रसो वै सः – रस से भरा तेरा नाम | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

रस से भरा तेरा नाम है,
रसमय यह निर्माण है।
यह समस्त प्रकृति, है रचना तेरी,
मात्र रस ही रस, रस से ही भरी,
रस से भरा रहे जब मानव मन,
पुलकित रहे तभी उसका तन,
जब रस में डूब सके यह जीवन,
क्यों चाहूँ मैं होना अ-मन ?
मन जो कभी होता है प्रसन्न,
और कभी दुःख से होता अप्रसन्न,
कभी लगता कि जीवन नीरस है,
मन उदास, तन बेबस है,
ऐसे में रस बाहर भी नहीं दिखता है,
भीतर-बाहर सब वीराना होता है,
तो लगता है कि चाहिये कुछ और,
इस संसार में नहीं मेरे लिये अब ठौर।
फिर लगता है कि मुझे ज्ञान चाहिए,
अब जीवन में शांति और ध्यान चाहिए।
चला आता है मानव प्रकृति की गोद में,
जहाँ सब डूबे हैं आमोद-प्रमोद में।
देखो कल कल बहता है झरना,
सुरम्य वन के तन का यह गहना,
गिरते हुए जल प्रपात की यह ध्वनि,
जब शांत वन में कानों ने सुनी,
स्वतः मन प्रफुल्लित होने लगा,
दुःख छूट गया, मन बहलने लगा।
दृश्य और ध्वनि से जब मन भीगा,
तन भी भीगने के लिए मचलने लगा।
जलाशय में जब डुबकी लगा दी,
मन ने सारी यादें, चिंता हटा दी।
ऐसे में हो परमात्मा का स्मरण,
लग जाएगा ध्यान, हो जाएगा अ-मन।
लेकिन यह रस सदा मिल सकता है,
परमात्मा सदैव सर्वत्र अव्यक्त रहता है,
रसो वै सः, ऐसा ग्रंथों में कहा गया है,
अनेकों ऋषि मुनियों ने अनुभव किया है।
लेकिन मानव ने इतना निर्माण किया है,
कि रस को ही उसने विलुप्त किया है,
क्षणिक में ढूँढता रहता है रस सदा,
भटकता रहता है इसलिए मन सदा।
रस आधार है इस संपूर्ण सृष्टि का,
नहीं मिलता सदा, यह भ्रम दृष्टि का।
शाश्वत से ही यह क्षणिक रस आता है,
लेकिन क्षणिक है, ठहर नहीं पाता है।
शाश्वत के स्रोत को यदि हम जान लें,
अहंकार चाहता है कि उसे पहचान लें,
और फिर कर सके अपना अधिकार,
शाश्वत हो हर क्षणिक सुख का प्रकार।
इसे तुच्छ बुद्धि मानव समझ नहीं पाता है,
अपने निर्माता पर अधिकार चाहता है।
लेकिन बूँद जब समुद्र को पाना चाहती है,
समुद्र से मिलकर एक होना चाहती है।
उसके लिए बूँद को करना होता है स्वीकार,
मेरी पहचान नहीं, अब समुद्र ही है परिवार।
इस सृष्टि के नियंता के प्रति करे समर्पण,
जाने नहीं, कोई बात नहीं, करे बस अर्पण,
अपना अहंकार जो कि एक मिथ्या भ्रांति है,
लेकिन जिसके कारण मिलती नहीं शांति है।
प्रकृति की गोद में जब, मानव करे यही पुकार,
मैं नहीं कुछ, आप ही सब कुछ, करो मुझे स्वीकार।
जब मानव समर्पण में झुक जाता है,
असीम की यात्रा में आगे बढ़ जाता है,
आओ हम प्रकृति की गोद में करें विश्राम,
नमन करें राम को, करें राम को प्रणाम।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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