बालि – मन पर विजय की युक्ति | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं ?
मारेहु मोहि ब्याध की नाईं ??
प्रश्न पूछता है बालि,
मर्यादा पुरुषोत्तम से,
राम जिनका जीवन है आदर्श,
ज़िक्र जिनका सदा होता आया है,
अच्छाई की अंतिम सीमा देखकर,
सदा सबको राम ही याद आया है।
उन्होंने क्यों मारा बालि को छिपकर,
क्यों वार किया ओट में छिपकर,
क्यों बनी यह कहानी है,
क्या बात तुम्हें बतानी है।
बालि है तुम्हारा अपना मन,
तुम चाहते हो इस पर नियंत्रण,
लेकिन बालि में है यह क्षमता,
तुम्हारी आधी शक्ति हर लेता,
तुमसे ही शक्ति लेकर,
यह तुमसे ताकतवर होता।
जो भी लड़े इसके सामने जाकर,
होता है निश्चित दुःखी, हार कर।
इस कहानी में बालि है तुम्हारा मन,
इसका जब तुम चाहते हो नियंत्रण,
हारते ही हो हर बार, क्योंकि,
यह तुम्हारी शक्ति से होता शक्तिमान।
इसलिए मन के सामने से लड़कर,
बैठता है प्राणी हर बार हार कर,
देता रहता है दोष स्वयं को,
या फिर परिस्थिति, अथवा भाग्य को।
कहानी में बात सिर्फ़ इतनी नहीं है,
बालि से जीतने की युक्ति बतायी है।
चाहिये भगवान पर भरोसे की ओट,
तब हो सकेगी मायावी मन पर चोट।
राम के जीवन में केवल एक बार,
करना पड़ा कूटनीति से छिपकर वार।
क्योंकि सामना बालि अर्थात् मन से था,
तुम्हें मन से जीतने का ढंग बताना था।
इसलिए लो भगवान की शरण,
करो भरोसा, फिर करो रण,
वार करना सामने से,
जब रण में आये दुश्मन,
लेकिन लेना भरोसे की ओट,
जब लड़ रहा हो अपना मन।
राम पर भरोसा करके ही,
राम की शरण में जाकर ही,
संभव होगी ख़ुद पर जय,
अपने मन पर हो सकेगी विजय।
कहानी इसके आगे बढ़ती है,
जब मन की मौत होती है,
करता है समर्पण, शेष जीवन,
अंगद रूपी पुत्र, प्रभु के चरण।
क्योंकि मन की नीयत सही है,
इसीलिये तुमने कहानी पढ़ी है,
करो प्रभु के चरणों में समर्पण,
अहंकार को ही करके अर्पण,
मन को मिलती है शांति,
स्वतः हो जाता शांत,
हम करें राम को प्रणाम,
और रहने लगें सदा शांत।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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