राम नाम की महिमा – श्री राम, जय राम | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

श्री राम, जय राम, जय जय राम,
श्री राम, जय राम, जय जय राम।
राम ने ही है हमको, यह जीवन दिया
राम का काम हमने, है क्या क्या किया ?
राम मिलते हैं हमको, हर दिन यहाँ,
हम ढूँढते हैं राम को, ना जाने कहाँ ?
राम समक्ष सबके सदा रहते हैं,
नाना रूप राम, हमें दिखलाते हैं।
राम को देख कर, अनजान बने रहते हैं,
मंदिर में भी राम, हमें कहाँ मिल पाते हैं।
माँ के रूप में, प्रकटे हैं राम,
पिता के रूप में भी, आए हैं राम।
घर से जब निकले तो, साथ में थे राम,
परिजन, श्वान, या सेवक रूप में राम,
राम तो बसे हुए, उन सबमें सदा,
हर रूप राम से ही, था जो बना।
हर कदम पर, राम राह दिखला रहे,
राम आँखों से, दुनिया को दिखला रहे,
राम दृष्टि भी हैं, राम सृष्टि भी हैं,
राम द्रष्टा भी हैं, राम स्रष्टा भी हैं,
प्रकट में, जो भी हैं, उनमें है राम,
जो है अप्रकट, वो भी, है मात्र राम।
कार्यालय या घर, सेवक या स्वामी,
राम सब में व्याप्त है, राम अंतर्यामी।
राम का रकार, होता है सुशोभित, शीर्ष पर,
राम का मकार भी, विराजित है अंबर पर।
राम नाम के गुण, स्वयं राम भी न गा सके,
राम स्वयं आकर भी, कितनों को पार कर सके!
राम नाम की महिमा ऐसी, राम करते सदा पार,
राम नाम की नौका में, असंख्य होते बेड़ा पार।
राम जन्म की कथा, कल्प भेद से अनेक,
राम जिनका नाम है, वे राम केवल एक।
राम लेते हैं अवतार, राम करते हैं शिक्षण,
राम करते दुष्ट संहार, राम करते हमारा रक्षण।
राम के अवतार का, मुख्य कारण सदा यह है,
राम के प्रेमी भक्त, पृथ्वी पर प्रतीक्षारत हैं।
राम को पुत्र मानने वाले कौशल्या-दशरथ,
राम को ईश्वर जानने वाले, हनुमान-विभीषण,
राम की बाट जोहते, शबरी-जटायु-सुतीक्ष्ण,
राम से लड़ने को आतुर, कुंभकर्ण-रावण।
राम की लीला देखने, अवध में जन्मे देवगण,
राम पर मुग्ध ज्ञानी ऋषि, भोले वनवासी जन।
राम से प्रेम, शूर्पणखा भी यदि कर ले,
कुब्जा के रूप में कृष्ण का सान्निध्य पा ले।
राम को वामन रूप में, देखा था रत्नमाला ने,
पुत्र रूप में हों, ऐसा वात्सल्य जगा था मन में।
राम ने वामन रूप का, जब कर दिया विस्तार,
छीन लिया बलि का राज्य, राम अपरंपार।
मन में पिता से अन्याय का प्रतिशोध जगा,
पूतना के रूप में जन्मी, कृष्ण से सब पा लिया।
जिसने किया चिंतन, राम का जिस रूप में,
पाया राम को अपने समीप, उसी अनुरूप में।
राम परब्रह्म हैं, राम परमात्मा हैं,
राम ही हम सबमें व्याप्त आत्मा हैं।
राम ही बूँद है, राम सागर में भी है,
राम है जल तत्व, राम लहर में भी है।
सीता के रूप में, धरा भी राम है,
गगन, अंतरिक्ष में, व्योम में राम है।
राम का तेज ही है, सारे प्रकाश में,
सूर्य, चंद्र, तारे, संपूर्ण आकाश में।
अग्नि की हर लपट में ऊष्मा राम है,
हर परमाणु में, गति की ऊर्जा राम है।
राम नहीं कुछ भी है, राम ही सब कुछ है,
राम को न समझ सकती, बुद्धि तुच्छ है।
राम भाव है, भाव में समा जाते हैं,
राम से भाव, विकसित, हो जाते हैं।
राम को देखकर, हमें करना भी क्या है,
हर समय राम हमारी, करते रक्षा हैं।
हम राम नाम का, कर लें विश्वास,
हर समय राम रहते हैं, हमारे ही पास।
राम नाम से हमारा, काम बन जाएगा,
राम कृपा से, आनंद बरस जाएगा।
राम नाम आम है, खाओ और मौज करो,
ज्ञान से पेड़ और गुठली, गिनकर क्या करो ?
मैं मेरे राम का हूँ, राम सदा मेरे हैं,
राम मुझे अच्छे लगते, राम मुझे प्यारे हैं!
राम का होकर, जब हम लेते हैं, राम का नाम,
राम करें योगक्षेम वहन, हम करें राम का काम।
राम मिले ना मिले, बस ले लो राम नाम,
राम से भी बड़ा है, राम का नाम।
राम कहो, श्री राम कहो या कहो सीता राम,
सबको राम-राम कहो, या कहो जय श्री राम।
हरे राम कहो, या कहो, उल्टा राम नाम,
राम पार लगाते सबको, जो लेता राम नाम।
उर अंतर में विराजित रहते सदा राम,
करते रहें हम राम को, निरंतर प्रणाम!

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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