर नवग्रहों को बाँध दिया,
सबका भाग्य जानने के लिए, 'रावण संहिता' रच दिया।
पर अहंकार ने रावण के, ज्योतिष के सिर को गिरा दिया,
मोह के कारण काल की गति को, पढ़ने में विफल रहा।
मानव रूप में आए शत्रु से, क्या जीवन हरण हो जाएगा?
मोह छा गया बुद्धि पर, ज्योतिष ज्ञान काम नहीं आएगा।
नौवाँ सिर – मर्यादा → काम
माँ सीता का हरण किया, अशोक वाटिका मे रखा,
बल-प्रयोग नहीं किया, अपनी मर्यादा में रहा ।
कहते हैं, शिवलिंग स्थापना हेतु, राम ने बुलाया था,
यजमान की मर्यादा हेतु, सीता को साथ ले गया था।
पर अहंकार ने रावण के, मर्यादा के सिर को गिरा दिया,
काम हावी हुआ, मिथ्या साधु रूप में, सीता को चुरा लिया।
वेदवती एवं रंभा हेतु कामी, होकर शाप को प्राप्त हुआ,
देह को बाँध दिया नलकूबर ने, मन उच्छृंखल बना रहा।
दसवाँ सिर – भक्ति → अहंकार
ब्रह्मा से वर प्राप्त करके, रावण गया शिव के पास,
शिव को कैलाश सहित, ले जाने का किया प्रयास।
हाथ दब गया कैलाश के नीचे, हजार वर्ष रोया-गाया,
रावण नाम दिया शिव ने, आयुध 'चंद्रहास' प्रदान किया।
पर अहंकार ने रावण के, भक्ति के सिर को गिरा दिया,
हुआ अनर्थ, सर्वोपरि गुण भक्ति, अहंकार में बदल दिया।
भक्ति में होता समर्पण, रावण ने माँगा अधिकार,
सर्वनाश ही होना था, ले डूबा रावण को अहंकार।
अहंकार – दसवाँ भी, पहला भी
नौ सिर जो नौ गुण थे, वे नौ दोष क्यों बन गए,
अहंकार एक कारण, जिसमें अवगुण बस गए।
विद्या, तप, संगीत, पराक्रम, ऐश्वर्य, नीति और चिकित्सा,
ज्योतिष, मर्यादा आदि सभी गुण, भक्ति है शीर्ष सबका।
कुबुद्धि, मद, क्रोध, लोभ, मात्सर्य और, काम वासना,
चित्त, मोह, मन की चाह, अहंकार है शीर्ष सबका।
गुण अवगुण बन गए, जब मात्र अपना हित सोचा,
सबका हित सोचा होता, अपना हित स्वतः होता।
कुंभकर्ण, मेघनाद और रावण, सपरिवार जल गए,
अहंकार के कारण ही, अवगुण जीवन में मिल गए।
एक-एक सिर कटता युद्ध में, लेकिन वापस आ जाता,
अहंकार का अमृत नाभि में, अवगुण को मरने नहीं देता।
बाण जब नाभि में लगा, अहंकार नष्ट, दस शीश गिरे,
भक्ति रूपी अमृत पा ले तो, मानव को सारे गुण मिले।
रावण का वध करना है तो, अपने भीतर जाकर देखो,
अहंकार से मुक्ति पाकर, नया जीवन जीना सीखो।
फलश्रुति
दस गुण आयें जीवन में, सबका हित रहे ध्यान,
अहंकार से मुक्ति मिले, करें राम को प्रणाम।
🎬 यह कविता कवि के स्वयं के स्वर में, चित्रों और संगीत के साथ देखें: https://youtu.be/XMmu2OYy9TA
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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