चार भाइयों का प्रेम – शत्रुघ्न का मौन त्याग | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता

राम हैं आदर्श स्वयं, जीवन का हर क्षण आदर्श,
संदर्भ स्वयं राम अब, जीवन है शाश्वत आदर्श।
लक्ष्मण ने जिया जीवन, भ्राता राम के लिए,
राम ने जिया जीवन मानवता के उद्धार के लिए!
प्रेम किया इतना, कि राम के सेवक ही बन गए,
राम का स्नेह इतना मिला, सब कुछ भूल गए।
अपनी निद्रा को भूल, चौदह वर्ष वन में जगे !
जब शक्ति लगी, नींद आई, राम विचलित हुए,
हनुमान लाए संजीवनी, राम कृतज्ञ हो गए,
सदा सदा के लिए, भक्त के ऋणी हो गए।
वन में गए जब राम, विश्वामित्र के साथ,
मुनि ने माँगा संग अनुज, लक्ष्मण ही गए साथ।
भाइयों के निश्छल प्रेम, की कहानी है रामायण,
जैसे हैं राम-लक्ष्मण, ठीक वैसे ही भरत-शत्रुघ्न।
भरत जाते हैं अपने ननिहाल, शत्रुघ्न के साथ,
राम रह रहे वन में, दोनों सँभालते हैं राजकाज।
राम रहते हैं वन में, लक्ष्मण रहते हैं सेवा में,
भरत हैं नंदीग्राम में, शत्रुघ्न अवध की सेवा में।
जब पढ़ते हैं रामायण, ज़िक्र जिसका कम हुआ,
शत्रुघ्न ने अपना धर्म, सेवा ही बना लिया।
ना राम के साथ गये वन, ना अवध त्यागी,
ना कहा इस जग ने उन्हें, लखन सम बड़भागी।
रहे अवध में, सम्भालते रहे राज और प्रजा को,
राम की धरोहर को, भाई भरत की कुटिया को।
कभी अपने सुख का, ख़्याल ना किया,
माता और पत्नी का, विचार ना किया।
विश्व भरण पोषण कर्ता, आये भरत के रूप में,
साथ लाए सुदर्शन चक्र, शत्रुघ्न के रूप में।
अवध त्याग, राम-लक्ष्मण चले गये वनवास,
गद्दी त्याग कर भरत ने, नंदीग्राम में किया वास,
शत्रुघ्न से सुरक्षित अवध, प्रजा और रनिवास,
उनके पराक्रम के कारण, कोई शत्रु न आया पास।
कुशध्वज की कन्या, श्रुतकीर्ति बनी थी भार्या,
सुबाहु और शत्रुघाती, दो महान पुत्रों की माता।
लवणासुर का वध किया, राम के आने के बाद,
किसी अन्य शत्रु से युद्ध का, वर्णन नहीं हमें याद।
मधुपुर और विदिशा का राज किया पुत्रों के साथ,
इसके बाद तप में सहभागी बने, भाई राम के साथ।
शत्रुघ्न महान पराक्रमी, दयालु और परोपकारी,
वनवास की कारण मन्थरा को, जानकर लात मारी,
मिट गया कूबड़, सदा के लिए दासी का,
दण्ड भी दिया लेकिन, किया भला उसी का।
निष्काम सत्पुरुष जब, क्रोध भी कभी करते हैं,
कृपा करके दंड कम, और वरदान अधिक देते हैं।
शत्रुघ्न का पवित्र चरित्र, और अद्भुत शौर्य,
सम भाव में शत्रु के लिये, दंड एवं औदार्य।
माता सुमित्रा के प्रिय पुत्र, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न,
राम एवं भरत की सेवा में, दोनों का समर्पण।
त्याग के ऐसे उदाहरण का, करें हम अनुकरण,
आओ करें राम को प्रणाम, और पढ़ें रामायण।

— एम. एल. गुप्ता | राम को प्रणाम शृंखला | YouTube: @mlgupta

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