सीता स्वयंवर – पुष्पवाटिका से धनुष भंग तक | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

राम को इस तरह से हम चाहने लगे हैं,
नींद में सपने भी अब आने लगे हैं,
राम हमसे दूर रहते हैं या हैं पास में,
हम तो अब भ्रम में पड़ने लगे हैं।
भ्रम है या माया, राम ने खेल रचाया,
लीला जो है उनकी, कोई समझ ना पाया।
सुना है जंगल में भेजा था उनको,
यज्ञ रक्षा हेतु दो भाइयों को,
मार दिया सुबाहु और ताड़का को,
मारीच भाग गया जीवन रक्षा को।
विश्वामित्र के संग घूमते हुए,
जनकपुर स्वयंवर में पहुँच गये।
पुष्पवाटिका में दृष्टिगोचर हुए,
सूर्य और चंद्र साथ प्रकट हुए।
मेरे लिये रचा गया स्वयंवर,
चुना जायेगा शर्त के अधीन वर,
पिनाक धनुष का जो चाप चढ़ाये,
वह सीता के योग्य कहलाये।
यह मेरा मन क्यों डोल रहा है,
अपने अनुरूप वर जान रहा है,
क्या यही करेंगे मेरा वरण,
शर्त पूरी कर जीतेंगे स्वयंवर ?
कौन जाने, भविष्य के गर्भ में क्या है ?
माता गौरी ही जाने, मेरे मन में क्या है?
वे ही करेंगी कृपा, कराएँगी मिलन,
मन रुचि अनुसार, सहज सुंदर सजन,
करुणा निधान, स्नेह शील सुजान,
यह अपने मन में अब निश्चित जान।
चली अपने भवन, हो मुदित मन,
सीता का मन, अब है प्रसन्न।
कितना विशाल जमघट है यहाँ,
आये हैं सारे राजे-महाराजे,
अपनी अपनी सेना लेकर,
सबके सब ही गाल बजाते।
यह कैसी शर्त का चुनाव किया,
मन चाहता है सुकुमार पिया,
कैसे उठायेंगे इस धनुष को वो,
न उठ सकता अनेकों से जो।
आख़िर सब थक कर चूर हुए,
अरमान न किसी के पूरे हुए।
पिता जनक भी अब हताश हुए,
इस महि से वीर समाप्त हुए।
रघुवंशी जिस सभा में हो,
वीर विहीन वो कैसे हो ?
जनक के वचनों को सुनकर
लक्ष्मण आख़िर बोल पड़े,
विश्वामित्र की आज्ञा लेकर,
राम आसन से उठ हुए खड़े।
उठा धनुष, खींचा जब चाप,
टूट गया पिनाक अपने आप।
मन अनुरूप सहज सुंदर साँवला,
गौरी के वरदान से मुझे वर मिला।
मुग्ध हैं माँ सीता, करती राम का ध्यान,
हम सब भी करें, सीता राम को प्रणाम।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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