कविता: एम. एल. गुप्ता
कान्हा हँसे और बोले, "माँ! मैं आ गया!"
सुनकर देवकी की आँखें भर आईं,
कारागार का अंत हुआ, बेड़ियाँ टूटीं,
भाग्य का परिवर्तन देखती रह गईं।
जिस भाई के डर से तुझे गोकुल भेजा, उसे तूने मार दिया,
अभी तू ग्यारह वर्ष का बालक है, कैसे यह चमत्कार किया?
भूल गईं देवकी माता, पुत्र मेरा परब्रह्म का अवतार है,
उसके लिए जो सामान्य, अन्य के लिए चमत्कार है।
जन्म के बाद यह वियोग, कितने कष्ट से भोगा मैंने,
तू चला गया यशोदा के पास, क्या मुझे पहचाना तूने?
यह लंबा वियोग किस कारण से, लिखा विधि ने मेरे लिए?
"माँ! तुम भूल गईं, त्रेता में स्वयं माँगा था यह अपने लिए।"
कौन थीं देवकी, त्रेता में किससे हुआ था वियोग?
कैसे करें प्रायश्चित्त, कैसे होता है कर्मों का भोग?
भाग 1 – केकय से अवध तक
केकय-नरेश अश्वपति की बेटी, युधाजित की प्यारी बहन,
बचपन में ही माँ से वियोग हुआ, राजकुमारी पली माँ बिन।
धाय मंथरा ने पाला-पोसा, पिता और भाई का प्यार पाया,
राजा ने अनिंद्य सुंदरी को, युद्ध, रथ, आयुध सब सिखाया।
देवासुर रण में सहायता की, दशरथ ने किया शम्बर से संग्राम,
घायल राजा और रथ की रक्षा का, कैकयी ने किया अद्भुत काम।
राजा अति प्रसन्न हुए, कैकयी को वचन दिया,
अपने मनचाहे दो वर, जब चाहें लेने को कहा।
कैकयी के यहाँ जन्मे भरत, राम अधिक गोद में खेले,
दो नयन सम राम-भरत, पर राम के लिए प्राण भी दे दें।
अभिषेक की बात सुन हर्षित हुईं, मंथरा को गले का हार दिया,
बोलीं, राम ने सदैव मुझे, कौशल्या से अधिक माँ का मान दिया।
फिर वह रात, कोपभवन, दो वर, भरत को राज, राम को वन,
क्यों माँगा, वह लीला का रहस्य, आज सुनें माँ की धड़कन।
माँ जानती थीं, राम नारायण हैं, रावण-वध को अवतार लिया,
लीला में कठिन भूमिका को, अपयश सहित स्वीकार किया।
भाग 2 – कलंक और वियोग
छठी रात को दशरथ ने, पुत्र-विरह में शरीर त्याग किया,
कौशल्या के शब्द-बाणों ने, कैकयी का हृदय चीर दिया।
भरत लौटे, माँ ने सोचा, भरत राज-पद से हर्षित होगा,
नहीं जानती थीं कि इस पुत्र से भी, अब वियोग होगा।
माँ को शत्रु कह दिया, यह घाव क्या कभी भर पाएगा?
राजा कोई बना नहीं, अवध का राज अब कौन चलाएगा?
भरत चले चित्रकूट, तो माताओं संग कैकयी भी चलीं,
नंगे पाँव, सिर झुकाए, पग-पग अपनी पीड़ा में जलीं।
कुटिया पर माताएँ पहुँचीं, राम पहले भेंटे कैकयी से,
चरण छुए, सरल मन से, कभी क्षुब्ध नहीं हुए उनसे।
माँ धरती से कहतीं, फट जा, मुझे अपने में समा ले,
जिस राम को वन भेजा मैंने, वही मुझे हृदय से लगा ले!
एकांत में हाथ जोड़े, राम! विधि ने मेरा सुहाग छीना,
हुई अकेली, पुत्र ने त्यागा, अब कठिन है मेरा जीना।
राम गंभीर हो गए, माँ! शोक न करें, यह सब मात्र लीला है,
मेरे कर्तव्य के लिए आपको, अपयश का हलाहल पीना है।
जो कथा का भेद न जानें, केवल वे ही आपको कोसेंगे,
आप मेरी भक्त हैं माँ, अंत में मुझमें ही आ मिलेंगे।
भरत पादुका ले लौटे, नंदीग्राम में कुटिया छाई,
महल लौटीं अकेली कैकयी, न पति, न पुत्र, न परछाईं।
सबके द्वार पर भीड़ रहती, कैकयी के द्वार पर मौन,
कभी-कभी बड़ी रानी आतीं, बाकी पूछने वाला कौन?
चौदह वर्ष हर साँझ, वियोग में दक्षिण की राह निहारी,
मन में राम, होंठों पर मौन, तिरस्कार की व्यथा भारी।
चौदह वर्ष बीते, दीप जले, राम लौटे, अवध ने दिवाली मनाई,
माताओं की भीड़ में कैकयी, संकोच में पीछे खड़ीं, सकुचाईं।
पर कहते हैं, राम ने सबसे पहले, उन्हीं के चरणों में शीश धरा,
जिसके कारण वन गए थे, उसी का आँचल आँसुओं से भरा।
उस दिन कैकयी हँसीं, रोईं, जैसे बरसों बाद जीवन पाया,
चौदह वर्ष का वियोग दिया, चौदह वर्ष स्वयं ने भी उठाया।
भाग 3 – क्या ऋण चुका?
समय बीता, पहले कौशल्या, फिर सुमित्रा ने देह त्यागी,
अंत समय कैकयी ने भी, राम से अंतिम भिक्षा माँगी।
राम! अगले जन्म तुम्हें कोख में धरूँ, पर पालना और कहीं हो,
जितना वियोग मैंने दिया, उतना ही मेरे भाग्य में भी हो।
राम मुस्कुराए, तथास्तु माँ! द्वापर में आपका पुत्र बनूँगा,
जन्म आपकी कोख से लूँगा, पर गोकुल में जाकर पलूँगा।
लोक-कथा कहती, द्वापर में, वही कैकयी देवकी बनीं,
भाई कंस ने कारा में डाला, छह संतानें आँखों के आगे छिनीं।
आठवें पुत्र कान्हा जन्मे, वसुदेव उन्हें यमुना पार ले गए,
माँग पूरी हुई अक्षरशः, कोख में आए, पालने में न रहे।
ग्यारह वर्ष यशोदा ने देखा, माखन, मुरली, पहला पग,
देवकी ने कारा में गिने, हर दिन, जैसे बीता युग।
और आज मथुरा में कान्हा, माँ की गोद में सिर रख सोए,
देवकी ने जी भर गले लगाया, युगों के आँसू सुख में खोए।
आप पूछेंगे, जब सब लीला थी, राम की ही थी माया,
तो फिर क्यों देवकी बनकर, माँ ने इतना दुःख उठाया?
कृष्ण कहते, हर कर्म अग्नि-सा, धुआँ भी उसके साथ चले,
"धूमेनाग्निरिवावृताः", शुभ कर्म में भी दोष पले।
राम-काज भी अग्नि था, वियोग, तिरस्कार उसका धुआँ,
वही धुआँ धोने को माँ ने, द्वापर में कारा को चुना।
संतों ने कहा, कैकयी है प्रारब्ध, पके कर्म जो फल देकर ही जाते,
राम भी उन्हें मिटाते नहीं, बस भोगने का बल बढ़ाते।
मंथरा है यह संसार, जो सोए कर्म-बीज जगा देता,
दो वर हैं पुराने वचन, जिनका मूल्य समय ले लेता।
चित्रकूट में मंदाकिनी-जल, पीड़ा की ज्वाला शांत करे,
देवकी का कारा में तप, विगत कर्मों के धुएँ से मुक्त करे।
प्रभु ने उन्हें जननी कहा, भक्त ने स्वयं के लिए तप चुना,
कर्मफल में वियोग माँगा, कान्हा ने उसको भी सुना।
आज भी कितनी कैकयी, सौतेली माँ का दंश सहती हैं,
एक भूल, एक बात पर, उम्र भर ताने सुनती जाती हैं।
मन में सोचती रहती हैं, अब किस मुँह से उसके द्वार जाऊँ,
वर्षों बीते, बात न की, अब क्षमा माँगूँ तो क्या पाऊँ?
कैकयी-सा साहस करें, जिसे दुःख दिया, उसके द्वार जाएँ,
झुककर क्षमा माँग लें, तो रूठे राम भी गले लगाएँ।
भूल हो तो मान लें, झुककर क्षमा भी माँग लें,
प्रारब्ध धैर्य से भोगें, और राम की शरण थाम लें।
और जिसे सब कोस रहे हों, उसकी पूरी कथा भी जानें,
जिसके चरण राम ने पहले छुए, उसे हम भी माँ ही मानें।
कैकयी से देवकी तक, तप-कर्म से मिले घनश्याम,
कर्म से ही प्रारब्ध बने, हम करते रहें राम को प्रणाम।
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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