सुंदरकांड – हनुमान की लंका यात्रा | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

भक्त जब होते हैं विकल, जाते हैं राम के पास,
अभी प्रभु विकल हैं, आये हैं, हनुमान प्रभु के पास।
देते हैं अपनी मुद्रिका, करो दक्षिण दिशा अनुसंधान,
लाओ पता जानकी का, तुम पर यह दायित्व महान।
बढ़ते गये दक्षिण दिशा में, आया धरती का छोर,
सब देख रहे समुद्र को, ताक रहे लंका की ओर।
जाम्बवंत ने स्मरण करवाया, हनुमान को अपना बल,
जाओ लंका में ढूँढो, लाओ माता की सुधि कल।
उड़ चले हनुमान, पिनाक का स्पर्श, सिंहनी का कल्याण,
सुरसा की बुद्धि बल परीक्षा में, सफल हुए चतुर सुजान।
लंकिनी को किया घायल, मुष्टि प्रहार से,
हनुमान हुए मुदित, विभीषण के सत्कार से।
अशोक वाटिका में सीता को, दशानन धमकी दे रहा,
सूर्य हैं राम, रावण खद्योत, यह सुनकर खिसिया रहा।
तिनके की ओट से, सीता को, भाई का साथ मिल रहा,
रावण को महाराज रघु का, मारा बाण याद आ रहा।
चंद्रहास से रक्षा करती है मंदोदरी, रावण लौट जाता है,
एक माह की सीमा देकर, सीता को भय दिखलाता है।
त्रिजटा कहती है मेरे सपने में, लंका नष्ट हुई जाती है,
प्रभु राम और वानर सेना, राक्षस राजधानी मिटाती है।
हनुमान करते हैं राम का गुणगान, मुद्रिका गिराते हैं,
लघु रूप में सीता के समक्ष, अब प्रकट हो जाते हैं।
करुणानिधान की शपथ से, सीता को विश्वास दिलाते हैं,
भूख मिटाने हेतु जगत्माता से, फल खाने की आज्ञा लेते हैं।
मार दिये रक्षक सारे, अक्षयकुमार भी मारा गया,
मेघनाद ने चलाया ब्रह्मास्त्र, हनुमान को बाँधा गया।
रावण पूँछ नहीं जला पाया, लंका नगरी धू-धू जल गई।
सीता से ले चूड़ामणि, हनुमान को सफलता मिल गई।
किष्किन्धा पहुँच कर, अंगद और वानर मस्त हो गये,
मधुवन को उजाड़ा, खाये फल, रक्षक पस्त हो गये।
सुग्रीव चले आये राम की सेवा में, नाथ काम हो गया,
हनुमान गिर पड़े चरणों में, सेवक कृतकृत्य हो गया।
कैसी है जनक कुमारी, रुद्ध कंठ से बोले हनुमान,
तन विरह से जल रहा, अश्रुजल से रुके हैं प्राण।
नाथ अब न देर करो, मात्र तीस दिन शेष,
समुद्र पार चलें अब, करें लंका में प्रवेश।
पहुँचे सागर तट, राम इधर, विभीषण कर रहा विनय उधर,
लौटा दो सीता को हे रावण, अन्यथा मृत्यु होगी निशाचर।
रावण ने लात मारी, विभीषण ने लंका त्याग दी,
घर का भेदी लंका ढाए, इसकी नींव डाल दी।
राम ने राजतिलक किया, विभीषण को राजा बना दिया,
युद्ध के प्रारंभ से पहले ही, समापन का हाल बता दिया।
तीन दिन विनय करी, समुद्र के संग प्रभु राम ने,
भय बिन होय न प्रीत, वह विनीत हुआ बाण से।
नल नील के निरीक्षण में, वानरों का काम घमासान,
राम नाम अंकित किया, पुल बना, तैर गये पाषाण।
यह अति सुंदर वर्णन हुआ, कहलाया सुंदर काण्ड,
करें राम को प्रणाम, जिनकी माया ने रचे ब्रह्मांड।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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