Tuesday, November 3, 2026

रामायण में दो धाराएँ – नीति और भक्ति | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

रामायण में दो धाराएँ, नीति और भक्ति की हैं,
राक्षस भी चुनते नीति को, संतों ने भक्ति की है।

शूर्पणखा का नीति उपदेश, कितना सुंदर दिखता है,
राज्य नीति के बिना, और धन धर्म के बिना,
अपने सत्कर्म प्रभु को, समर्पित किए बिना,
होता सब है मात्र श्रम, जैसे विद्या विवेक बिना,
नष्ट होते हैं ये सब,
सुनो इनके कारण अब,
संग से संन्यासी और गलत सलाह से राजा,
अभिमान से ज्ञान और मदिरा पान से लज्जा,
प्रीति में नम्रता नहीं होना,
और गुणवान का मदांध होना।
शत्रु, रोग, अग्नि, पावक, सर्प और स्वामी,
इन्हें छोटा समझने की, भूल नहीं करते ज्ञानी।
नीति ज्ञान से कुछ हुआ नहीं, हुआ काम का वास,
परिणाम है सीता हरण और संपूर्ण कुल का विनाश।

मंदोदरी समझाती रावण को, दूत भी इतना बलशाली,
सब राक्षस भयभीत हुए, अकेले लंका जला डाली,
शीत ऋतु की रात्रि जैसी, सीता आई है लंका में,
लौटाए बिना ब्रह्मा और शिव भी, आयेंगे नहीं हित में।
सभा में जाने पर रावण को, विभीषण कहे नीति उपदेश,
बुद्धिमान माल्यवान हाँ कहे, वो भी चाहे सुरक्षित देश।
मंदोदरी पुनः समझाती, राम की महिमा उसे बतलाती,
रावण के सिर पर मौत नाच रही, नीति समझ नहीं आती।

प्रहस्त ने भी समझाया, पुत्र ने पिता को याद दिलाया,
वानर जब पहले आया था, राक्षसों ने क्यों नहीं खाया?
नगर जला दिया उसने, ये व्यर्थ गाल फुला रहे,
आपकी हाँ में हाँ मिलाते हैं, सब चापलूसी कर रहे।
लौटा दो सीता को उनको, यदि उसके बाद भी युद्ध हो,
हम सब मिलकर लड़े देशहित, परिणाम भले विध्वंस हो।
रावण स्वयं नीति का ज्ञाता, उपदेश क्या समझ उसे आता?
परिणाम हुआ युद्धभूमि में, अंतिम समय उसका भी आता।
लोककथाओं में रावण ने भी लक्ष्मण को नीति उपदेश दिया,
इससे होता है स्पष्ट, नीति से जीवन सार्थक नहीं हुआ।

भक्ति की राह संत चुनते, वाल्मीकि, शरभंग और भारद्वाज,
हनुमान, शबरी और भरत, राम भक्ति के उदाहरण आज।
नीति से मानव का भला, नहीं हो पाता है,
भक्ति से ही मानव, संत कभी बन पाता है।
राक्षस भी नीति के ज्ञाता होते, भला किसका कर पाते हैं,
अहंकार और मद से भरे, अपना भी विनाश कर जाते हैं।
नीति से सांसारिक सफलता, मनुष्य भले उत्साहित हो,
मानव जीवन सार्थक होता, जब भक्ति से परिचालित हो।

नीति ज्ञान सभी मानव, अवसर पाकर सुनाते हैं,
अपने को धर्मात्मा मानते, और ज्ञानी कहलाते हैं।
सत्य यही कि राक्षस वृत्ति, निरंतर बढ़ती जाती है,
सम्पत्ति को समृद्धि मानने की प्रवृत्ति बन जाती है।
मानव जीवन को सार्थक करने का, हो सदा प्रयास,
करे राम को प्रणाम, और करें भक्ति की आस।
भक्ति के लिए कोई उपाय नहीं है इस धरा पर,
पाता भक्ति वही, राम करते हैं कृपा जिस पर।
करते रहो कर्त्तव्य अपना, लेते रहो राम का नाम,
नीति, धर्म पालन करो, करते रहो राम को प्रणाम।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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