Tuesday, November 3, 2026

भरत – प्रेम जो माँगता नहीं | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

"चौदह बरस मैंने प्रतीक्षा की, अब और विरह न सहूँगा,
सजा दो चिता, अब देर नहीं, मैं अग्नि-प्रवेश करूँगा।"
शत्रुघ्न के आँसू गिर रहे, माता कौशल्या काँप उठी,
"भरत, अभी तुम धीर धरो, रात्रि आँगन में न उतरी।"
जिसके लिए माँ ने राज माँगा, राम को वनवास भेज दिया,
वह भरत देखो आज अपने लिए, चिता सजाने लग गया।

ऐसा अनुपम प्रेम का उदाहरण, कहीं भी नहीं मिलता है,
राजा न बना, राज चलाया, खड़ाऊँ की सेवा करता है।
राजमहल छोड़कर नंदीग्राम, रहकर चौदह वर्ष तप किया,
माँ को भी क्षमा न कर पाया, कितना प्रेम भाई से किया?
आज यदि यह करुण कहानी, पूरी आप सुन लेंगे,
परिवार में एकता का सूत्र, क्या है, यह जान लेंगे।

भाग I – अवध से चित्रकूट

रामनवमी को चारों भाई जन्मे, अवध में छाया हर्ष,
कैकयी के गर्भ से उत्पन्न, विश्व भरण पोषक भरत।
राम जैसे नीलाभ वर्ण, सुंदर, सुडौल, मोहक बदन,
राम-लक्ष्मण की जैसे जोड़ी, वैसे ही हैं भरत-शत्रुघ्न।
खेल में राम हारकर भी, भरत जीता है, कह देते,
शत्रुघ्न भरत के अनुगामी, सदा भरत की सेवा करते।

जनकपुर में सभी भाइयों का, एक साथ विवाह हुआ,
भरत को मिली मांडवी, शीघ्र ही मन एकाकार हुआ।
सगी बहन श्रुतकीर्ति से, शत्रुघ्न का विवाह हुआ,
दोनों भाई सदा संग रहते, ननिहाल संग जाना हुआ।
राजा दशरथ ने राम को, युवराज बनाना तय किया,
विधाता ने कुछ और ही, इस रात के लिए तय किया।

राम की लीला ऐसी हुई, कैकयी ने माँगा राम-वनवास,
भरत के लिए राज्य मिले, सीता और लक्ष्मण गए साथ।
दशरथ ने राम के वियोग में, शीघ्र ही प्राण त्याग दिए,
भरत-शत्रुघ्न को लिवाने, अवध से दूत कैकय देश गए।
भरत को आ रहे बुरे स्वप्न, अपशकुन होने लग गए,
दोनों भाई शीघ्रतापूर्वक, अवध के लिए निकल गए।

राम बिना सूनी अयोध्या, जैसे छाई हो काली रात,
जानकर समाचार सारे, शत्रुघ्न ने मंथरा को दी लात।
कूबड़ तो निकल गया उसका, भरत ने उसको छुड़ा दिया,
पर माँ से मौन रहे आजीवन, यह दुःख भरत ने सदा जिया।
कौशल्या के चरणों की शपथ ले, निरंतर अश्रु गिराते रहे,
राजा नहीं बनूँगा मैं, राम को लौटाने की रट लगाते रहे।

गुरु वसिष्ठ ने कहा राज-सभा में, राजतिलक करते हैं अब,
भरत हैं अब अयोध्या के राजा, भरत स्पष्ट मना करते हैं तब।
चलते हैं राम को वापस लाएँगे, राजतिलक, उन्हीं का करेंगे,
यह राज, सदा से उनका है, हम सब भाई, उनकी सेवा करेंगे।
अवध की सुरक्षा व्यवस्था करके, परिवार और सेना सहित चले,
निषादराज गुह ने संदेह किया, विश्वास हुआ, अश्रु बह निकले।

भाग II – चित्रकूट में मिलन

सीता और राम सोए जहाँ, उस शय्या को देख भरत रो रहे,
राम ने कहा वनदेवी से, राह के काँटे हटा दो, भरत आ रहे।
वनदेवी ने कहा, राम आप स्वयं, काँटों पर चलकर आते हैं,
क्या आपके भाई, सुकोमल हैं, जो सहन नहीं कर पाते हैं?
राम ने कहा, जो भरत जान ले कि, राम ने यह कष्ट सहा है,
उसके प्राण शरीर छोड़ देंगे, वह स्वयं को दोषी मान रहा है।

भरत ने अब रथ त्याग दिया, पैदल पहुँचे प्रयागराज,
सबने संगम में स्नान किया, मिले यहाँ ऋषि भरद्वाज।
समस्त तप-व्रत हुए सुफल, जब पाया राम का दर्शन,
लेकिन राम के दर्शन के फल से, मिले भरत के दर्शन।
सेना सहित भरत के आगमन से, लक्ष्मण ने क्रोध किया,
राम जानते भरत की निर्मलता, लक्ष्मण को शांत किया।

भरत गिर गए चरणों में, राम के अश्रु भरे नयन,
दो नीले आकाश मिले, ऐसा है उनका आलिंगन।
ऋषि-मुनि, जनक आदि, सब आग्रह राम से कर रहे,
राम का निश्चय अटल, पितृ-आज्ञा का पालन कर रहे।
लेकिन भरत के प्रेम के आगे, राम नतमस्तक हुए,
जो भरत कहे, वही कर लूँगा, ऐसे वचन कह दिए।

परंतु भरत का प्रेम यही, राम की सेवा का प्रण लिया,
राम की इच्छा सर्वोपरि, अपने लिए दुःख चुन लिया।
"दे दो अपनी चरण पादुका, चौदह वर्ष प्रतीक्षा करूँगा,
एक दिन भी जो अधिक हुआ, आत्मदाह कर लूँगा।"
राम ने कहा, "प्रिय भरत, माँ कैकयी पर क्रोध न करना!"
भरत ने सिर झुका लिया, पर कठिन रहा यह दुःख सहना।

चरण पादुका शीश पर धारण कर, अवध को लौट गए,
सिंहासन पर उन्हें स्थापित कर, नंदीग्राम में बस गए।

भाग III – नंदीग्राम की प्रतीक्षा

नंदीग्राम में रहते, वनवास के समान, खाते कंद-मूल,
भूमि खोद गड्ढे में सोते, प्रतिक्षण चुभे, प्रतीक्षा का शूल।
शत्रुघ्न सँभालते राज-काज, भरत को समाचार सब कहते,
राजमहल की शय्या छोड़कर, सदा पत्थर पर शयन करते,
अयोध्या का राज्य किसी की, लालसा का विषय नहीं है,
लेकिन अपने कर्तव्यपालन धर्म में, कोई भाई पीछे नहीं है।

संजीवनी पर्वत लिए, उड़ते हनुमान, भरत के बाण से गिरे,
कथा सुन भरत ने कहा, बाण पर बैठ, शीघ्र लखन के पास चलें।
चौदह वर्ष की प्रतीक्षा पूरी हुई, वनवास का अंतिम दिन है,
भरत व्याकुल हो रहे, अब विछोह का हर क्षण कठिन है।
विप्र-वेश में आए हनुमान, भरत जी! चिता नहीं, अब महल सजाएँ,
प्रभु राम आज आ रहे हैं, आप अब स्वागत के लिए, दीप जलाएँ।

इस शुभ संदेश का ऋण, चुका सकूँ, ऐसा कुछ, मेरे पास नहीं,
तुम मुझे सदा, राम सम प्रिय रहो, यही बात, मेरे मन ने कही।
राम आए, पुष्पक विमान से, जानकी और लक्ष्मण के साथ,
अंगद, सुग्रीव आदि वानर, लंकाराज विभीषण भी आए आज।
अवध के हर घर में दीप जले, जगत में दीपावली की परंपरा बनी,
इसी तिथि को लक्ष्मी प्रकटीं समुद्र से, लक्ष्मी पूजन की प्रथा बनी।

भरत की सेना ने, मामा युधाजित संग, गन्धर्वों पर विजय पाई,
तक्ष-पुष्कल पुत्रों के संग, नगर बसाए, तक्षशिला व पुष्कलावती।
राम की सेवा में रहे, राम के साथ ही प्रयाण किया,
जब राम ने जल समाधि हेतु, सरयू में प्रस्थान किया।

भाग IV – प्रेम जो माँगता नहीं

क्या आप जानना चाहते हैं, इस कथा का मर्म,
कैसे कथा बता रही, आपको गृहस्थ का धर्म।
भरत है जीवात्मा, अनंत प्रतीक्षा परमात्मा की,
नंदीग्राम है गृह, शत्रुघ्न रूपी संयम ने सहायता की।
हनुमान संत रूप में आकर, देते हैं जीवात्मा को संदेश,
अहंकार की चिता सजाकर, होता परमात्मा में प्रवेश।

सिंहासन है पद, धन, व्यवसाय, प्रतिष्ठा और संसार,
पादुका रूपी उपदेश के सहारे, होता भवसागर पार।
कैकयी रूपी प्रारब्ध से, अर्थ और धन मिल जाता यहाँ,
कर्तव्य धर्म का पालन, करें तो मोक्ष भी मिलता यहाँ।
मंथरा रूप से संसार, हर दिन मेरा-मेरा सिखा रहा,
मांडवी रूपी निष्ठा से, मन सदा राम में लगा रहा।

निषादराज का संदेह, और लक्ष्मण का क्रोध,
लेता भक्त की परीक्षा, और जग जाता है बोध।
भरद्वाज जैसा मार्गदर्शक, जब मिल जाता है,
काँटे हटा देती वनदेवी, पता भी नहीं चलता है।
न्यासी के रूप में, राम का राज, हमें यहाँ सँभालना है,
निरंतर प्रगति होती रहे, कर्तव्य का पालन करना है।

संतों ने भरत के प्रेम को, गोपी प्रेम के समान कहा,
भरत-चरित्र का फल, मानस में तुलसी ने कहा।
आदर सहित जो सुने कथा, राम चरण में प्रीति बढ़े,
भव-रस से वैराग्य जगे, सहज मुक्ति का मार्ग मिले।

भाग V – भरत और हम

आज पिता का घर बाँटने को, भाई भाई से लड़ रहे,
समझ काम नहीं करती, न्यायालय में वाद कर रहे।
हर व्यक्ति अपना हिस्सा माँग रहा, अपना काम गिना रहा,
सिंहासन पर पादुका विराजे, किसी को ध्यान न आ रहा,
मंथरा की सलाह से निर्णय, प्रारब्ध का श्रेय स्वयं ले रहा,
अपना कर्तव्य पालन भूलकर, अन्य का कर्तव्य गिन रहा।

राम खेल में दाँव हारकर, छोटे भाई का ख्याल करे,
भरत के मन में ग्लानि, जुआरी जैसे, अपने दाँव का ध्यान करे।
यदि हम राम राज के समान, जो मिला उसे धरोहर समझें,
गृहस्थ में रहकर तप करें, अपने धर्म का पालन करें।
मोबाइल पर सौ मित्र बने, अपने भाई का फोन नहीं आता,
भरत चौदह वर्ष दूर भाई से, पर प्रति पल था, भाई से नाता।

इस दीपावली हम सब, एक प्रेम का दीपक जलाएँ,
अपने भाई से मिलकर, उल्लास से त्योहार मनाएँ,
भरत के समान अपने भाई की, इच्छा का सम्मान करें,
राम के समान अपने भाई को, सदा आदर प्रदान करें।
पादुका सिर पर धारण करें, मन में रहे राम का नाम,
परिवार में सब से मिलें, और करें राम को प्रणाम।

🎬 यह कविता कवि के स्वयं के स्वर में, चित्रों और संगीत के साथ देखें: https://youtu.be/pGziPWAqtS4

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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