Tuesday, November 3, 2026

देवात्मा हिमालय

कविता: एम. एल. गुप्ता

प्रकृति की गोद में
जब जगत् हो सामने
उठते हैं निरंतर
संकल्प और विकल्प मन में,
यहाँ नूब्रा घाटी, लद्दाख़ में,
प्रकृति की गोद में,
मन स्वाभाविक रूप से हो रहा है शांत,
सामने हिमालय की अचल प्रेरणा से,
बहती हुई नदी की रसधार से,
रेतीले तट की सुरम्यता से,
मन लौट चला है अपने ही भीतर,
लेना ही नहीं चाहता कुछ और,
यह आनंदित, प्रफुल्लित मन
मेरा ही तो है !
लगता है लौट गया हूँ अपने में,
अवसर है यहाँ अपने से मिलने का !

प्रकृति है माँ के रूप में आँचल फैलाए हुए,
आ अपनी चिंता और तनाव मिटा,
चुप हो जा, बैठ जा, मेरी गोद में लेट जा !
इसीलिए हिमालय के आस पास,
बौद्ध धर्म को अपनाया गया,
ध्यान का मार्ग जनता में अपनाया गया,
मैदान में व्यक्ति लोभ के वशीभूत है,
उसके मन में जागती लूट और भूख है,
देवात्मा हिमालय आज भी अपनी गोद में,
प्रकृति को समेटे है अपने शुद्ध रूप में !

यहाँ लगता है,
यह है सुपरिचित वातावरण,
जाने कितने जन्मों के आवरण,
लेकिन अभी भी लगता है,
यह अपने घर जैसा,
माँ की गोद जैसा प्यारा
और जन्म जन्मांतर की तलाश जैसा,
लगता है यहाँ जीवन है,
जीने के लिए !
और वहाँ लगता है,
जीवन है कुछ करने के लिए !

— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta

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