लक्ष्मण-गीता – निषादराज को उपदेश | राम को प्रणाम
कविता: एम. एल. गुप्ता
राम-राम करते रहें, सुमिरें राम का नाम,
कलियुग में बन जाता है, इतने से भी काम।
सखा राम को देखकर, विषाद में पड़ गए निषादराज,
जो बनते अयोध्या के राजा, आए इस दशा में आज।
लक्ष्मण समझा रहे हैं मित्र को, देखो समय बलवान,
ना कोई देता दुःख किसी को, अपना कर्म ही प्रधान।
संयोग से सुख, वियोग से दुःख दोनों एक ही भाव,
इसमें, कोई पहले, कोई पीछे, देता निश्चित घाव।
भोग और संग्रह का भ्रम, जीवन में निरंतर यह क्रम,
प्राप्ति में लगे भला, त्याग और विछोह लगे मध्यम।
कोई करता है मेरा हित, किसी से हुआ मेरा अनहित,
सब भ्रम है, हर व्यक्ति समझता, अपना कर्म उचित।
कोई मेरे प्रति उदासीन, किसी का है मेरे से प्रेम भाव,
सब अपने स्वार्थ के कारण, बदलते रहते सबके भाव।
संपत्ति-विपत्ति, जन्म-मरण, कर्म, समय या काल,
अनेक फंदों से फँसा रहा, निरंतर जगत का जाल।
धरा, धन, ग्राम, परिवार, सब का हेतु मात्र व्यवहार,
स्वर्ग, नरक और अनेक प्रकार, विचित्र है यह संसार।
देखो यह व्यवहार, सुनो तुम, और मन में करो विचार,
प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द, ये तीन प्रमाण के प्रकार।
निश्चित पाओगे तुम यही, कि व्यवहार है, सत्य नहीं,
सबका मूल मोह है, परमार्थ में इनका अस्तित्व नहीं।
करो विचार कि जो हुआ, इसका दोष किसी को नहीं,
सखा, रोष अपना त्याग दो, क्रोध का कोई कारण नहीं।
नित्य मोह रूपी निशा में, देखो सोया हुआ है जीव यहाँ,
स्वप्न देख रहा अनेक प्रकार के, फैला दिया प्रपंच यहाँ।
इसी सोए हुए संसार में, जो योगी है, वह जाग रहा है,
इस प्रपंच से बचा हुआ, अपना परमार्थ साध रहा है।
जानो कि जीव जाग गया, इस मोह रूपी निद्रा से,
यदि वैराग्य हो गया हो, संसार की विषय वासना से।
जब विवेक जागता है, होता है, राम-चरण में अनुराग,
मन क्रम वचन में रघुनाथ प्रेम, जाता है मोह-भ्रम भाग।
राम हैं अलख निरंजन, अगम अनादि अविगत, अनूप,
वेद कहें जिन्हें नेति, नेति, उन्होंने धारण किया है रूप।
भक्त, गौ एवं विप्र हित हेतु, हरने आए भूमि का भार,
मनुज देह धारण कर लीला करते, यह परम उपकार।
प्रकट करने को मानवता हेतु, परम पवित्र ज्ञान,
लीला हेतु आए हैं राम, हम सब करें इन्हें प्रणाम।
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
Comments
Post a Comment