Tuesday, November 3, 2026

धनुष टूटे जब अहंकार का | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

धनुष टूटे जब अहंकार का, तब ही करो विवाह,
अहंकार यदि बना रहा, हो ना सकेगा निबाह!
यह नाजुक रिश्ता जब बनता है, राम खड़े रह जाते हैं,
सीता के हाथ वरमाला लिए, ऊँचे नहीं जा पाते हैं!
समस्या के हल के लिए परिवार जन आगे आते हैं,
लक्ष्मण आकर भाई के, चरणों में झुक जाते हैं!
प्रेम विवश राम, लक्ष्मण के लिए झुक जाते हैं,
सीता के हाथ तुरंत, वरमाला के साथ बढ़ जाते हैं!
शोभित होती है जयमाला, सीता राम मुस्कुराते हैं,
करतल ध्वनि के मध्य, देवता पुष्प बरसाते हैं!

पहुंचे अवध, छाई खुशी, हुआ स्वागत, उमड़ा प्यार,
कैकयी के प्रिय राम को, मिला कनक भवन उपहार!
युवराज बना दूँ राम को, उठा दशरथ के मन में विचार,
लेकिन जगाया मंथरा ने, कैकयी के मन में अहंकार।
मति भंग हो गई, ममता जागी, अब नहीं रहा विचार,
कैकयी सो गई कोप भवन में, भूल राम से प्यार।
राम ने स्वीकार किया सहर्ष, छोड़ अवध, गए वनवास,
अहंकार ने सुहाग छीना, सीता सौमित्र गए वन साथ।

शूर्पणखा का अहंकार, काम के वशीभूत आहत हुआ,
सीता की सुंदरता सुन, दशानन काम से पीड़ित हुआ।
चल दिया सीता हरण को, कपटी बना, निर्लज्ज हुआ,
लंका दहन, वानर राक्षस युद्ध, सकुटुम्ब नष्ट हुआ।
सीख सुन नहीं सका, समझा रहे मंदोदरी, माल्यवान,
मारीच, विभीषण, कुंभकर्ण, कालनेमि, अंगद, हनुमान।
सीख दी लक्ष्मण को, शत्रु एवं रोग नहीं होते हैं कमजोर,
अपने राज सदा गुप्त रखें, अपने घर में भी होते हैं चोर।

परिवार की मर्यादा, शील, स्नेह, कुल परम्परा का सम्मान,
अपने घर में हो सीधापन, आगंतुक अतिथि को दें मान।
राज्य ठुकराया भरत ने, करे राम पादुका, अवध का राज,
सम्मान राम से भी अधिक, भरत का होता आज।
जीवन को राम काज में, कर दे जो उत्सर्ग,
कहलाये हनुमान वही, पाते जीवन में अपवर्ग।
हम सब भी मुक्त हो अहंकार से, जाग्रत हो अस्मिता का बोध,
करें राम को प्रणाम, जीवन में ना रहे, काम, लोभ या क्रोध।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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