राम तुम्हें हम ढूँढ रहे हैं – साँस में बसे राम | राम को प्रणाम
कविता: एम. एल. गुप्ता
राम तुम्हें हम ढूँढ रहे हैं,
क्या हम ख़ुद को खोज रहे हैं ?
क्या अस्तित्व जुदा है हमारा,
क्या आधार, जीने का हमारा ?
जब यह साँस बाहर जाती है,
जब लौट कर भीतर आती है,
यदि लौटी नहीं कभी यह साँस तो,
हो जायेगी बस अंतिम साँस वो!
मौत के इतना नज़दीक रहकर भी,
क्या हम राम को भूल सकते हैं ?
राम तुम्हीं तो प्राण हो,
क्या अपने प्राण को भूल सकते हैं ?
शायद सबसे बड़ी कृपा यही है -
साँस लेने का प्रयास
नहीं करना पड़ता है,
तुम ख़ुद ही लाते रहते हो
प्राणवायु को भीतर,
साँस छोड़ने का अभ्यास
नहीं करना पड़ता है।
जीने का सूत्र छिपा है साँस में,
जीने का ढंग है हर श्वास में,
जो मिला प्रकृति से तुम्हें,
करो इसका सदुपयोग,
लौटा दो वापस प्रकृति को,
फिर करो उपयोग।
अगली साँस लेने के लिये
पिछली साँस को छोड़ना पड़ता है,
जीवन में कुछ भी पाने के लिये,
ख़ुद त्याग करना पड़ता है।
साथ तो कुछ लाए नहीं,
सब कुछ पाया तुमने यहीं,
कैसा भ्रमित हो गया यह मन,
दिखता नहीं अपना ही तन।
गलती होती है पीठ की तरह,
दूसरे की दिखती है, ख़ुद की नहीं,
दर्पण चाहिए गुरु या मार्गदर्शक,
जो दिखला दे तुम्हें, क्या है सही ?
राम तुम भीतर हो समाये हुए,
अपने रूप सब ओर बिखराये हुए,
हो सदैव अदृश्य, अगोचर,
लेकिन मात्र तुम ही हो यहाँ पर !
यह कैसी उलटबांसी है,
यहाँ जल बीच मीन प्यासी है !
कैसे छा जाता है हम पर अहंकार,
कैसे हम मान लेते हैं यहाँ हार,
अहंकार को समझ लेते हैं
अपना अस्तित्व और स्वाभिमान,
साँस तक ख़ुद ले नहीं सकते,
चाहते हैं धन, वैभव, झूठा सम्मान।
सत्य का अन्वेषण कैसे हो?
नश्वर यह संसार है,
सब कुछ है असत् यहाँ,
सत् मात्र राम है।
ईश्वर को देखा नहीं,
देखा इस असत् जगत् को,
सत् की ओर कैसे बढ़े,
यह जग भरमाता है मन को।
तमस् से रजस्, और
रजस् से सत्त्व की ओर,
इस जगत् में बढ़ना है,
उत्तरोत्तर सत्य की ओर।
दैनन्दिन जीवन में सत्य का प्रयास,
लाएगा हमें निरंतर राम के पास,
दूरी बढ़ेगी असत्य से हमारी,
मन में होगा शांति का अहसास।
हर झूठ हमें राम से दूर करता है,
हमारे जीवन को अशांत करता है,
प्राण तो हर लेंगे राम एक दिन,
जीते जी झूठ प्राणांत करता है।
आप लेते हो साँस मेरे राम,
बढ़ाते हो प्राण शक्ति निरंतर,
मुझे बढ़ाते रहो सत्य मार्ग पर,
मेरे भीतर बढ़े शांति निरंतर।
मुझे ले लो अपनी शरण में,
शांत रहूँ मैं जीवन रण में,
करता रहूँ आपको प्रणाम,
स्वीकारो राम मेरा प्रणाम।
— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta
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