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राम के संकेत – मानव या दानव? | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता राम! तुम्हारे संकेतों को समझ नहीं पाता है मानव, देव बनने की है संभावना, लेकिन बन जाता है दानव। राम तुम्हारी ही शरण में, यह सारा संसार, फिर भी अनूठी रीत तुम्हारी, कोई न पाता पार। सब में तुम और तुम में सब, सदा समाये रहते हैं, लेकिन अपने अभिमान में, सब खोये खोये रहते हैं। ख़ुद को पाने की खोज करें, तो ख़ुद में भी तुमको पायेंगे, सब कुछ तुम और सब में तुम, सब जगह तुम को पायेंगे। लेकिन यह शरीर है अपना, बचपन से याद कराया गया, इस शरीर की सीमा में ही, ख़ुद को देखना सिखाया गया। संबंध सारे जो जुड़े रक्त से, या फिर जुड़े इस शरीर से, उन्हें अपना कह कर शेष को, पराया बतलाया गया। जवानी आई जब काम, क्रोध और लोभ जागने लगे, तब संसार के नियम और कारण, समझ आने लगे। इस सीमा के भीतर ही, बनी मानव समाज व्यवस्था, वरना होता जंगल राज, पशुवत् होती यह व्यवस्था। लेकिन यह सभ्यता का दामन, ओढ़कर बैठा समाज, शोषण और अन्याय करते हैं, सफ़ेदपोश बेलिहाज़। धन, शक्ति और जवानी का मद, करता है मदहोश, क्या क्या सहता कमजोर यहाँ, नहीं किसी को होश। सब यहाँ हैं राम के, सब में समाये हुए हैं राम, राम की लीला सभी, सब कु...

सुंदरकांड – हनुमान की लंका यात्रा | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता भक्त जब होते हैं विकल, जाते हैं राम के पास, अभी प्रभु विकल हैं, आये हैं, हनुमान प्रभु के पास। देते हैं अपनी मुद्रिका, करो दक्षिण दिशा अनुसंधान, लाओ पता जानकी का, तुम पर यह दायित्व महान। बढ़ते गये दक्षिण दिशा में, आया धरती का छोर, सब देख रहे समुद्र को, ताक रहे लंका की ओर। जाम्बवंत ने स्मरण करवाया, हनुमान को अपना बल, जाओ लंका में ढूँढो, लाओ माता की सुधि कल। उड़ चले हनुमान, पिनाक का स्पर्श, सिंहनी का कल्याण, सुरसा की बुद्धि बल परीक्षा में, सफल हुए चतुर सुजान। लंकिनी को किया घायल, मुष्टि प्रहार से, हनुमान हुए मुदित, विभीषण के सत्कार से। अशोक वाटिका में सीता को, दशानन धमकी दे रहा, सूर्य हैं राम, रावण खद्योत, यह सुनकर खिसिया रहा। तिनके की ओट से, सीता को, भाई का साथ मिल रहा, रावण को महाराज रघु का, मारा बाण याद आ रहा। चंद्रहास से रक्षा करती है मंदोदरी, रावण लौट जाता है, एक माह की सीमा देकर, सीता को भय दिखलाता है। त्रिजटा कहती है मेरे सपने में, लंका नष्ट हुई जाती है, प्रभु राम और वानर सेना, राक्षस राजधानी मिटाती है। हनुमान करते हैं राम का गुणगान, मुद्रिका गिराते हैं, लघु र...

अहंकार और समर्पण – राम के चरणों में | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता राम के चरणों में समर्पण, राम की कृपा से होगा, वरना मन के लिये, यह सब ढोंग ढकोसला होगा। जब मन कहे, कि व्यर्थ है, कुछ न होगा भक्ति से, समझ लो कि दूर हो तुम, राम की अभिव्यक्ति से। राम स्वयं समाए मन में, लेकिन मध्य में आवरण है, आवरण जब मिट जाएगा, स्वतः होता समर्पण है। मन में समाया अहंकार, निरंतर करता मार्गदर्शन है, रहता भ्रम कि लगता है, अहंकार द्वारा परिचालन है। कठपुतली के समान मानव, राम के द्वारा परिचालित, फिर कैसा यह नाटक, मन में सदैव यह भ्रम निश्चित। यह गुत्थी ही मानव के, समस्त दुःख का कारण है, यदि यह भ्रम मिट जाए, निश्चित दुःख निवारण है। प्रकृति में सब की भाँति, करना है, कर्तव्य पालन, इस हेतु दिया है राम ने, संसार और शरीर, साधन। अपना अस्तित्व समझ लेता है, मानव इस देह से, हो जाता है एकाकार, देह से जुड़ने वाली देह से। लेकिन यह लगे कि देह का सुख, क्षणिक होता है, भोजन और देह के सुख से, मन विचलित होता है। निरंतर खोज, एक तलाश, आ जाता है साधना में, शाश्वत प्रश्न, स्वयं कौन ? ले आता है साधना में। साधना के मार्ग में, जो कोई मार्गदर्शक मिल जाये, राम की सर्वोत्कृष्ट कृपा, मा...

लक्ष्मण-गीता – निषादराज को उपदेश | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता राम-राम करते रहें, सुमिरें राम का नाम, कलियुग में बन जाता है, इतने से भी काम। सखा राम को देखकर, विषाद में पड़ गए निषादराज, जो बनते अयोध्या के राजा, आए इस दशा में आज। लक्ष्मण समझा रहे हैं मित्र को, देखो समय बलवान, ना कोई देता दुःख किसी को, अपना कर्म ही प्रधान। संयोग से सुख, वियोग से दुःख दोनों एक ही भाव, इसमें, कोई पहले, कोई पीछे, देता निश्चित घाव। भोग और संग्रह का भ्रम, जीवन में निरंतर यह क्रम, प्राप्ति में लगे भला, त्याग और विछोह लगे मध्यम। कोई करता है मेरा हित, किसी से हुआ मेरा अनहित, सब भ्रम है, हर व्यक्ति समझता, अपना कर्म उचित। कोई मेरे प्रति उदासीन, किसी का है मेरे से प्रेम भाव, सब अपने स्वार्थ के कारण, बदलते रहते सबके भाव। संपत्ति-विपत्ति, जन्म-मरण, कर्म, समय या काल, अनेक फंदों से फँसा रहा, निरंतर जगत का जाल। धरा, धन, ग्राम, परिवार, सब का हेतु मात्र व्यवहार, स्वर्ग, नरक और अनेक प्रकार, विचित्र है यह संसार। देखो यह व्यवहार, सुनो तुम, और मन में करो विचार, प्रत्यक्ष, अनुमान एवं शब्द, ये तीन प्रमाण के प्रकार। निश्चित पाओगे तुम यही, कि व्यवहार है, सत्य नहीं, सबका...

राम नाम की महिमा – श्री राम, जय राम | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता श्री राम, जय राम, जय जय राम, श्री राम, जय राम, जय जय राम। राम ने ही है हमको, यह जीवन दिया राम का काम हमने, है क्या क्या किया ? राम मिलते हैं हमको, हर दिन यहाँ, हम ढूँढते हैं राम को, ना जाने कहाँ ? राम समक्ष सबके सदा रहते हैं, नाना रूप राम, हमें दिखलाते हैं। राम को देख कर, अनजान बने रहते हैं, मंदिर में भी राम, हमें कहाँ मिल पाते हैं। माँ के रूप में, प्रकटे हैं राम, पिता के रूप में भी, आए हैं राम। घर से जब निकले तो, साथ में थे राम, परिजन, श्वान, या सेवक रूप में राम, राम तो बसे हुए, उन सबमें सदा, हर रूप राम से ही, था जो बना। हर कदम पर, राम राह दिखला रहे, राम आँखों से, दुनिया को दिखला रहे, राम दृष्टि भी हैं, राम सृष्टि भी हैं, राम द्रष्टा भी हैं, राम स्रष्टा भी हैं, प्रकट में, जो भी हैं, उनमें है राम, जो है अप्रकट, वो भी, है मात्र राम। कार्यालय या घर, सेवक या स्वामी, राम सब में व्याप्त है, राम अंतर्यामी। राम का रकार, होता है सुशोभित, शीर्ष पर, राम का मकार भी, विराजित है अंबर पर। राम नाम के गुण, स्वयं राम भी न गा सके, राम स्वयं आकर भी, कितनों को पार कर सके! राम नाम की ...

लक्ष्मण की नींद – बालक राम की गोद में | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता मन में जब उल्लास हो, आनंद, मस्ती, रास हो। माह चाहे फाल्गुन हो, चैत्र या आषाढ़ हो। जब राम का नाम आए, मन में उमंग छा जाए, मन उत्साह से भर जाए, याद मन में जग जाए। जान लो कि, राम की कृपा, इस समय हम पर हो रही, राम की दया से ही, यह ज़िंदगी गुजर रही। कौशल्या का मन है व्यथित, बालक राम रेणु तनु मण्डित, रुदन सुन मातृ श्रवण चकित, कैसे हुआ पुत्र का तन थकित? दासी कहाँ छूट गई पीछे, राम अकेले आ रहे कहाँ से ? लक्ष्मण को उठाये हुए गोद में, क्या चोट लगी आमोद-प्रमोद में ? अब राम माँ को कहने लगे, कुछ हुआ नहीं, अनुज थक गए, जो भार धरा का उठा रहे, शेष शय्या पर तुम्हें भी लिटा रखे, वो शेषावतार कैसे थके ? राम भला क्या कहने लगे ? माँ को ना भरमाओ, अब तो कह दो सच्ची बात, लक्ष्मण को आ गई नींद, क्या जागे थे सारी रात? रात्रि व्यतीत हो गई, शास्त्र, कथा प्रसंग में, सुसमय उपस्थित हुए, प्रातः सत्संग में। इतने में लक्ष्मण ने ली अंगड़ाई, उठे, अलसाये, लेते हुए जम्हाई, माँ का उमड़ा पुत्र पर नेह, गोद में रखा सिर सस्नेह। राम से कहा अनुज ने, आपने उठाया मुझे गोद में, आपका धन्यवाद, आपका आभार, अब दीजिए यह वर...

मुस्कुराते हैं मेरे राम – मानस का आरम्भ, शिव-उमा संवाद | राम को प्रणाम

कविता: एम. एल. गुप्ता सुनो, मुस्कुराते हैं मेरे राम, तुम भी मुस्कुराओ ना! उनके दिल में है इतना प्यार, तुम भी बरसाओ ना !! उमा शिव से जब प्रश्न करें, सुअवसर का विचार करें, शिव उनका आदर करें, वाम आसन प्रदान करें। ऐसे शुरू होती है रामकथा, जो हरती है जन-जन की व्यथा। प्रश्न में अंतर्निहित संदेह, शिव फिर से मुस्कुराए। याद आया सती का संदेह, पर अब मन प्रेम से भीगा जाए। अनेक प्रश्न, दाशरथि राम या परब्रह्म, मानव लीला, कैसे जन्म ? नृप तनय, स्त्री विरह, परमात्मा हैं लेकिन दुःख दुसह ? निर्गुण ब्रह्म कब हो सगुण? कैसे रूप करे धारण ? कृपा करें विस्तार से, वर्णित करें जन्म-कारण। क्या लीला की बाल स्वरूप में, कैसे हुआ विवाह ? क्यों छोड़ा पिता का राज्य, किसका हुआ ऐसा प्रभाव ? वनगमन कर के राम ने, कैसी लीला वहाँ रची ? कैसे हरण हुआ सीता का, रावण मारा किस विधि ? लौटकर जब अवध आए, राजा राम जब कहलाये, कैसे किया प्रजा का पालन, क्या क्या चरित्र दिखलाए ? लेकिन यह अब कैसा प्रश्न ? प्रभु कैसे पधारे अपने धाम ? कैसे किया लीला संवरण, राम अवतार का अंतिम काम ? तत्व का वर्णन भी सुनाओ मुझे, ऋषि मुनियों ने जाना जिसे, जिसका चि...