Tuesday, November 3, 2026

राम राज्य में श्वान का न्याय | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

राम राज्य कर रहे धरा पर, सब ओर न्याय का शासन है,
श्रेय और प्रेय पा सकें सभी, ऐसा धर्म का अनुशासन है।
आज प्रातः काल से राजसभा में धर्म पर चर्चा चल रही है,
क्या ब्राह्मण, चाण्डाल हैं समान, सभा मंथन कर रही है।
समदर्शी होना है हमें, जैसे शरीर होता है अंगों के प्रति,
सम व्यवहार नहीं है संभव, मुख, पीठ या पैर के प्रति।

इतने में आई एक चीत्कार, हुई सभा सन्न, कैसी ये पुकार?
भीतर आया श्वान एक, मन में रोष, जैसे खाई दुत्कार।
किया प्रश्न आकर स्वयं राजा से, हे राम, यह कैसा अन्याय,
अकारण ब्राह्मण ने मारा मुझे, क्या मिल सकेगा मुझे न्याय?
क्या दीन हीन मलिन होना, निरीह जीवन मेरा अपराध?
नीच प्राणी होने के कारण, ब्राह्मण भी बन गया क्या व्याध?

कुछ रूखा सूखा खाया था, निद्रा ने आ घेरा मुझको,
सो रहा था एक कोने में मैं, ब्राह्मण ने दंड मारा मुझको।
इतने में आ गया ब्राह्मण, किया उसने राम को प्रणाम,
कुत्ता भी न्याय मांग रहा, क्या शेष नहीं अब कोई काम?
ये सत्य है कि अकारण मारा मैंने, यह बस सो रहा था,
दंड था मेरे हाथ में, ऐसे ही मन में कुछ आ गया था।

उच्छृंखल वृत्ति जाग उठी, दंड उठाकर यूँ चला दिया,
वहाँ सोता हुआ श्वान यह, व्यर्थ ही चपेट में आ गया।
कुछ ध्यान न दो स्वामी इस पर, ऐसे ही रोता फिरता है,
दो टुकड़े मिल जाने दो बस, दिन भर सोता रहता है।
ब्राह्मण उच्च वर्ग का प्राणी, धर्म का जीवन जीता है,
अच्छे कार्य के लिए लेता दान, नित समाजसेवा करता है।

राम ने कहा, क्या अनुचित उचित, निर्णय राजा को करना है,
राम राज्य में समान सभी, हर प्राणी से न्याय मुझे करना है।
पूछा कुत्ते से, तू ही बता, इस अपराध का दंड क्या हो?
राज्य की मर्यादा यही, कोई भी कर्त्तव्यच्युत ना हो!
सभा अचंभित देख रही, यह कुत्ता अब क्या माँगेगा?
ब्राह्मण के भाग्य का निर्णय, यह श्वान कैसे कर देगा?

कुत्ते ने कहा हे राजन्! इसे एक मठ का महंत बना दो,
अपने अधिकार के मद में, इसे मतवाला बना रहने दो।
सब पूछ रहे कि यह दंड है, या दिया कोई पुरस्कार है?
महंत का जीवन होगा बेहतर, इस न्याय को धिक्कार है।
आखिर राम ने भी जिज्ञासा, प्रकट कर ही दी श्वान से,
ये कैसा दंड प्रस्तावित किया, जानना चाहेंगे आप से।

श्वान ने कहा कि, प्रभु! यह पिछले जन्म का वृत्तांत है,
मठ का महंत बना था मैं, उसी का यह जीवन दुखांत है।
ये जो अधिकारी बने हुए, समाजसेवा का दम भरते हैं,
अधिकार पाकर बौरा जाते, अन्याय निरंतर करते हैं।
ऐसा को जनमा जग माहीं, प्रभुता पाई जेहि मद नाहीं।
राजदंड जब संभले नाहीं, अपना नाश खुद ही कराहीं।

राजसभा में बैठे हुए, सभी सभासद बगलें झांक रहे,
यह कुत्ता बना धर्म का प्रतीक, हम व्यर्थ बातें हाँक रहे।
यह रामराज्य है, सब पाते यहाँ फल, अपने अपने कर्म का,
कभी प्रत्यक्ष, कभी अप्रत्यक्ष, सदैव परिणाम धर्म का।
हम अपने कर्म का विचार करें, हो धर्ममय अर्थ व काम,
मुख्य धर्म है कर्त्तव्य अपना, नित करे राम को प्रणाम।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

No comments:

Post a Comment