जटायु – राम की गोद में सफल जीवन | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

राम ने जब जटायु का शीश गोद में उठाया,
जन्म हुआ सफल, जटायु का मन भर आया।
रावण था महान बलशाली, दिशाएं भी थर्राती थीं,
यह धरती उसके चलने से, कम्पित हो जाती थी।
जटायु मित्र था दशरथ का, जंगल में ही रहता था,
कहते हैं, गीध जाति से था, पर मानवों से बेहतर था।
मित्र था राजा दशरथ का, राम से स्नेह पुत्रवत था,
राम का व्यवहार भी, जटायु के प्रति पितृवत था।
राम दुखी थे सिया हरण से, अपनी प्रिया को ढूंढ रहे थे,
मानव लीला में स्वयं परब्रह्म, विलाप करते भटक रहे थे।
देखा जब घायल जटायु को, क्षत-विक्षत वृद्ध शरीर को,
क्षत्रिय का खून खौल उठा, ढूंढना चाहा हमलावर को।
जटायु ने कहा, शत्रु नहीं अब यहाँ, भाग गया वह चोर,
रावण हर ले गया सीता को, दक्षिण दिशा की ओर।
वृद्ध शरीर के कारण जटायु, अधिक युद्ध नहीं कर सका,
रावण ने दोनों पंख काट दिए, गिर कर घायल हो गया।
प्राण रुके रहे, राम की आशा में, दर्शन का अभिलाषी था,
जन्मों की प्यास बुझ गयी, अत्यंत सौभाग्यशाली था।
राम काज में प्राण गँवाये, अंत समय राम समक्ष रहे,
राम ने जब सब हाल सुने, कृतज्ञ नयन सजल हुए।
अश्रुजल से किया अभिषेक, जटायु का मस्तक गोद में था,
भक्तवत्सल प्रभु विलाप भूल गए, भक्त का मन मोद में था।
दक्षिण दिशा बताई जटायु ने, राम किष्किन्धा पहुँच गए,
वानर सीता की खोज में भेजे, दक्षिण दिशा हनुमंत गए।
मिले जटायु के भाई संपाती से, उसने सीता का पता दिया,
दूर दृष्टि वाले उस गीध ने, लंका का रास्ता बता दिया।
संपाती के पंख जले थे बचपन में, अपने भाई जटायु हेतु,
जटायु जब गया सूर्य के निकट, भाई आगे आया रक्षा हेतु।
जटायु की रक्षा हुई, संपाती के पंख जल गए।
लेकिन जन्म सफल दोनों का, राम काज कर गये।
यह जीवन हमें राम ने दिया, हम करें राम का काम,
सीता राम मय संसार यह, हाथ जोड़ हम, करें प्रणाम।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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