कविता: एम. एल. गुप्ता
सुना लक्ष्मण से माता ने, वनवास जा रहे हैं सिया-रघुनाथ,
अब राज करेंगे भरत यहाँ, लखन भी जाना चाहते हैं साथ।
संकोच में पड़े हैं सौमित्र, माता जाने की आज्ञा दे पाएँगी?
या पुत्र-मोह में मेरा आज, प्रिय भ्राता से वियोग कराएँगी?
न कोई आज्ञा, न धर्मानुशासन, लखन करे राम का अनुगमन,
क्या आज सुमित्रा तोड़ सकेंगी, अपने पुत्र से मोह का बंधन?
क्या अपने पुत्र का पालन, स्नेह के कारण ही करते हैं?
क्या परिवार में विवेक से निर्णय, मोह के ऊपर होते हैं?
क्या आज भी माता, अपने पुत्रों को, ऐसे विदा देती हैं?
कथा सुनें और जानें कि, ये माँएँ, राष्ट्र को जीवन देती हैं।
भाग 1 – जो देती रहीं
काशी की राजकुमारी, अवध की रानी, न पटरानी, न राजा की प्रिया,
कौशल्या की सेवा, कैकयी से स्नेह, नाम सुमित्रा, सबको मित्र किया।
पुत्रेष्टि यज्ञ से पायस आया, आधा कौशल्या, चौथाई कैकयी ने पाया,
शेष भाग के दो हिस्से कर, राजा ने दोनों रानियों को थमाया।
कौशल्या-कैकयी ने प्रसन्न मन से, अपना भाग सुमित्रा को दिया,
इसी पायस से जन्मे लक्ष्मण-शत्रुघ्न, अनुसरण राम-भरत का किया।
माँ! भ्राता राम वन जा रहे, चौदह वर्ष, जानकी भी संग,
आज्ञा दें तो मैं भी जाऊँ, सेवा करूँ, रहूँ अंग-संग।
सुनकर सुमित्रा सहम गईं, जैसे दावानल में हरिणी घिरी,
मन सदा राम को समर्पित, वियोग के दुःख से आँखें भरीं।
लेकिन सबसे विवेकी रानी ने, संकट देख स्वयं को समझाया,
कुअवसर जान, धैर्य रख बोलीं, जब लक्ष्मण ने शीश झुकाया।
लखन का माथा सूँघ, आशीष दिया, पुत्र! जाओ, जाओ!
सीता और राम की सेवा में कभी, मन में प्रमाद न लाओ।
पुत्र! अब माता वैदेही हैं, पिता राम, जो सब भाँति स्नेह करें,
अवध वहीं है, जहाँ राम रहें, दिन वहीं, जहाँ सूर्य प्रकाश भरे।
सीता-राम यदि वन जाते हैं, तो अवध में तुम्हारा काम नहीं,
गुरु, पिता, माता, भाई, स्वामी, सब नाते राम से, और कहीं नहीं।
जिसका पुत्र राम-भक्त हो, वही माता सच में पुत्रवती,
राम-विमुख पुत्र जनना व्यर्थ, यही है मेरी दृढ़ मति।
दूसरा कोई कारण न खोजो, तुम्हारे ही भाग्य से राम वन जाते,
सब पुण्यों का फल यही, जो सिय-राम चरण में प्रीति पाते।
राग, रोष, ईर्ष्या, मद, मोह, स्वप्न में भी इनसे दूर रहो,
वन में राम को क्लेश न हो, ऐसी सेवा, पुत्र! तुम करो।
रघुकुल की सनातन रीति, दान, यज्ञ और रण में देह-त्याग,
भ्राता-सेवा की यहाँ परंपरा, रघुवंशी होना सर्वोत्तम भाग।
बहू ऊर्मिला ने स्वयं चुना, अवध में रहकर सेवा का व्रत,
सास ने उसे हृदय से लगाया, समझ गईं बहू का मनोरथ।
रथ गया तो कौशल्या ने, रो-रोकर महल गुँजाया,
जिसका अपना पुत्र भी गया, उसी सुमित्रा ने समझाया।
दीदी! धर्म पर चले हैं राम, यह शोक नहीं, गर्व की बात,
सूर्य उन्हें न तपाएगा, पवन करेगा सेवा दिन-रात।
चंद्रमा शीतल किरणें देगा, लक्ष्मण आगे-आगे रहेंगे,
चौदह वर्ष बाद यही राम, अवध के सिंहासन पर सजेंगे।
सुनकर कौशल्या का शोक, शरद के बादल-सा छँट गया,
अपना दुःख सुमित्रा ने न कहा, पर दीदी का दुःख घट गया।
भरत ने राज न लिया, पादुका रख, नंदीग्राम में तप किया,
शत्रुघ्न ने अवध सँभाला, रात को शिला पर शयन किया।
वनवास पूरा कर, राम संग, सौमित्र माँ के चरणों में झुके,
राम-चरण में प्रीति देख, माँ के आँसू आज न रुके।
भाग 2 – विवेक
आज माँ भी आश्चर्य करेगी, यह कैसी ममता, यह कैसा मन?
जिसे किसी ने वन न भेजा, उसे माँ ने स्वयं दे दिया वन!
सुमित्रा ने यह सत्य पहचाना, जहाँ राम, वहीं अवध होता,
राम बिना अवध में रहना, लक्ष्मण का काँटों में वास होता।
संतों ने कहा, दशरथ की तीनों रानियाँ, हमारे भीतर रहती हैं,
कौशल्या श्रद्धा, कैकयी प्रारब्ध, सुमित्रा विवेक कहलाती हैं।
दशरथ है हमारा जीवन, जो दस इंद्रियों का रथ चलाए,
श्रद्धा से राम प्रकट हों, प्रारब्ध परखे, विवेक राह दिखाए।
श्रद्धा और प्रारब्ध ने भी, अपना भाग विवेक को दिया,
विवेक ने दोनों का मान रखा, किसी से न बैर किया।
लक्ष्मण है हमारी जागृति, जो चौदह वर्ष पलक न झपकाए,
शत्रुघ्न है हमारा संयम, जो राग, रोष, मद के शत्रु हराए।
एक पुत्र राम-ध्वजा का दंड बना, दूजा भरत-दीप की बाती,
सुमित्रा की विवेक-दृष्टि, दोनों को सही जगह पहुँचाती।
कौशल्या ने आज्ञा मानकर, धर्म के आगे ममता झुकाई,
सुमित्रा ने बिन आज्ञा के, स्वयं ही सेवा की राह दिखाई।
श्रद्धा धर्म का पालन करती, विवेक धर्म को पहचानता,
जहाँ किसी ने कहा नहीं, वहाँ भी अपना कर्तव्य जानता।
गीता में कृष्ण ने भी कहा, "व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह",
निश्चय वाली बुद्धि एक ही, जिसमें न कोई संदेह।
जिसका केंद्र राम हो जाए, उसके लिए वन भी अवध समान,
जिसका केंद्र "मैं" ही रहे, उसका थोथा जीवन, महल वीरान।
जो पकड़े वह मोह है, जो सही जगह भेजे वह विवेक,
केंद्र में जब राम रहें, जीवन का हर निर्णय होता है नेक।
भाग 3 – आज की सुमित्रा
आज हम बच्चों से कहते, भाई से आगे निकलो, अंक अधिक लाओ,
सुमित्रा ने पुत्रों से कहा, भाई के संग चलो, सेवा में सुख पाओ।
कोई कहे, मेरा पुत्र फ़ौज में क्यों, सीमा पर कोई और जाए,
अच्छी नौकरी मिले इसे, पास में घर, बस मेरा सुख न जाए।
पर शेखावाटी के गाँवों में, अब भी ऐसी माताएँ होती हैं,
एक पुत्र सीमा पर तैनात, दूजे को भी वही राह दिखाती हैं।
सुमित्रा-सी एक माँ ने, तिलक लगा पुत्र को विदा किया,
देश ही माँ, सीमा ही अवध, पुत्र को यही समझा दिया।
यह विवेक हर घर में चाहिए, जो राह सही हो, उस पर भेजें,
बेटा हो या बेटी, उनके सपनों को, अपनी ममता से न रोकें।
सुमित्रा-सा विवेक हो, तो हर वन बन जाए अवध-धाम,
अपनों को सही राह पर भेजें, करते रहें राम को प्रणाम।
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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