मुस्कुराते हैं मेरे राम – मानस का आरम्भ, शिव-उमा संवाद | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

सुनो, मुस्कुराते हैं मेरे राम,
तुम भी मुस्कुराओ ना!
उनके दिल में है इतना प्यार,
तुम भी बरसाओ ना !!
उमा शिव से जब प्रश्न करें,
सुअवसर का विचार करें,
शिव उनका आदर करें,
वाम आसन प्रदान करें।
ऐसे शुरू होती है रामकथा,
जो हरती है जन-जन की व्यथा।
प्रश्न में अंतर्निहित संदेह,
शिव फिर से मुस्कुराए।
याद आया सती का संदेह,
पर अब मन प्रेम से भीगा जाए।
अनेक प्रश्न,
दाशरथि राम या परब्रह्म,
मानव लीला, कैसे जन्म ?
नृप तनय, स्त्री विरह,
परमात्मा हैं लेकिन दुःख दुसह ?
निर्गुण ब्रह्म कब हो सगुण?
कैसे रूप करे धारण ?
कृपा करें विस्तार से,
वर्णित करें जन्म-कारण।
क्या लीला की बाल स्वरूप में,
कैसे हुआ विवाह ?
क्यों छोड़ा पिता का राज्य,
किसका हुआ ऐसा प्रभाव ?
वनगमन कर के राम ने,
कैसी लीला वहाँ रची ?
कैसे हरण हुआ सीता का,
रावण मारा किस विधि ?
लौटकर जब अवध आए,
राजा राम जब कहलाये,
कैसे किया प्रजा का पालन,
क्या क्या चरित्र दिखलाए ?
लेकिन यह अब कैसा प्रश्न ?
प्रभु कैसे पधारे अपने धाम ?
कैसे किया लीला संवरण,
राम अवतार का अंतिम काम ?
तत्व का वर्णन भी सुनाओ मुझे,
ऋषि मुनियों ने जाना जिसे,
जिसका चिंतन ज्ञानी करते सदा,
जिसमें आपका मन भी रमा।
भक्ति, ज्ञान और वैराग्य,
उपासना के ये सभी विभाग,
सुनाओ मुझे आप करके दया,
अपनी दासी पर करो शिव कृपा।
और अनेक रहस्य राम के,
गुप्त चरित्र कृपानिधान के,
सुनाओ मुझे लीला चरित्र सभी,
जो प्रश्न नहीं पूछे वो सब भी।
शिव मुस्कुराए,
कृपा बरसाए,
बिठा लिया उमा को निकट,
राम कथा अब होगी प्रकट,
तुलसी ने मानस में इसी को गाया,
राम को जन-जन तक पहुँचाया।
याज्ञवल्क्य ने,
भारद्वाज ऋषि को सुनाया,
काकभुशुण्डि ने,
गरुड़ के समक्ष इसे गाया,
अगस्त्य से सुनने गए,
सती और शिव,
वाल्मीकि ने शिक्षित किए,
लव और कुश,
राम कथा गायी गई,
राम के सामने भी,
लाखों वर्ष बाद हम,
गा रहे हैं इसे आज भी।
रामचरित मानस,
करता है लोक कल्याण,
जीवन प्रबंधन का ग्रंथ है यह,
समझे सो चतुर, सुजान।
मंगल भवन,
अमंगल हारी।
द्रवउ सो,
दशरथ अजिर बिहारी।
इसी बालरूप की,
वंदना के साथ,
मानस का प्रारंभ,
शिव उमा के साथ।
शंकर करते हैं राम को,
वंदन, प्रणाम,
हमारे अपने राम,
हम करें राम को प्रणाम।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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