कविता: एम. एल. गुप्ता
भाग-1
चक्रवर्ती दशरथ थे महान बलशाली, अति उदार हृदय,
युवावस्था में मित्र बने, गृध्रराज जटायु, अति निर्भय।
कौन थे गृध्रराज जटायु और क्या था उनका बलिदान,
सतयुग में जन्मे गिद्ध रूप, त्रेता में किया कार्य महान!
सूर्य सारथि अरुण, और गिद्ध माता श्येनी की सन्तान,
देव दानव के पिता कश्यप, अरुण, गरुड़ उनकी सन्तान।
दक्ष की अनेक पुत्रियों से हुआ ऋषि कश्यप का विवाह,
इनसे सृष्टि क्रम बना, पशु, पक्षी, जलचर, देव व दानव।
दक्ष पुत्री विनता का भी, विवाह हुआ कश्यप ऋषि से,
विष्णुवाहन गरुड़ और सूर्यसारथि अरुण, पुत्र हैं इनके।
कश्यप-पत्नी ताम्रा की पुत्रियाँ, बनीं पक्षी समूह की माता,
एक पुत्री श्येनी बनी श्येन, गिद्ध, बाज आदि की माता।
श्येनी और अरुण से उत्पन्न हुए, संपाति और जटायु,
कहानी है सतयुग की, जब असीमित होती थी आयु।
इस प्रकार से स्पष्ट हुआ, जटायु का कुल सम्बंध देवों से,
जटायु और अग्रज संपाति दोनों, इठलाते थे देव दर्प से।
एक बार सोचा भाइयों ने, सूर्य के निकट जाकर देखते हैं,
लेकिन सूर्य मंडल में प्रवेश होने से, पंख झुलसने लगते हैं।
बड़ा भाई संपाति, अनुज की, रक्षा का विचार करता है,
अपने भाई के पंखों की रक्षा हेतु अपने पंख फैला देता है।
विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी में, संपाति गिर गया पंख विहीन,
निशाकर ऋषि ने रक्षा की, संपाति रहता ध्यान में लीन।
ज्योतिषियों ने दशरथ को कहा, अवध में बारह वर्ष अकाल,
भूख से मर जाएगी प्रजा सारी, यदि पड़ गया ऐसा अकाल।
शनि प्रविष्ट होगा रोहिणी नक्षत्र में, कैसे प्रजा की रक्षा हो?
राजा दशरथ ने सोचा शनि की गति रोक दूँ तो अच्छा हो!
यौवन मद में चल दिये, शनि ग्रह की गति रोकने के लिए,
शनि की वक्र दृष्टि पड़ी, राजा का रथ एवं अश्व नीचे गिरे।
जटायु, वहाँ से गुजर रहे थे, देखा, अपने पंख फैला दिए,
रथ नष्ट हुआ, राजा दशरथ और अश्व, सुरक्षित बचा लिए।
दशरथ ने दिया धन्यवाद जटायु को जीवन रक्षा के लिए,
दोनों ने मिलकर प्रण लिया अग्नि समक्ष मित्रता के लिए।
सदैव रक्षा करेंगे हम दोनों, एक दूसरे के परिवारों की,
मित्रता सदैव निभाएँगे, अपनी जान पर खेलकर भी।
देवासुर संग्राम में दशरथ के साथ जटायु भी लड़ते थे,
माँ कैकयी सुनाती थी श्री राम को, युद्ध कैसे होते थे।
जटायु करता रहा भ्रमण, युवावस्था में, जीवन का आनंद,
लेकिन समय प्रबल, आई वृद्धावस्था, गति होने लगी मंद।
दशरथ की आज्ञा से आ गए, राम-लक्ष्मण-सीता वन में,
पंचवटी पहुंचकर जटायु, मिल गये तीनों को जंगल में।
अपने कुल का परिचय दिया, राम को अति स्नेह किया,
मित्र दशरथ का परिवार हो तुम, मुझे अतीव हर्ष हुआ।
रहने लगे तीनों पंचवटी में, जटायु के साथ कुटी बनाई,
खर दूषण का वध करना पड़ा, शूर्पणखा ने नाक कटाई।
मारीच स्वर्ण मृग बना, राम के पीछे लक्ष्मण भी गए,
कुत्ते की भांति भड़िहाई से, राक्षस सीता को ले गए।
परब्रह्म लीला कर रहे, देखो साधारण मानव के समान,
माँ सती भी मोहित हो गई , भक्त करते राम को प्रणाम।
भाग-2
सीता का हरण करके जा रहे, रावण को जटायु ने देखा,
सीता को बिलखते देख, क्रोधित होकर रावण से कहा।
चोर, निर्लज्ज, शर्म कर, तू अबला पर, जुल्म कर रहा है,
राजा है या अपराधी, अन्याय की ओर कदम बढ़ा रहा है।
अयोध्या की राज वधु सीता, प्रजा के लिए माता समान है,
इस महापाप का भागी बन रहा, तू महापापी के समान है।
हमला किया, अपनी चोंच से, रथ को विदीर्ण किया,
अश्वों को घायल किया, रावण को धरा पर ला दिया।
रावण लड़ने लगा जटायु से, लातों से, मुष्टि प्रहार से,
गिद्ध भी युद्ध कर रहा, चोंच और पंजों के प्रहार से।
अधर्मी रावण ने अपनी तलवार का सहारा लिया,
अपनी तलवार के वार से, दोनों पंखों को काट दिया।
गृध्रराज जटायु असहाय होकर, धरती पर गिर गए,
सीता को लगा, पितातुल्य सहायक घायल हो गये।
विलाप करने लगी पास बैठ, धन्यवाद कैसे करूँगी?
राम लक्ष्मण को आप बता देना, मैं प्रतीक्षा करूँगी।
राम लक्ष्मण वन में भटक रहे, सीता की तलाश करते हुए,
आए जटायु के पास, देखा, घायल पड़े प्रतीक्षा करते हुए।
जटायु ने सर्वप्रथम बताया कि, रावण ने सीता को चुराया,
लेकर गया है दक्षिण में, लंका की ओर, मैं नहीं रोक पाया।
राम ने कहा, आपने पिता के समान हमारी सदैव रक्षा की,
सीता की आज आपने, अभिभावक के समान रक्षा की।
घावों को अच्छा कर, आपके जीवन की रक्षा करता हूँ,
आप विश्राम करें, मैं आपकी सेवा-सुश्रुषा करता हूँ।
हे राम! आपके दर्शन के लिए, ऋषि मुनि तप करते हैं,
पर अंतिम समय में दर्शन, आपकी कृपा से मिलते हैं।
इतना उपकार करो, मुझे जीवन से अब त्राण मिले,
कृपा आपकी बनी रहे, आपके चरणों में स्थान मिले।
राम ने जटायु का अपने पिता के समान सम्मान किया,
अपने हाथों से चिता बनाई, और अंतिम संस्कार किया।
स्मरण सदैव रहेगा, राम के प्रथम सैनिक का बलिदान,
जटायु के बलिदान को और राम को करते रहो प्रणाम।
संपाति से ऋषि ने कहा था, राम सीता को ढूंढ़ते आयेंगे,
तुम सहायक बनना तलाश में, पंख पुन: आ जायेंगे।
अनंत प्रतीक्षा करता रहा, संपाति शबरी के समान,
भक्त के भाव की रक्षा हेतु, अवतरित होते श्री राम।
जब आए हनुमान, सीता की तलाश में, वानरों के साथ,
संपाति ने ही बताया, सीता है लंका में, रावण के पास।
संपाति बोला, पुत्र सुपार्श्व ने, मेरा भोजन लाते हुए,
देखा आकाशमार्ग से, रावण को सीता को ले जाते हुए।
अनुज जटायु का बलिदान सुन, संपाति ने अश्रु बहाए,
राम-काज में सहायक बना, तो फिर से पंख उग आए।
त्रेतायुग की कथा का, कलियुग से भी संबंध है,
आज भी रावण घूम रहे, बदला केवल प्रबंध है।
मर्यादा की बात करें, पर रिश्ते भूल रहे हैं जन,
रिश्ते-नाते तार-तार हो रहे, बिखर रहे हैं मन।
युवा सोचते हैं, क्यों सम्मान करें, माता-पिता के मित्रों का,
अधिक ध्यान रहता है, अपनी जवानी के दोस्तों का,
मित्रता का सम्बंध सदा, कभी भी कर सकता है काम,
इसलिए अपने बड़ों को और राम को करते रहो प्रणाम।
🎬 यह कविता कवि के स्वयं के स्वर में, चित्रों और संगीत के साथ देखें: https://youtu.be/F93PY4BNWuI
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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