कविता: एम. एल. गुप्ता
साँसों पर पहरा है।
ज़ख़्म कोई गहरा है।
मुझे ख़्याल रहा कि कोई बुला लेगा मुझे,
अचानक सूनापन छा गया
लगा जैसे कोई सो गया !
साँस थमने लगी और जी बैठने सा लगा।
क्या होने वाला है? मन काँपने सा लगा।
ख़बर आई कि हमला हुआ है
वीर जवानों के क़ाफ़िले पर,
किया है आत्मघाती हमला,
माँ भारती के रक्षकों पर !
गिनती बढ़ती गयी,
शव बन गए हँसते मुस्कुराते
खिलखिलाते जवान,
अभी उसने बताया था कि
कैसे उसकी गर्भवती पत्नी ने किया था मुश्किल से विदा,
बूढ़ी माँ ने कहा था कि बेटा जल्द ही आकर मिलना।
कैसे बच्चे कर रहे थे प्यारी प्यारी बातें,
कैसी बीती थी पत्नी के साथ मधुर अंतरंग रातें।
इतने में एक धमाका हुआ,
चिथड़े उड़ने लगे, सब धुआँ धुआँ हो गया।
पता भी न चला, कैसे संसार लुट गया,
कितनी कोख उजड़ गयी, कितना सिंदूर मिट गया।
अब हम दे रहे हैं चिता को आग,
फ़ौजी सम्मान के साथ,
लेकिन मन है क्षुब्ध, क्रोधित,
बदले के लिए आक्रोशित,
ज़ख़्म यह गहरा है,
साँसों पर पहरा है।
— एम. एल. गुप्ता | YouTube: @mlgupta
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