Tuesday, November 3, 2026

होली का संदेश

कविता: एम. एल. गुप्ता

सास कहे दामाद से, तेरे गोरे गाल
आ जा मेरे पास में, ला मल दूँ मैं गुलाल,
जो सास मले गुलाल, दामाद बड़ा शर्माये,
सास कहे सब एक एक, अब देवर कहाँ से आए,
कहाँ से आए ननदिया, जो करे ठिठोली,
कहाँ से आए नंदोई, जो भिगोए रंग से चोली,
कैसे खेलें वो होली जो रिश्तों को स्नेह से भिगो दें,
एक एक बच्चा पैदा कर, परिवार कैसे बढ़ा लें !

एक राष्ट्र यह चिर पुरातन, नित नूतन भी यही है,
संस्कृति प्रवाहित निरंतर, युग युग से रही है।
यह प्रवाह, सनातन धर्म के कारण सदा रह पाया,
वसुधैव कुटुम्बकम्, के भाव से ही चल पाया।
हमने आत्मसात किया, विदेशी और विधर्मी को,
लेकिन कभी नहीं भूले, अपने देव और सरज़मीं को,
ऐसा करने के लिए हमने, आटे में नमक मिलाया,
दूध में चीनी की तरह, उनको गले लगाया।
संख्या बल में अधिक रहे, इसीलिए ऐसा कर पाए,
संख्या सीमित होने पर, संस्कृति बच नहीं पाए,
हमारा धर्म, हमारी आस्था दुनिया में भी फैला था।
लेकिन हिमालय से समुद्र तक, उद्गम स्रोत सदा यह था।
इस धरा पर सनातन धर्म को, निश्चित जीवित रखना है,
न्यूनतम दो बच्चों का, पालन हमको करना है।
यदि हम माता पिता का क़र्ज़ चुकाना चाहते हैं,
पति पत्नी के दो बच्चे हों, यह सभी चाहते हैं।
अपने परिवार को बचाओ, संस्कृति को बचाओ,
न्यूनतम दो बच्चे हों, यह पाठ सभी पढ़ जाओ।

बातें कितनी हैं दिल में सारी कहाँ कह पाता हूँ,
होली मंगलमय सभी को, प्रणाम चरणों में करता हूँ।

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

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