राम परिवार – दीपों की पंक्ति | राम को प्रणाम


कविता: एम. एल. गुप्ता

आज दीपावली है अवध में, दीपों की पंक्ति चहुँ ओर,
हर सदस्य है दीपक जहाँ, ऐसा परिवार न देखा और।
लौटे राम, कृतज्ञ हृदय से, सबको देखा भर-भर नैन,
मेरे कारण चौदह वर्ष, आप सबने खोया सुख-चैन!
हर एक चाहे, सबसे पहले, प्रभु आकर मुझसे ही मिलें,
राम ने ठाना, अब पल भर भी, कोई प्रतीक्षा में न जले।

एक ही क्षण में सबसे पहले, राम भला कैसे मिल पाए?
कौन-से मित्र सभा में प्रभु ने, भरत से भी प्रिय बताए?
जिस आँगन में प्रभु खेले, वह चौदह वर्ष क्यों बिखरा रहा,
और किस धागे से फिर जुड़ा, जो हर मन में बँधा रहा?
इस दीपावली यह कथा सुनें, तो अपने घर का सच भी जानेंगे,
किसके त्याग से घर टिका है, उस दीपक को पहचानेंगे!

भाग 1 – त्याग का आँगन

मनु-शतरूपा ने तप करके, दशरथ-कौशल्या बन जन्म पाया,
राम-लक्ष्मण, भरत-शत्रुघ्न, चारों पुत्रों से आँगन में प्रकाश छाया।
सुमित्रा, कैकयी भी राम पर, हर क्षण अपनी ममता वारें,
सब मुग्ध हैं बाल लीला से, राम सबकी आँखों के तारे।
जनकपुर से आईं चार बहनें, सीता, ऊर्मिला, माण्डवी, श्रुतकीर्ति,
जैसी भाइयों में, वैसी बहनों में, सदा से अनुपम प्रीति।

युवराज-अभिषेक की तैयारी, तभी दैव का हुआ हस्तक्षेप,
राम को वन, भरत को राज, सबके सुख पर दुःख का लेप।
बिखरा आँगन चौदह वर्ष को, राम, लक्ष्मण, सीता वन को चले,
पर पीछे अवध में त्याग के, अनगिनत करुण दीप जले।

दशरथ ने किया देह-त्याग, माताओं ने शृंगार छोड़ा,
भरत ने कुटिया में तप किया, शत्रुघ्न ने सुख से मुख मोड़ा।
ऊर्मिला ने सोकर प्रतीक्षा की, माण्डवी ने माताओं को सँभाला,
श्रुतकीर्ति के पति अवध में थे, पर शयन-कक्ष में न उजाला।
सीता ने वन के काँटे सहे, लक्ष्मण चौदह वर्ष न सोए,
पिता के वचन पर राज्य तजा, राम ने सब भौतिक सुख खोए।

चौदह वर्ष की वह अमावस, पर बुझा न कोई भी दीप,
हर एक ने कुछ छोड़ा था, पर छोड़ी न राम की प्रीत।

भाग 2 – प्रतीक्षा का समापन

आज अवधि पूर्ण होने में, शेष रहा है दिन बस एक,
उत्साह चरम पर है, लेकिन आशंकित जन प्रत्येक।
ऐसा न हो, राम देर कर दें, भरत का प्रण सब जानते हैं,
हनुमान का शुभ संदेश सुनकर, सबके प्राण लौट आते हैं।
भरत की आज्ञा पाकर, शत्रुघ्न अवध को सजा रहे हैं,
सीता-राम पुष्पक से उतरे, भरत पादुका पहना रहे हैं।

माँ कौशल्या, कैकयी, सुमित्रा, शेष सभी प्रतीक्षा कर रहे,
राम से सबसे पहले मिलना हो, सब अपने मन में चाह रहे।
प्रभु ने सबके मन की जानी, और एक कौतुक किया,
अनगिनत रूप धरे एक साथ, सबको गले लगा लिया।
प्राणों को दाँव पर लगाने वाले, अपने मित्रों का परिचय कराया,
सुग्रीव, विभीषण, हनुमान आदि को, भरत से भी अधिक प्रिय बताया।

राम-परिवार में आज, अनेक नए सदस्य जुड़ गए,
रक्त से नहीं, भाव से, सबके मन एक सूत्र में बँध गए।
वानर, भालू, निषाद, राक्षस, सबको राम ने अपनाया,
राम-राज्य में सत्य, न्याय और धर्म का मार्ग दिखलाया।
कहते हैं, कार्तिक की अमावस में, अवध में अँधेरा हारा,
हर दीप में किसी का त्याग जला, जगमगाया नगर सारा।

भाई-बहुओं के आठ दीपों से, फिर आठ नए दीप जले,
चारों भाइयों के दो-दो पुत्र, जिनसे नए राजवंश पले।
राम के कुश ने कुशावती पाई, लव ने श्रावस्ती राजधानी बनाई,
भरत के तक्ष, पुष्कल ने, तक्षशिला, पुष्कलावती नगरी बसाई।
लक्ष्मण के अंगद, चंद्रकेतु ने, कारुपथ, मल्लभूमि को पाया,
शत्रुघ्न के सुबाहु, शत्रुघाती ने, मथुरा, विदिशा का राज चलाया।

रघुकुल में त्याग की परंपरा, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली,
सत्य पर अटल रहने की, लगन हर मन में पली।
एक दीया हो, तो बस दीया है, पंक्ति बने, तब दीपावली,
सहने और देने के भाव से ही, सारी विपदाएँ टलीं।

भाग 3 – बिखरा क्यों, जुड़ा कैसे?

पूछेंगे आप, जहाँ प्रभु जन्मे, वह घर भी क्यों बिखर गया?
क्यों चौदह वर्ष की अमावस में, हर एक को तपना पड़ा?
परिवार है दीपों की पंक्ति, हर सदस्य दीया बनकर जलता,
त्याग से तेल-बाती बनते, राम-ज्योति से उजाला मिलता।
अहंकार की अमावस आती, जब सब अपना अधिकार माँगें,
कैकयी-से त्याग भी होते, जिनका मर्म युग भी न जानें।

पर अँधेरा भी यह सिखाता, किसका दीपक कितना जलता,
सुख में सब दिखते एक-से, दुःख में ही त्याग पहचाना जाता।
अमित रूप का भेद यही, प्रभु हर भक्त से पहले मिलते हैं,
जिसका जितना तेल जला, उसके मन में उतने खिलते हैं।
जो त्याग करे, वही परिवार, चाहे वानर हो या वनवासी,
रक्त का नाता छूट भी जाए, भाव का नाता है अविनाशी।

गीता में कृष्ण ने भी कहा, "त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्",
त्याग के तुरंत बाद शांति, यही सुखी घर का मर्म।

दीपावली पर सब घर आते, मिठाई, रंगोली, नए परिधान,
पर किसने क्या छोड़ा घर के लिए, उस पर किसका जाता ध्यान?
भाभी ने अपना शहर छोड़ा, भैया माँ-बाबूजी के पास रुके,
हम आगे बढ़े, नाम कमाया, पर उनके त्याग पर कब झुके?
माँ ने अपनी नौकरी छोड़ी, पिता ने अपने सपने मोड़े,
बच्चों को पंख देने के लिए, अपने पंख स्वयं ही तोड़े।

घर की सफ़ाई में हर कोना, दीपावली पर हम चमकाते हैं,
पर वर्षों की जमी गाँठें, मन से कब हटाते हैं?
जो घर में सेवा करते, या दुःख में साथ निभाते सखा,
उनके घर भी दीप भेजें, जैसे राम ने सखाओं का मान रखा।
इस दीपावली एक दीप जलाएँ, उस अपने के नाम, जिसने चुपचाप दिया,
धन्यवाद कहें, गले लगाएँ, जैसे राम ने हर एक से मिलकर किया।

हर घर बने दीपों की पंक्ति, हर मन बने अयोध्या धाम,
थोड़ा-थोड़ा सब त्याग करें, करते रहें राम को प्रणाम।

संदर्भ

अनगिनत रूप धरकर सबसे एक साथ मिलना ("अमित रूप प्रगटे तेहि काला"): रामचरितमानस, उत्तरकांड
चारों भाइयों के पुत्र और उनके नगर (कुशावती, श्रावस्ती, तक्षशिला, पुष्कलावती, कारुपथ, मल्लभूमि, मथुरा, विदिशा): वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड
"त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्": श्रीमद्भगवद्गीता 12.12

🎬 यह कविता वीडियो रूप में – स्वर, चित्र और संगीत के साथ देखें: https://youtu.be/EpqmmiGk1UU

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— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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