कविता: एम. एल. गुप्ता
हे विष्णु! मेरे राम का आज, युवराज हेतु अभिषेक हो,
महाराज दान इतना करें, कि प्रसन्न याचक प्रत्येक हो।
रात भर प्रार्थना की माँ कौशल्या ने, प्रातःकाल राम आए,
चरण छुए, आसन पर नहीं बैठे, कुश का आसन माँगने लगे!
मुझे पिता ने कानन राज दिया, मैं वन में रहूँगा चौदह वर्ष,
थाली गिरी, माँ मूर्छित हुईं, लेकिन राम नहीं विषादग्रस्त।
सत्रह वर्ष से प्रतीक्षा की, राम राजा होंगे, दुःख मिटेगा,
किन्तु विधि का विधान यह कि, पुत्र से भी विछोह होगा?
विवाह से पहले रावण ने हरा, प्रथम संतान से वियोग हुआ,
यज्ञ में खड्ग उठाया, क्या अगले जन्म में, सुख पाया?
यह कथा पूरी सुनेंगे तो, प्रतीक्षा का अर्थ भी जानेंगे,
धीरज कैसे तप बनता है, अपने घर में भी पहचानेंगे।
भाग 1 – तप से राजमहल तक
स्वायंभुव मनु और शतरूपा ने, नैमिष में घोर तप किया,
विधि-हरि-हर की न सुनी, तब परब्रह्म का दर्शन किया।
वरदान में उन्हें पुत्र रूप में चाहा, प्रभु ने तथास्तु कह दिया,
समय आने पर अवध में मनु ने, दशरथ रूप में जन्म लिया।
शतरूपा ही बनीं कौशल्या, दक्षिण कोसल की राजकुमारी,
राम वहाँ के भांजे, आज भी, भांजे के पाँव छूते नर-नारी।
आनन्द रामायण कहती, रावण ने ब्रह्मा से जान लिया,
कौशल्या का पुत्र तुम्हारा काल, सुनकर उसने ठान लिया।
कोसल पर आक्रमण कर, कौशल्या का हरण किया,
कौशल्या को एक संदूक में, डालकर समुद्र में बहा दिया।
रावण ने आकर सरयू में, दशरथ की नाव को डुबो दिया,
बहते हुए दशरथ को, बहता संदूक भाग्य से मिल गया।
बहते हुए संदूक में कौशल्या, अज्ञात प्रतीक्षा करती रही,
जीवन सुरक्षित, भावी अनिश्चित, राम-नाम जपती रही।
ऋषियों के कौतुक से, दशरथ-कौशल्या का मिलन हुआ,
दशरथ ने द्वीप पर कौशल्या से, गंधर्व विवाह कर लिया।
ब्रह्मा ने समझाया रावण को, विधि का विधान मान लिया,
दशरथ और कौशल्या को, अवध के महलों में जाने दिया।
पटरानी बनीं, कहते हैं, पहली संतान बेटी शांता हुई,
अंग-नरेश रोमपाद को सौंपी, माँ प्रतीक्षा करती रही।
पर बेटा न हुआ बरसों तक, राजा ने और विवाह किए,
कैकयी प्रिय रानी बनीं, बड़ी रानी ने व्रत में दिन जिए।
सौतों के कटु वचन सुने, वेद-पाठ और हवन न छोड़ा,
व्रत से देह अति दुर्बल हुई, पर श्रद्धा का धागा न तोड़ा।
अश्वमेध में, अश्व पर तीन प्रहार, कौशल्या ने किए,
पटरानी थीं, यज्ञ के विधि-विधान, सभी संपूर्ण किए।
फिर शांता के पति ऋष्यशृंग ने, पुत्रेष्टि यज्ञ कराया,
जिसे बेटी दी थी, उसी ऋषि से, आधा पायस माँ ने पाया।
रामनवमी को प्रकटे श्रीराम, संग कैकयी के भरत हुए,
छोटी रानी सुमित्रा के यहाँ, लक्ष्मण-शत्रुघ्न प्रकट हुए।
बाल-लीला की प्रभु ने, माता का मन नहीं भर पाया,
विश्वामित्र के साथ गए, विवाह का समाचार आया।
चारों बहुएँ आईं, घर भर गया, आनंद चहुँ दिशि छा रहा,
राम के युवराज तिलक का, समाचार हर्षित कर रहा।
लेकिन प्रातः पता चला, राम को वनवास मिला,
माता कैकयी ने राज्य, भरत के लिए माँग लिया।
भाग 2 – चौदह वर्ष
जब चेतना आई, माँ बोलीं, पुत्र! मैंने राजा से अपमान सहा,
कैकयी की दासी को अवध में, मुझसे अधिक मान मिला।
मुझे साथ ले चलो वन में, तुम्हारे बिना अब जी न सकूँगी,
बछड़े के पीछे गाय की भाँति, मैं भी साथ चलती रहूँगी।
राम ने कहा, पिता की सेवा, इस घड़ी आपका धर्म है,
मन में सोचा, वनवास ही, कैकयी के त्याग का मर्म है।
बड़ी माता थीं, चाहतीं तो, उनकी आज्ञा से राम रुक जाते,
पर माँ जानती थीं, पुत्र के धर्म में, ममता के बंधन न आते।
बोलीं, केवल पिता कहते, तो कहती, माँ बड़ी है, मत जाओ,
पर माँ कैकयी ने भी कहा है, तो वन को अवध मानकर जाओ।
सीता को रखा पलक के समान, धरती पर पग न धरने दिया,
सत्रह वर्ष की प्रतीक्षा के बाद, विधि ने सुदिन भी दुर्दिन किया।
हे विधाता! अब क्यों नया, चौदह वर्ष का कष्ट है दिया?
क्या मैंने पूर्वजन्म में, गाय से बछड़े को अलग था किया?
आँसू पोंछ, आचमन कर, माँ ने स्वस्ति-मंत्र पढ़े,
"धर्मस्त्वामभिरक्षतु", जिस धर्म को पालो, वही रक्षा करे।
दुःख में दशरथ से कह डाला, आपने मेरा राम वन भेजा,
राजा ने हाथ जोड़े, तो माँ ने क्षमा माँग, पति को सहेजा।
उसी रात राजा ने, श्रवण-वध का, पाप सुनाया,
राम-राम कहते, पुत्र-वियोग में, प्राणों को गँवाया।
पति का शव गोद में ले, कैकयी से कठोर वचन कह दिए,
"निष्कंटक राज भोगो!" सती होने चलीं, मंत्री रोकते रहे।
भरत लौटे, रोते हुए आए, माँ ने पहले संशय किया,
भरत ने शपथें खाईं, तो माँ ने उन्हें गले लगा लिया।
राजा चले गए, राम वन में, बड़ी रानी ने रनिवास सँभाला,
ऊर्मिला, माण्डवी, श्रुतकीर्ति, हर बहू को बेटी-सा पाला।
आधी रात श्रुति रोती मिलीं, तो पालकी ले खोजने निकलीं,
शिला पर सोते शत्रुघ्न को उठाया, अपनी भी आँखें भीगीं।
जिसको कठोर वचन कहे थे, उस कैकयी के सूने द्वार,
बड़ी रानी, कभी-कभी जातीं, बाँट लेतीं उसका भी भार।
प्रतीक्षा पूरी हुई, राम लौटे, माँ ने बेटे को हृदय से लगाया,
उसी दीपक से आरती की, जो प्रतीक्षा में हर साँझ जलाया।
मन में कर रही विचार, बार-बार राम-लखन को निहारें,
इतने सुकुमार, मेरे बालकों ने, कैसे लंका के वीर मारे?
अब मन में न कोई शिकायत, न कैकयी से, न भाग्य से,
प्रतीक्षा तप बन चुकी थी, राम मिले उसी सौभाग्य से।
भाग 3 – प्रतीक्षा क्या पूरी हुई?
अब पौत्रों की आस जगी, शीघ्र, राम-सीता की गोद भरे,
लोक-निंदा ने, सीता को वन भेजा, माँ के सपने बिखरे।
वाल्मीकि-आश्रम में जन्मे, लव और कुश, दो राजकुमार,
बारह वर्ष दादी अनजान रहीं, फिर एक नई प्रतीक्षा का भार।
कवि भवभूति ने लिखा, माँ पहुँचीं, वाल्मीकि के आश्रम-द्वार,
एक बालक में राम का मुख देखा, सीता की छवि बार-बार।
अश्वमेध में लव-कुश ने, सभा में रामायण गाई,
सीता धरती में समाईं, पौत्र मिले, पर बहू न आई।
वाल्मीकि कहते, समय बीता, पहले कौशल्या ने देह त्यागी,
फिर सुमित्रा, कैकयी भी, दशरथ संग स्वर्ग की हुईं भागी।
जिसने जीवन भर धरती पर, राम की राह देखी बार-बार,
सरयू से जब राम चले, साकेत में माँ खड़ी थीं तैयार।
लोक-कथा यह भी कहती, द्वापर में वही यशोदा बनीं,
जो शिशु-लीला अधूरी थी, गोकुल में जी भर देख सकीं।
भगवान की माँ होकर भी, क्यों जीवन भर राह तकी?
क्या श्रद्धा का यही फल है, कि वह प्रतीक्षा में ही थकी?
संतों ने कहा, कौशल्या है, हमारे भीतर की श्रद्धा,
और राम हैं परम आनंद, जो मिलते, जब मन रहे सधा।
दशरथ का महल है संसार, जहाँ श्रद्धा उपेक्षित रहती,
इच्छाएँ सौतों-सी आगे आतीं, श्रद्धा पीछे राह तकती।
अहंकार का रावण, श्रद्धा को संदूक में बंद करता,
विधि का विधान सागर से, संसार में पुनः पहुँचा देता।
पर श्रद्धा दुर्बल नहीं होती, समय पड़े तो खड्ग उठाए,
सत्य कहे, ममता से ऊपर, धर्म रखे, पुत्र को वन पठाए।
प्रतीक्षा का अर्थ नहीं, हाथ पर हाथ धरे बैठना,
भरत को गले लगाना है, बिखरे घर को फिर से समेटना।
गीता में कृष्ण ने भी कहा, "तांस्तितिक्षस्व भारत",
सुख-दुःख आते-जाते हैं, धीरज से रहें कर्मरत।
जो सबसे कम पाती दिखी, उसे ही सबसे अधिक मिला,
त्रेता में जन्म दिया राम को, द्वापर में कान्हा गोद में खिला।
भाग 4 – वर्तमान
आज भी कितनी कौशल्याएँ, सूने घर में राह तकती हैं,
बेटा बेंगलुरु, बेटी अमेरिका, फ़ोन पर आँखें टिकी हैं।
हर वर्ष कहता, अगली दिवाली, इस बार भी छुट्टी कम,
वीडियो पर पोते को देखा, उसी को छूकर, जी लेते हम।
आप भी किसी कौशल्या के राम हैं, उसकी राह को लंबा न करें,
जिस दिन आप घर लौटेंगे, उस दिन उसकी देहरी पर दीप जलें।
जो प्रतीक्षा में बैठे हैं, वे अपना तप निरंतर करते रहें,
सत्संग, सेवा, स्वाध्याय से, सूने दिनों को सार्थक करें।
घर में उपेक्षित हों यदि, अपने मौन को नियति न मानें,
कौशल्या-सा सत्य कहें, अपनी शक्ति को पहचानें।
कौशल्या-सी श्रद्धा हो, तो सदा लौटकर आते हैं राम,
श्रद्धा का दीपक जलता रहे, करते रहें राम को प्रणाम।
🎬 यह कविता कवि के स्वयं के स्वर में, चित्रों और संगीत के साथ देखें: https://youtu.be/xwPiDnyORDI
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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